अल-क़सस · 54/88
अनुवाद उच्चारण — अल-क़सस
أُولَٰئِكَ يُؤْتَوْنَ أَجْرَهُم مَّرَّتَيْنِ بِمَا صَبَرُوا وَيَدْرَءُونَ بِالْحَسَنَةِ السَّيِّئَةَ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنفِقُونَ ۝٥٤
Ulaaa`ika yu`tawna ajrahum marratayni bimaa sabaroo wa yadra`oona bil hasanatis saiyi`ata wa mimmmaa razaq naahum yunfiqoon
📖 हिंदी अर्थ
यही वह लोग हैं जिन्हें (इनके आमाले ख़ैर की) दोहरी जज़ा दी जाएगी-चूँकि उन लोगों ने सब्र किया और बदी को नेकी से दफ़ा करते हैं और जो कुछ हमने उन्हें अता किया है उसमें से (हमारी राह में) ख़र्च करते हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يُؤْتَوْنَ أَجْرَهُم مَّرَّتَيْنِ: उन्हें दो बार उनका प्रतिफल दिया जाएगा।
  • بِمَا صَبَرُوا: उनके धैर्य के कारण।
  • يَدْرَءُونَ بِالْحَسَنَةِ السَّيِّئَةَ: वे अच्छे काम से बुरे काम को दूर करते हैं।
  • يُنفِقُونَ: वे खर्च करते हैं।

तफ़सीर (व्याख्या):

ये वे लोग हैं जिनका ज़िक्र पिछली आयातों में हुआ—जो पहले से अल्लाह की किताबों पर ईमान रखते थे और जब उन्होंने क़ुरआन सुना तो उसे भी सच मान लिया। अल्लाह तआला उन्हें उनका पूरा-पूरा अज्र दो बार देगा: एक बार अपनी पिछली किताबों पर ईमान लाने और उन पर अमल करने का, और दूसरी बार क़ुरआन और रसूलुल्लाह ﷺ पर ईमान लाने और उस पर साबित क़दम रहने का। यह दोहरा अज्र उन्हें इसलिए मिलेगा क्योंकि उन्होंने सब्र किया—सब्र किया अपने धर्म पर क़ायम रहने में, सब्र किया सच्चाई को अपनाने में, और सब्र किया उन मुश्किलों में जो ईमान की राह में आईं।

उनकी एक खूबी यह भी है कि वे बुराई का जवाब अच्छाई से देते हैं। अगर कोई उन्हें नुक़सान पहुँचाए या बुरा भला कहे, तो वे बदला लेने के बजाय उसे माफ़ कर देते हैं, उसके साथ भलाई करते हैं, और अपने अच्छे आचरण से बुराई को दूर करते हैं। यही वह तरीक़ा है जिससे दिल बदलते हैं और दुश्मनी दोस्ती में बदल जाती है।

और अल्लाह ने उन्हें जो रोज़ी दी है, उसमें से वे उसकी राह में खर्च करते हैं—ग़रीबों पर, ज़रूरतमंदों पर, और अल्लाह की राह में। वे कंजूसी नहीं करते, बल्कि अल्लाह की दी हुई नेमतों को दूसरों के साथ बाँटते हैं।

यह वही लोग हैं जिनके बारे में अल्लाह ने आगे फ़रमाया कि जब वे बेकार और बुरी बातें सुनते हैं, तो उनसे किनारा कर लेते हैं और कहते हैं: "हमारे लिए हमारे कर्म हैं और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म। तुम्हें सलाम है, हम जाहिलों की तरह बनकर नहीं रहना चाहते।" यानी वे न तो बुराई में हिस्सा लेते हैं और न ही जहालत की राह पर चलते हैं।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की रहमत का दरवाज़ा सबके लिए खुला है। जो लोग पहले से सच्चाई पर थे और फिर इस्लाम की रोशनी उन तक पहुँची, उन्होंने उसे खुशी-खुशी क़बूल किया—अल्लाह ने उन्हें दोहरा अज्र देकर सम्मानित किया। यह हमारे लिए भी एक बड़ी खुशखबरी है कि अल्लाह इंसान की नीयत और उसकी मेहनत को देखता है। अगर हम सब्र करें, बुराई का जवाब अच्छाई से दें, और अपने माल में से अल्लाह की राह में खर्च करें, तो हम भी उन्हीं लोगों में शामिल हो सकते हैं जिन्हें अल्लाह की तरफ से दोहरा अज्र मिलेगा। यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम सिर्फ़ ईमान का नाम नहीं, बल्कि अच्छे अख़लाक़, दरियादिली और सब्र का भी नाम है। आओ, हम इन खूबियों को अपनाएँ और अल्लाह की रहमत के हक़दार बनें।



📜 आयत 52-56 — अल-क़सस

52الَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ مِن قَبْلِهِ هُم بِهِ يُؤْمِنُونَ
जिन लोगों को हमने इससे पहले किताब अता की है वह उस (क़ुरान) पर ईमान लाते हैं
53وَإِذَا يُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ قَالُوا آمَنَّا بِهِ إِنَّهُ الْحَقُّ مِن رَّبِّنَا إِنَّا كُنَّا مِن قَبْلِهِ مُسْلِمِينَ
और जब उनके सामने ये पढ़ा जाता है तो बोल उठते हैं कि हम तो इस पर ईमान ला चुके बेशक ये ठीक है (और) हमारे परवरदिगार की तरफ से है हम तो इसको पहले ही मानते थे
54أُولَٰئِكَ يُؤْتَوْنَ أَجْرَهُم مَّرَّتَيْنِ بِمَا صَبَرُوا وَيَدْرَءُونَ بِالْحَسَنَةِ السَّيِّئَةَ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنفِقُونَ
यही वह लोग हैं जिन्हें (इनके आमाले ख़ैर की) दोहरी जज़ा दी जाएगी-चूँकि उन लोगों ने सब्र किया और बदी को नेकी से दफ़ा करते हैं और जो कुछ हमने उन्हें अता किया है उसमें से (हमारी राह में) ख़र्च करते हैं
55وَإِذَا سَمِعُوا اللَّغْوَ أَعْرَضُوا عَنْهُ وَقَالُوا لَنَا أَعْمَالُنَا وَلَكُمْ أَعْمَالُكُمْ سَلَامٌ عَلَيْكُمْ لَا نَبْتَغِي الْجَاهِلِينَ
और जब किसी से कोई बुरी बात सुनी तो उससे किनारा कश रहे और साफ कह दिया कि हमारे वास्ते हमारी कारगुज़ारियाँ हैं और तुम्हारे वास्ते तुम्हारी कारस्तानियाँ (बस दूर ही से) तुम्हें सलाम है हम जाहिलो (की सोहबत) के ख्वाहॉ नहीं
56إِنَّكَ لَا تَهْدِي مَنْ أَحْبَبْتَ وَلَٰكِنَّ اللَّهَ يَهْدِي مَن يَشَاءُ ۚ وَهُوَ أَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِينَ
(ऐ रसूल) बेशक तुम जिसे चाहो मंज़िले मक़सूद तक नहीं पहुँचा सकते मगर हाँ जिसे खुदा चाहे मंज़िल मक़सूद तक पहुचाए और वही हिदायत याफ़ता लोगों से ख़ूब वाक़िफ़ है
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अनुवाद — अल-क़सस 54

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Tuesday, August 18, 2026

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