اسْتَأْجِرْهُ: उसे मज़दूरी पर रख लीजिए, उसे अपने लिए काम पर लगा लीजिए।
الْقَوِيُّ: ताक़तवर, जो काम करने की शक्ति रखता हो।
الْأَمِينُ: अमानतदार, भरोसेमंद, जिससे किसी ख़ियानत का डर न हो।
तफ़सीर (व्याख्या):
जब मूसा (अलैहिस्सलाम) ने उस कुएँ पर पहुँचकर उन दो औरतों की भेड़ों को पानी पिलाया, तो वे दोनों औरतें जल्दी से अपने वालिद के पास लौटीं और उन्हें यह ख़बर दी। उनमें से एक ने अपने पिता से कहा: "पिता जी! इस आदमी को मज़दूरी पर रख लीजिए।" उसने यह सलाह इसलिए दी क्योंकि उसने मूसा (अलैहिस्सलाम) में दो खूबियाँ देखीं — एक तो यह कि उन्होंने अकेले ही उस भारी काम को कर दिखाया जो दो औरतों के बस का नहीं था, यानी वे ताक़तवर हैं; और दूसरे यह कि उन्होंने उन दो औरतों की ओर ध्यान नहीं दिया, बल्कि अपनी नज़रें नीची रखीं और पूरे अदब और हया के साथ काम किया, यानी वे अमानतदार और पाकदामन हैं। इसलिए उसने कहा: "बेशक सबसे अच्छा मज़दूर वही है जो ताक़तवर भी हो और अमानतदार भी।" ताक़त से वह काम को अंजाम दे सके और अमानतदारी से वह उस चीज़ की हिफ़ाज़त कर सके जो उसे सौंपी जाए।
यह वाकया हमें सिखाता है कि किसी को काम पर रखने के लिए सिर्फ़ ताक़त ही काफ़ी नहीं, बल्कि अमानतदारी भी बहुत ज़रूरी है। एक मुसलमान को चाहिए कि वह खुद भी इन दोनों सिफ़तों को अपनाए — चाहे वह नौकरी करे या काम करवाए — और दूसरों में भी इन्हीं खूबियों को तलाश करे। यही वह मापदंड है जिसे इस्लाम ने किसी को ज़िम्मेदारी सौंपने के लिए निर्धारित किया है। जिस समाज में ताक़त और अमानतदारी को अहमियत दी जाए, वहाँ हर काम बखूबी अंजाम पाता है और लोगों के हक़ महफ़ूज़ रहते हैं। यही वह सुनहरा उसूल है जो हमें अपने मामलात में अपनाना चाहिए ताकि हमारी ज़िंदगी खुशहाल और समाज में भलाई हो।
तब मूसा ने उन की (बकरियों) के लिए (पानी खीच कर) पिला दिया फिर वहाँ से हट कर छांव में जा बैठे तो (चूँकि बहुत भूक थी) अर्ज क़ी परवरदिगार (उस वक्त) ज़ो नेअमत तू मेरे पास भेज दे मै उसका सख्त हाजत मन्द हूँ
इतने में उन्हीं दो मे से एक औरत शर्मीली चाल से आयी (और मूसा से) कहने लगी-मेरे वालिद तुम को बुलाते हैं ताकि तुमने जो (हमारी बकरियों को) पानी पिला दिया है तुम्हें उसकी मज़दूरी दे ग़रज़ जब मूसा उनके पास आए और उनसे अपने किस्से बयान किए तो उन्होंने कहा अब कुछ अन्देशा न करो तुमने ज़ालिम लोगों के हाथ से नजात पायी
(और इनमें दोनों बातें पायी जाती हैं तब) शुएब ने कहा मै चाहता हूँ कि अपनी दोनों लड़कियों में से एक के साथ तुम्हारा इस (महर) पर निकाह कर दूँ कि तुम आठ बरस तक मेरी नौकरी करो और अगर तुम दस बरस पूरे कर दो तो तुम्हारा एहसान और मै तुम पर मेहनत मशक्क़त भी डालना नही चाहता और तुम मुझे इन्शा अल्लाह नेको कार आदमी पाओगे
मूसा ने कहा ये मेरे और आप के दरमियान (मुहाएदा) है दोनों मुद्दतों मे से मै जो भी पूरी कर दूँ (मुझे एख्तियार है) फिर मुझ पर जब्र और ज्यादती (देने का आपको हक़) नहीं और हम आप जो कुछ कर रहे हैं (उसका) ख़ुदा गवाह है
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