अल-क़सस · 55/88
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-क़सस
وَإِذَا سَمِعُوا اللَّغْوَ أَعْرَضُوا عَنْهُ وَقَالُوا لَنَا أَعْمَالُنَا وَلَكُمْ أَعْمَالُكُمْ سَلَامٌ عَلَيْكُمْ لَا نَبْتَغِي الْجَاهِلِينَ ۝٥٥
Wa izaa sami`ul laghwa a`radoo `anhu wa qaaloo lanaaa a`maalunaa wa lakum a`maalukum salaamun `alaikum laa nabtaghil jaahileen
📖 हिंदी अर्थ
और जब किसी से कोई बुरी बात सुनी तो उससे किनारा कश रहे और साफ कह दिया कि हमारे वास्ते हमारी कारगुज़ारियाँ हैं और तुम्हारे वास्ते तुम्हारी कारस्तानियाँ (बस दूर ही से) तुम्हें सलाम है हम जाहिलो (की सोहबत) के ख्वाहॉ नहीं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • اللَّغْو (लग़व): बेकार और व्यर्थ की बात, ऐसा कथन जिसमें कोई भलाई या सच्चाई न हो।
  • أَعْرَضُوا (अ'रज़ू): उससे मुँह मोड़ लिया, उस पर ध्यान नहीं दिया।
  • لَنَا أَعْمَالُنَا (लना आ'मालुना): हमारे लिए हमारे कर्म हैं (उनका फल हमें मिलेगा)।
  • سَلَامٌ عَلَيْكُمْ (सलामुन अलैकुम): तुम्हें सलामती हो (यहाँ यह विदाई और अलगाव का सलाम है, अभिवादन नहीं)।
  • لَا نَبْتَغِي الْجَاهِلِينَ (ला नब्तग़ील जाहिलीन): हम जाहिलों (अज्ञानियों) की संगति नहीं चाहते।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन नेक और सच्चे ईमानवालों की खूबियाँ बयान करती है, जिन्होंने अपने पहले के धर्मग्रंथों पर ईमान रखा और फिर क़ुरआन पर भी ईमान लाए। उन्हें उनके इस सब्र और सच्चाई पर दोहरा अज्र (बदला) मिलेगा। उनकी एक बड़ी पहचान यह है कि जब वे कोई बेकार, झूठी या गाली-गलौज वाली बात सुनते हैं, तो उस पर कान नहीं धरते, उससे किनारा कर लेते हैं। वे उस बहस और बेहूदगी में नहीं पड़ते।

वे ऐसे लोगों से कहते हैं: "हमारे लिए हमारे कर्म हैं और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म। हमें अपने कर्मों का फल मिलेगा और तुम्हें अपने कर्मों का। हम तुमसे किसी बुराई या बदले की उम्मीद नहीं रखते, न ही तुम्हें जवाब देने की ज़रूरत समझते हैं। तुम हमसे सुरक्षित हो — हम तुम्हें न गाली देंगे, न तकलीफ़ पहुँचाएँगे।" यह "सलाम" उनका विदाई का सलाम है, यानी हम तुमसे अलग हो गए, हमारा तुमसे कोई झगड़ा नहीं। और वे यह भी कहते हैं: "हम जाहिलों (अज्ञानियों) की संगति और उनके रास्ते की तलाश नहीं करते, क्योंकि उनकी संगति में दीन और दुनिया दोनों का नुक़सान है।"

यह आयत हमें सिखाती है कि एक सच्चे मुसलमान की शान यह है कि वह बेहूदा बातों से दूर रहे, गुस्से और जहालत के माहौल में भी अपनी ज़ुबान को नेक और साफ रखे। जब सामने वाला जहालत और गाली पर उतर आए, तो हमें सब्र और नेकी से काम लेना चाहिए, उससे बहस नहीं करनी चाहिए। यही वह रास्ता है जो दिलों को जोड़ता है और इस्लाम की खूबसूरत तस्वीर पेश करता है। अल्लाह तआला ऐसे लोगों से मुहब्बत करता है जो जहालत से बचते हैं और हिकमत से बात करते हैं।

याद रखिए, जब आप किसी की बुराई का जवाब बुराई से नहीं देते, तो आप असल में अपने ईमान की ताक़त दिखाते हैं। यही वह अख़लाक़ है जिसे अल्लाह और उसके रसूल ﷺ ने सिखाया है — कि बुराई को भलाई से दूर करो, और जाहिलों से किनारा करो। यही सच्ची इज़्ज़त और कामयाबी का रास्ता है।



📜 आयत 53-57 — सूरा अल-क़सस

53وَإِذَا يُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ قَالُوا آمَنَّا بِهِ إِنَّهُ الْحَقُّ مِن رَّبِّنَا إِنَّا كُنَّا مِن قَبْلِهِ مُسْلِمِينَ
और जब उनके सामने ये पढ़ा जाता है तो बोल उठते हैं कि हम तो इस पर ईमान ला चुके बेशक ये ठीक है (और) हमारे परवरदिगार की तरफ से है हम तो इसको पहले ही मानते थे
54أُولَٰئِكَ يُؤْتَوْنَ أَجْرَهُم مَّرَّتَيْنِ بِمَا صَبَرُوا وَيَدْرَءُونَ بِالْحَسَنَةِ السَّيِّئَةَ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنفِقُونَ
यही वह लोग हैं जिन्हें (इनके आमाले ख़ैर की) दोहरी जज़ा दी जाएगी-चूँकि उन लोगों ने सब्र किया और बदी को नेकी से दफ़ा करते हैं और जो कुछ हमने उन्हें अता किया है उसमें से (हमारी राह में) ख़र्च करते हैं
55وَإِذَا سَمِعُوا اللَّغْوَ أَعْرَضُوا عَنْهُ وَقَالُوا لَنَا أَعْمَالُنَا وَلَكُمْ أَعْمَالُكُمْ سَلَامٌ عَلَيْكُمْ لَا نَبْتَغِي الْجَاهِلِينَ
और जब किसी से कोई बुरी बात सुनी तो उससे किनारा कश रहे और साफ कह दिया कि हमारे वास्ते हमारी कारगुज़ारियाँ हैं और तुम्हारे वास्ते तुम्हारी कारस्तानियाँ (बस दूर ही से) तुम्हें सलाम है हम जाहिलो (की सोहबत) के ख्वाहॉ नहीं
56إِنَّكَ لَا تَهْدِي مَنْ أَحْبَبْتَ وَلَٰكِنَّ اللَّهَ يَهْدِي مَن يَشَاءُ ۚ وَهُوَ أَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِينَ
(ऐ रसूल) बेशक तुम जिसे चाहो मंज़िले मक़सूद तक नहीं पहुँचा सकते मगर हाँ जिसे खुदा चाहे मंज़िल मक़सूद तक पहुचाए और वही हिदायत याफ़ता लोगों से ख़ूब वाक़िफ़ है
57وَقَالُوا إِن نَّتَّبِعِ الْهُدَىٰ مَعَكَ نُتَخَطَّفْ مِنْ أَرْضِنَا ۚ أَوَلَمْ نُمَكِّن لَّهُمْ حَرَمًا آمِنًا يُجْبَىٰ إِلَيْهِ ثَمَرَاتُ كُلِّ شَيْءٍ رِّزْقًا مِّن لَّدُنَّا وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
(ऐ रसूल) कुफ्फ़ार (मक्का) तुमसे कहते हैं कि अगर हम तुम्हारे साथ दीन हक़ की पैरवी करें तो हम अपने मुल्क़ से उचक लिए जाएँ (ये क्या बकते है) क्या हमने उन्हें हरम (मक्का) में जहाँ हर तरह का अमन है जगह नहीं दी वहाँ हर किस्म के फल रोज़ी के वास्ते हमारी बारगाह से खिंचे चले जाते हैं मगर बहुतेरे लोग नहीं जाते
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अनुवाद — अल-क़सस 55

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Friday, October 2, 2026

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