अल-अंकबूत · 68/69
अनुवाद उच्चारण — अल-अंकबूत
وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرَىٰ عَلَى اللَّهِ كَذِبًا أَوْ كَذَّبَ بِالْحَقِّ لَمَّا جَاءَهُ ۚ أَلَيْسَ فِي جَهَنَّمَ مَثْوًى لِّلْكَافِرِينَ ۝٦٨
Wa man azlamu mimma nif taraa `alal laahi kaziban aw kazzaba bilhaqqi lammaa jaaa`ah; alaisa fee jahannama maswal lil kaafireen
📖 हिंदी अर्थ
और जो शख्स ख़ुदा पर झूठ बोहतान बॉधे या जब उसके पास कोई सच्ची बात आए तो झुठला दे इससे बढ़कर ज़ालिम कौन होगा क्या (इन) काफिरों का ठिकाना जहन्नुम में नहीं है (ज़रुर है)

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • افْتَرَى عَلَى اللَّهِ كَذِبًا: अल्लाह पर झूठा आरोप लगाना, अर्थात अल्लाह के बारे में ऐसी बातें कहना जो सत्य नहीं हैं, जैसे उसका कोई साझीदार या संतान होना।
  • كَذَّبَ بِالْحَقِّ: सत्य को झुठलाना, अर्थात जो सत्य (क़ुरआन और इस्लाम) आ चुका है उसे न मानना।
  • مَثْوًى: निवास स्थान, ठिकाना, रहने की जगह।

तफ़सीर:

इस आयत में अल्लाह तआला सबसे बड़े ज़ुल्म (अत्याचार) की ओर इशारा कर रहे हैं। अल्लाह ने पूछा: "उस व्यक्ति से बढ़कर ज़ालिम और कौन हो सकता है जो अल्लाह पर झूठा आरोप लगाए, यानी अल्लाह के बारे में ऐसी बातें कहे जो उसकी पाक ज़ात के लायक़ नहीं हैं — जैसे यह कहना कि अल्लाह का कोई साझीदार है या उसकी कोई संतान है — या फिर उस सत्य को झुठलाए जो उसके पास आ चुका है, यानी क़ुरआन और रसूलुल्लाह ﷺ की शिक्षाओं को न माने, जबकि उसके पास सत्य स्पष्ट रूप से आ चुका हो।"

यह दोनों काम सबसे बड़े ज़ुल्म हैं, क्योंकि पहला अल्लाह की पाक ज़ात के खिलाफ झूठ है, और दूसरा उस सत्य को ठुकराना है जो इंसान की हिदायत के लिए आया है। ऐसे लोगों ने न सिर्फ़ अपनी ज़ात पर ज़ुल्म किया, बल्कि अल्लाह के दीन और उसके बंदों के हक़ में भी ज़ुल्म किया।

फिर अल्लाह तआला सवालिया अंदाज़ में फ़रमाते हैं: "क्या जहन्नम में ऐसे काफ़िरों के लिए ठिकाना नहीं है?" यानी इसमें कोई शक नहीं कि जहन्नम उन्हीं के लिए है जो अल्लाह पर झूठ बाँधते हैं और सत्य को झुठलाते हैं। यह एक चेतावनी है कि अल्लाह की रहमत से वंचित होकर उनका ठिकाना जहन्नम होगा, जहाँ वे हमेशा रहेंगे।


दावती पहलू:

यह आयत हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हमारा रिश्ता सत्य से कैसा है। जो व्यक्ति सत्य को पहचान कर उसे अपना लेता है, वह दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाब होता है। अल्लाह ने हमें अक़्ल दी है, क़ुरआन दिया है, और रसूल ﷺ भेजे हैं — यह सब हमारी हिदायत के लिए है। जो इन नेअमतों को ठुकरा दे, वह अपने ऊपर ज़ुल्म करता है।

लेकिन अल्लाह की रहमत बहुत बड़ी है — जो भी सत्य को अपनाने के लिए तैयार हो, अल्लाह उसके गुनाह माफ़ कर देता है। यह आयत हमें सच्चाई की तरफ़ लौटने की तरग़ीब देती है और बताती है कि सत्य को क़बूल करने में ही हमारी भलाई है। अल्लाह से डरें और उसके दीन को अपनाएँ, ताकि हम उन लोगों में से न हों जिनका ठिकाना जहन्नम है। अल्लाह हमें सत्य को समझने और उस पर चलने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 66-69 — अल-अंकबूत

66لِيَكْفُرُوا بِمَا آتَيْنَاهُمْ وَلِيَتَمَتَّعُوا ۖ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ
ताकि जो (नेअमतें) हमने उन्हें अता की हैं उनका इन्कार कर बैठें और ताकि (दुनिया में) ख़ूब चैन कर लें तो अनक़रीब ही (इसका नतीजा) उन्हें मालूम हो जाएगा
67أَوَلَمْ يَرَوْا أَنَّا جَعَلْنَا حَرَمًا آمِنًا وَيُتَخَطَّفُ النَّاسُ مِنْ حَوْلِهِمْ ۚ أَفَبِالْبَاطِلِ يُؤْمِنُونَ وَبِنِعْمَةِ اللَّهِ يَكْفُرُونَ
क्या उन लोगों ने इस पर ग़ौर नहीं किया कि हमने हरम (मक्का) को अमन व इत्मेनान की जगह बनाया हालॉकि उनके गिर्द व नवाह से लोग उचक ले जाते हैं तो क्या ये लोग झूठे माबूदों पर ईमान लाते हैं और ख़ुदा की नेअमत की नाशुक्री करते हैं
68وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرَىٰ عَلَى اللَّهِ كَذِبًا أَوْ كَذَّبَ بِالْحَقِّ لَمَّا جَاءَهُ ۚ أَلَيْسَ فِي جَهَنَّمَ مَثْوًى لِّلْكَافِرِينَ
और जो शख्स ख़ुदा पर झूठ बोहतान बॉधे या जब उसके पास कोई सच्ची बात आए तो झुठला दे इससे बढ़कर ज़ालिम कौन होगा क्या (इन) काफिरों का ठिकाना जहन्नुम में नहीं है (ज़रुर है)
69وَالَّذِينَ جَاهَدُوا فِينَا لَنَهْدِيَنَّهُمْ سُبُلَنَا ۚ وَإِنَّ اللَّهَ لَمَعَ الْمُحْسِنِينَ
और जिन लोगों ने हमारी राह में जिहाद किया उन्हें हम ज़रुर अपनी राह की हिदायत करेंगे और इसमें शक नही कि ख़ुदा नेकोकारों का साथी है
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Tuesday, August 18, 2026

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