अल-क़सस · 87/88
अनुवाद उच्चारण — अल-क़सस
وَلَا يَصُدُّنَّكَ عَنْ آيَاتِ اللَّهِ بَعْدَ إِذْ أُنزِلَتْ إِلَيْكَ ۖ وَادْعُ إِلَىٰ رَبِّكَ ۖ وَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الْمُشْرِكِينَ ۝٨٧
Wa laa yasuddunnaka `an Aayaatil laahi ba`da iz unzilat ilaika wad`u ilaa Rabbika wa laa takonanna minal mushrikeen
📖 हिंदी अर्थ
कहीं ऐसा न हो एहकामे ख़ुदा वन्दी नाज़िल होने के बाद तुमको ये लोग उनकी तबलीग़ से रोक दें और तुम अपने परवरदिगार की तरफ (लोगों को) बुलाते जाओ और ख़बरदार मुशरेकीन से हरगिज़ न होना
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • يَصُدُّنَّكَ: तुम्हें रोकें या विमुख करें
  • آيَاتِ اللَّهِ: अल्लाह की आयतें (उसकी निशानियाँ और उसका कलाम)
  • أُنزِلَتْ إِلَيْكَ: जो तुम्हारी ओर उतारी गईं
  • وَادْعُ: और बुलाओ (निमंत्रण दो)
  • مِنَ الْمُشْرِكِينَ: मुशरिकों (शिर्क करने वालों) में से

तफ़सीर (व्याख्या):

इस पवित्र आयत में अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को एक बहुत ही महत्वपूर्ण निर्देश दे रहे हैं, और यही निर्देश हर उस इंसान के लिए है जो अल्लाह के दीन को अपनाना चाहता है। अल्लाह फ़रमाता है कि ऐ नबी! ये मुशरिक लोग तुम्हें अल्लाह की आयतों से रोकने की हर मुमकिन कोशिश करेंगे — कभी धमकियों से, कभी लालच से, कभी तानों से — लेकिन तुम उनके दबाव में मत आना। जब अल्लाह की आयतें तुम्हारे पास आ चुकी हैं, तो उन्हें पढ़ना, उन पर अमल करना और उन्हें लोगों तक पहुँचाना तुम्हारा फ़र्ज़ है। किसी भी इंसान की धमकी या किसी की भी राय तुम्हें इस रास्ते से नहीं हटा सकती।

फिर अल्लाह तआला फ़रमाता है: "और तुम अपने रब की ओर बुलाओ" — यानी लोगों को अल्लाह की तौहीद (एकता) की ओर, उसकी इबादत की ओर, और उसके बताए हुए रास्ते की ओर बुलाते रहो। यह बुलाना नरमी से, हिकमत से, और अच्छे तरीके से होना चाहिए। तुम्हारा काम सिर्फ़ पहुँचाना है, हिदायत देना अल्लाह के हाथ में है।

और अंत में अल्लाह फ़रमाता है: "और तुम हरगिज़ मुशरिकों में से मत होना" — यानी तुम उन लोगों में से नहीं हो जो अल्लाह के साथ किसी और को साझी ठहराते हैं। तुम तो उन लोगों में से हो जो सिर्फ़ अल्लाह की इबादत करते हैं, सिर्फ़ उसी से मदद माँगते हैं, और सिर्फ़ उसी के आगे सिर झुकाते हैं। यह एक पुकार है कि हर मुसलमान को अपने आपको शिर्क से पाक रखना चाहिए और पूरी ज़िंदगी तौहीद पर क़ायम रहना चाहिए।


दावत (आमंत्रण) का पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चाई पर क़ायम रहना कितना बड़ा सम्मान है। जब अल्लाह किसी को हिदायत दे देता है, तो उसे दुनिया की किसी भी ताक़त से डरने की ज़रूरत नहीं। यही वह रास्ता है जो इंसान को इस दुनिया में इज़्ज़त देता है और आख़िरत में कामयाबी। अल्लाह का दीन एक ऐसा खज़ाना है जो कभी घटता नहीं — जितना इसे बाँटोगे, उतना ही बढ़ेगा। और जो लोग अल्लाह की तरफ़ बुलाते हैं, अल्लाह उन्हें दुनिया और आख़िरत दोनों में बेहतरीन इनाम देता है। आइए, हम सब इस आयत से सीख लें कि अपने ईमान पर मज़बूती से क़ायम रहें, अल्लाह की आयतों को अपनी ज़िंदगी में उतारें, और दूसरों को भी इसी खूबसूरत रास्ते की तरफ़ बुलाएँ।

🎧 सुनें

📜 आयत 85-88 — अल-क़सस

85إِنَّ الَّذِي فَرَضَ عَلَيْكَ الْقُرْآنَ لَرَادُّكَ إِلَىٰ مَعَادٍ ۚ قُل رَّبِّي أَعْلَمُ مَن جَاءَ بِالْهُدَىٰ وَمَنْ هُوَ فِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ
(ऐ रसूल) ख़ुदा जिसने तुम पर क़ुरान नाज़िल किया ज़रुर ठिकाने तक पहुँचा देगा (ऐ रसूल) तुम कह दो कि कौन राह पर आया और कौन सरीही गुमराही में पड़ा रहा
86وَمَا كُنتَ تَرْجُو أَن يُلْقَىٰ إِلَيْكَ الْكِتَابُ إِلَّا رَحْمَةً مِّن رَّبِّكَ ۖ فَلَا تَكُونَنَّ ظَهِيرًا لِّلْكَافِرِينَ
इससे मेरा परवरदिगार ख़ूब वाक़िफ है और तुमको तो ये उम्मीद न थी कि तुम्हारे पास ख़ुदा की तरफ से किताब नाज़िल की जाएगी मगर तुम्हारे परवरदिगार की मेहरबानी से नाज़िल हुई तो तुम हरग़िज़ काफिरों के पुश्त पनाह न बनना
87وَلَا يَصُدُّنَّكَ عَنْ آيَاتِ اللَّهِ بَعْدَ إِذْ أُنزِلَتْ إِلَيْكَ ۖ وَادْعُ إِلَىٰ رَبِّكَ ۖ وَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الْمُشْرِكِينَ
कहीं ऐसा न हो एहकामे ख़ुदा वन्दी नाज़िल होने के बाद तुमको ये लोग उनकी तबलीग़ से रोक दें और तुम अपने परवरदिगार की तरफ (लोगों को) बुलाते जाओ और ख़बरदार मुशरेकीन से हरगिज़ न होना
88وَلَا تَدْعُ مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ ۘ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۚ كُلُّ شَيْءٍ هَالِكٌ إِلَّا وَجْهَهُ ۚ لَهُ الْحُكْمُ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
और ख़ुदा के सिवा किसी और माबूद की परसतिश न करना उसके सिवा कोई क़ाबिले परसतिश नहीं उसकी ज़ात के सिवा हर चीज़ फना होने वाली है उसकी हुकूमत है और तुम लोग उसकी तरफ़ (मरने के बाद) लौटाये जाओगे
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अनुवाद — अल-क़सस 87

सूरा अल-क़सस आयत 87 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : कहीं ऐसा न हो एहकामे ख़ुदा वन्दी नाज़िल होने के…

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Tuesday, August 18, 2026

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