यह (मुख्बिर) बस शैतान था जो सिर्फ़ अपने दोस्तों को (रसूल का साथ देने से) डराता है पस तुम उनसे तो डरो नहीं अगर सच्चे मोमिन हो तो मुझ ही से डरते रहो
📜
अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
يُخَوِّفُ: डराता है, भय दिखाता है।
أَوْلِيَاءَهُ: उसके मित्र, उसके साथी (यहाँ अर्थ: काफ़िर और मुशरिकीन)।
فَلَا تَخَافُوهُمْ: उनसे मत डरो।
وَخَافُونِ: और मुझसे डरो (अर्थात मेरा भय रखो)।
तफ़सीर:
अल्लाह तआला अपने ईमानवालों को संबोधित करते हुए फ़रमाता है कि जो लोग तुम्हें (उहुद के मैदान से लौटने के बाद) डरा रहे थे कि "लोगों (काफ़िरों) ने तुम्हारे ख़िलाफ़ बड़ी ताकत जमा कर ली है, उनसे डरो" — वह डराने वाला दरअसल शैतान है, जो अपने मित्रों (काफ़िरों) के ज़रिए तुम्हें भय दिखा रहा है। शैतान का मक़सद यही है कि तुम काफ़िरों के डर से जिहाद छोड़ दो और कमज़ोर पड़ जाओ। अल्लाह तआला फ़रमाता है: उन (शैतान और उसके साथियों) से मत डरो, क्योंकि उनके पास न कोई ताक़त है और न कोई सहारा। बल्कि सिर्फ़ मुझसे डरो — यानी मेरे हुक्म की पालना में कमी न करो, मेरी नाफ़रमानी से बचो — अगर तुम सच्चे ईमान वाले हो। क्योंकि ईमान का तक़ाज़ा यही है कि बंदा अल्लाह का भय सबसे बढ़कर रखे और उसी पर भरोसा करे। जो व्यक्ति अल्लाह पर ईमान रखता है, उसे किसी मख़लूक़ के डर से पीछे नहीं हटना चाहिए, क्योंकि अल्लाह ही सब कुछ करने पर क़ादिर है।
फ़ायदे (सबक़):
शैतान का एक बड़ा हथियार मुसलमानों के दिलों में डर पैदा करना है, ताकि वे अल्लाह के काम (जिहाद, नेकी) से रुक जाएँ। इसलिए मोमिन को चाहिए कि वह शैतान के इस दाओं में न आए।
अल्लाह का डर हर डर से बड़ा और बेहतर है। जब बंदे के दिल में अल्लाह का डर होता है, तो दुनिया का हर डर ख़त्म हो जाता है।
यह आयत मुसलमानों को हौसला और हिम्मत देती है कि दुश्मनों की तादाद या ताक़त से घबराएँ नहीं, बल्कि अल्लाह पर भरोसा रखें — क्योंकि अल्लाह ही असली मददगार है।
सच्चा ईमान वही है जो अमल में ज़ाहिर हो — यानी अल्लाह के हुक्म के आगे सर झुकाना और उसकी नाफ़रमानी से बचना।
यह आयत मुसलमानों को सिखाती है कि दुश्मन की धमकियों को कभी गंभीरता से न लें, क्योंकि असली इज़्ज़त और क़ुदरत तो अल्लाह के हाथ में है।
यह वह हैं कि जब उनसे लोगों ने आकर कहना शुरू किया कि (दुशमन) लोगों ने तुम्हारे (मुक़ाबले के) वास्ते (बड़ा लश्कर) जमा किया है पस उनसे डरते (तो बजाए ख़ौफ़ के) उनका ईमान और ज्यादा हो गया और कहने लगे (होगा भी) ख़ुदा हमारे वास्ते काफ़ी है
और वह क्या अच्छा कारसाज़ है फिर (या तो हिम्मत करके गए मगर जब लड़ाई न हुई तो) ये लोग ख़ुदा की नेअमत और फ़ज़ल के साथ (अपने घर) वापस आए और उन्हें कोई बुराई छू भी नहीं गयी और ख़ुदा की ख़ुशनूदी के पाबन्द रहे और ख़ुदा बड़ा फ़ज़ल करने वाला है
और (ऐ रसूल) जो लोग कुफ़्र की (मदद) में पेश क़दमी कर जाते हैं उनकी वजह से तुम रन्ज न करो क्योंकि ये लोग ख़ुदा को कुछ ज़रर नहीं पहुँचा सकते (बल्कि) ख़ुदा तो ये चाहता है कि आख़ेरत में उनका हिस्सा न क़रार दे और उनके लिए बड़ा (सख्त) अज़ाब है
सूराकुरान वेबसाइट की स्थापना पवित्र किताब और पाक सुन्नत की सेवा, अल्लाह की ओर बुलावा, और कुरान व सुन्नत के मार्ग पर धार्मिक विज्ञान को सुगम बनाने के एक विनम्र प्रयास के रूप में की गई थी। हम अल्लाह की प्रशंसा और उसके अनुग्रह के लिए धन्यवाद करते हैं, और उससे प्रार्थना करते हैं कि वह हमारे कार्यों को स्वीकार करे और उन्हें केवल उसके महान चेहरे के लिए विशुद्ध बनाए।