अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- أُنْكِحَكَ – मैं तुम्हारा विवाह करा दूँ।
- تَأْجُرَنِي – तुम मेरे लिए काम करो (मज़दूरी पर रहो)।
- حِجَجٍ – वर्ष (साल), यहाँ आठ वर्ष का समय।
- أَتْمَمْتَ عَشْرًا – यदि तुम दस वर्ष पूरे कर दो।
- أَشُقَّ – तकलीफ़ देना, कठिनाई में डालना।
तफ़सीर (व्याख्या):
जब मूसा (अलैहिस्सलाम) मदयन की तरफ़ आए और उन्होंने दो औरतों को अपनी भेड़ों को पानी पिलाने से रोका हुआ पाया, तो उन्होंने उनकी मदद की। यह देखकर उन दोनों औरतों के पिता (हज़रत शुएब अलैहिस्सलाम) ने मूसा को अपने घर बुलाया और उनकी मेहमाननवाज़ी की। फिर जब मूसा ने अपना क़िस्सा सुनाया, तो उन्होंने उन्हें तसल्ली दी और कहा कि अब आप डरें नहीं, आप ज़ालिम क़ौम से बच निकले हैं।
इसके बाद उन दोनों में से एक लड़की ने अपने पिता से कहा कि इस आदमी को मज़दूरी पर रख लीजिए, क्योंकि यह ताक़तवर और अमानतदार है। यह सुनकर शुएब (अलैहिस्सलाम) ने मूसा से कहा:
"मैं चाहता हूँ कि अपनी इन दोनों बेटियों में से एक का विवाह तुमसे कर दूँ, इस शर्त पर कि तुम आठ साल मेरे लिए काम करोगे (भेड़ें चराओगे)। यदि तुम दस साल पूरे कर दो, तो यह तुम्हारी तरफ़ से एहसान होगा, मैं तुम पर कोई ज़ोर नहीं डालता। मैं नहीं चाहता कि तुम पर कोई कठिनाई डालूँ। अगर अल्लाह ने चाहा, तो तुम मुझे नेक और वादे का पक्का पाओगे।"
यह एक बहुत ही पाकीज़ा और बरकत वाला रिश्ता था। मूसा (अलैहिस्सलाम) ने यह प्रस्ताव क़बूल कर लिया और कहा कि जो भी मुद्दत मैं पूरी करूँगा, वह मेरी तरफ़ से होगी, और अल्लाह इस बात का गवाह है। यह विवाह अल्लाह की रहमत से हुआ और मूसा ने दस साल पूरे करके अपनी पत्नी को लेकर मिस्र की तरफ़ रवाना हुए।
दावत और नसीहत:
यह क़िस्सा हमें सिखाता है कि नेक काम करने वालों को अल्लाह कभी अकेला नहीं छोड़ता। मूसा (अलैहिस्सलाम) ने दो बेबस औरतों की मदद की, तो अल्लाह ने उन्हें एक नेक बीवी, एक अच्छा घर और एक सम्मानजनक ज़िंदगी अता की। अल्लाह का वादा है कि जो लोग उसकी राह में भलाई करते हैं, उन्हें वह दुनिया और आख़िरत दोनों में अच्छा बदला देता है।
इस आयत से हमें यह भी सीख मिलती है कि रिश्तों में साफ़-साफ़ शर्तें तय कर लेना चाहिए, ताकि बाद में कोई झगड़ा न हो। शुएब (अलैहिस्सलाम) ने बड़ी ही अच्छी तरह से शर्तें साफ़ कर दीं और यह भी कह दिया कि दस साल पूरे करना लाज़िमी नहीं है, यह सिर्फ़ तुम्हारी नेकी है। यह इस्लामी तहज़ीब है कि इंसान दूसरों पर बोझ न डाले और नर्मी से पेश आए।
हमें भी चाहिए कि अपने रिश्तों और मामलों में साफ़गोई, नेक नीयत और नर्मी अपनाएँ। अल्लाह उन्हीं लोगों की मदद करता है जो दूसरों के काम आते हैं और अपने वादों को पूरा करते हैं।
📜 आयत 25-29 — अल-क़सस
अनुवाद — अल-क़सस 27
सूरा अल-क़सस आयत 27 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (और इनमें दोनों बातें पायी जाती हैं तब) शुएब ने…सूरा आयत 27/88 — अल-क़सस القصص (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-क़सस सुनें, अल-क़सस अनुवाद, अल-क़सस mp3, अल-क़सस pdf. आयत 25–29. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
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