अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- يَا عِبَادِيَ – ऐ मेरे बंदों
- الَّذِينَ آمَنُوا – जो ईमान लाए हैं
- إِنَّ أَرْضِي وَاسِعَةٌ – निस्संदेह मेरी धरती विशाल है
- فَإِيَّايَ فَاعْبُدُونِ – तो केवल मेरी ही इबादत करो
तफ़सीर:
अल्लाह तआला अपने ईमानवाले बंदों को संबोधित करते हुए फ़रमाता है: "ऐ मेरे बंदों, जो मुझ पर ईमान लाए हो!" यह एक अत्यंत प्रेमपूर्ण और करीबी संबोधन है, जो अल्लाह की ओर से उसके बंदों के प्रति गहरे स्नेह और दयालुता को दर्शाता है। अल्लाह अपने बंदों को यह संदेश देता है कि यदि किसी स्थान पर तुम्हें अपने दीन पर अमल करने, अल्लाह की इबादत करने और अपने ईमान को प्रकट करने में कठिनाई हो रही है, या तुम्हें सताया जा रहा है, तो निराश मत होना। अल्लाह की धरती विशाल है, उसमें कई स्थान हैं। जहाँ तुम स्वतंत्रता से अल्लाह की इबादत कर सको, वहाँ हिजरत (प्रवास) कर लो। अल्लाह ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि हिजरत का उद्देश्य केवल और केवल अल्लाह की इबादत होनी चाहिए — "तो केवल मेरी ही इबादत करो।" अर्थात्, तुम जहाँ भी रहो, अपनी इबादत को केवल अल्लाह के लिए विशेष रखो, किसी को उसमें साझी न बनाओ।
यह आयत मक्का के उन कमज़ोर मुसलमानों के बारे में उतरी जिन्हें काफ़िरों द्वारा सताया जाता था, और वे हिजरत करने से डरते थे क्योंकि उन्हें भूख का भय था। अल्लाह ने उन्हें आश्वस्त किया कि वह उन्हें जहाँ भी रखेगा, रोज़ी देगा। अल्लाह की धरती विस्तृत है, और वह अपने बंदों की रोज़ी का ज़िम्मेदार है। यदि किसी स्थान पर धर्म के अनुसार जीना कठिन हो, तो दूसरे स्थान पर चले जाओ, क्योंकि अल्लाह की ज़मीन सीमित नहीं है।
इस आयत में एक महान शिक्षा है कि मुसलमान को कभी भी अपने ईमान और इबादत से समझौता नहीं करना चाहिए। यदि उसे किसी स्थान पर अपने दीन पर अमल करने से रोका जाए, तो उसे हिजरत करने में संकोच नहीं करना चाहिए। अल्लाह की धरती विशाल है, और वहाँ उसकी इबादत के लिए जगह मिल सकती है। यह आयत मुसलमानों को साहस, धैर्य और अल्लाह पर भरोसा करने की शिक्षा देती है। अल्लाह ने यह भी बताया कि हिजरत का मूल उद्देश्य अल्लाह की इबादत को सुरक्षित रखना है, और यही सच्चे ईमान की निशानी है।
इस आयत से हमें यह भी सीख मिलती है कि अल्लाह अपने बंदों से बहुत प्रेम करता है और उनकी भलाई चाहता है। वह उन्हें कठिनाइयों में अकेला नहीं छोड़ता, बल्कि उन्हें रास्ते दिखाता है। यह आयत हमें यह भी याद दिलाती है कि इस दुनिया में मुसलमान की असली पहचान उसकी इबादत और अल्लाह के प्रति समर्पण है। जहाँ यह इबादत खतरे में पड़े, वहाँ से निकलना और किसी और स्थान पर अल्लाह की इबादत जारी रखना ही सच्चा ईमान है। अल्लाह हमें इसका अमल करने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।
📜 आयत 54-58 — अल-अंकबूत
अनुवाद — अल-अंकबूत 56
सूरा अल-अंकबूत आयत 56 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : ऐ मेरे ईमानदार बन्दों मेरी ज़मीन तो यक़ीनन कुशादा है…सूरा आयत 56/69 — अल-अंकबूत العنكبوت (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-अंकबूत सुनें, अल-अंकबूत अनुवाद, अल-अंकबूत mp3, अल-अंकबूत pdf. आयत 54–58. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए








