आल-इमरान · 176/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
وَلَا يَحْزُنكَ الَّذِينَ يُسَارِعُونَ فِي الْكُفْرِ ۚ إِنَّهُمْ لَن يَضُرُّوا اللَّهَ شَيْئًا ۗ يُرِيدُ اللَّهُ أَلَّا يَجْعَلَ لَهُمْ حَظًّا فِي الْآخِرَةِ ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ ۝١٧٦
Wa laa yahzunkal lazeena yusaari`oona fil Kufr; innahum lai yadurrul laaha shai`aa; yureedul laahu allaa yaj`ala lahum hazzan fil Aakhirati wa lahum `azaabun `azeem
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ रसूल) जो लोग कुफ़्र की (मदद) में पेश क़दमी कर जाते हैं उनकी वजह से तुम रन्ज न करो क्योंकि ये लोग ख़ुदा को कुछ ज़रर नहीं पहुँचा सकते (बल्कि) ख़ुदा तो ये चाहता है कि आख़ेरत में उनका हिस्सा न क़रार दे और उनके लिए बड़ा (सख्त) अज़ाब है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يُسَارِعُونَ فِي الْكُفْرِ: कुफ्र (इनकार) की ओर तेज़ी से बढ़ने वाले।
  • حَظًّا: हिस्सा, भाग, नसीब।
  • عَذَابٌ عَظِيمٌ: बहुत बड़ा दर्दनाक अज़ाब।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! जो लोग कुफ्र (इनकार) की तरफ तेज़ी से बढ़ रहे हैं, उनकी वजह से आप उदास न हों और न ही आपके दिल में कोई ग़म आए। ये लोग इस्लाम के दुश्मनों के साथ मिलकर सच्चाई को दबाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उनकी ये सारी कोशिशें अल्लाह को कोई नुक़सान नहीं पहुँचा सकतीं। वे भले ही ये समझते हों कि वे कुछ कर रहे हैं, लेकिन हक़ीक़त में वे सिर्फ़ अपना ही नुक़सान कर रहे हैं। उनकी ये दौड़-धूप उन्हें अल्लाह की रहमत से दूर कर रही है और वे खुद को उस महान इनाम से महरूम कर रहे हैं जो अल्लाह ने अपने नेक बंदों के लिए तैयार किया है।

अल्लाह ने अपनी हिकमत से उन्हें सफलता से महरूम रखा है, क्योंकि उन्होंने सच्चाई को ठुकराकर गुमराही को अपना लिया है। अल्लाह चाहता है कि आख़िरत (परलोक) में उनका कोई हिस्सा न हो — न उन्हें जन्नत की नेअमतें मिलें, न अल्लाह की रज़ा, बल्कि उनके लिए एक बहुत बड़ा और दर्दनाक अज़ाब तैयार है।

इस आयत में अल्लाह अपने नबी को तसल्ली दे रहा है और उन्हें ये सिखा रहा है कि किसी की नाफ़रमानी और दुश्मनी आपको रंजीदा न करे। ये लोग अल्लाह के दीन को नुक़सान नहीं पहुँचा सकते, क्योंकि अल्लाह का दीन महफ़ूज़ है और उसकी मदद का वादा है। मोमिन के लिए ये सबक़ है कि वह अपने अमल पर ध्यान दे, अल्लाह की राह पर चलता रहे और दुश्मनों की साज़िशों से घबराए नहीं। अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है और वही अपने बंदों की मदद करने वाला है।

ये आयत हमें ये भी सिखाती है कि कुफ्र और नाफ़रमानी की राह चुनने वालों का अंजाम बहुत बुरा है। वे चाहे दुनिया में कितनी भी तरक़्क़ी कर लें, आख़िरत में उनका कोई हिस्सा नहीं। इसलिए हमें चाहिए कि हम अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की रज़ा के मुताबिक़ बनाएँ, उसकी इबादत करें और उसके रास्ते पर चलें। अल्लाह की रहमत और उसका इनाम उन्हीं के लिए है जो उस पर ईमान लाते हैं और नेक अमल करते हैं।



📜 आयत 174-178 — आल-इमरान

174فَانقَلَبُوا بِنِعْمَةٍ مِّنَ اللَّهِ وَفَضْلٍ لَّمْ يَمْسَسْهُمْ سُوءٌ وَاتَّبَعُوا رِضْوَانَ اللَّهِ ۗ وَاللَّهُ ذُو فَضْلٍ عَظِيمٍ
और वह क्या अच्छा कारसाज़ है फिर (या तो हिम्मत करके गए मगर जब लड़ाई न हुई तो) ये लोग ख़ुदा की नेअमत और फ़ज़ल के साथ (अपने घर) वापस आए और उन्हें कोई बुराई छू भी नहीं गयी और ख़ुदा की ख़ुशनूदी के पाबन्द रहे और ख़ुदा बड़ा फ़ज़ल करने वाला है
175إِنَّمَا ذَٰلِكُمُ الشَّيْطَانُ يُخَوِّفُ أَوْلِيَاءَهُ فَلَا تَخَافُوهُمْ وَخَافُونِ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
यह (मुख्बिर) बस शैतान था जो सिर्फ़ अपने दोस्तों को (रसूल का साथ देने से) डराता है पस तुम उनसे तो डरो नहीं अगर सच्चे मोमिन हो तो मुझ ही से डरते रहो
176وَلَا يَحْزُنكَ الَّذِينَ يُسَارِعُونَ فِي الْكُفْرِ ۚ إِنَّهُمْ لَن يَضُرُّوا اللَّهَ شَيْئًا ۗ يُرِيدُ اللَّهُ أَلَّا يَجْعَلَ لَهُمْ حَظًّا فِي الْآخِرَةِ ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ
और (ऐ रसूल) जो लोग कुफ़्र की (मदद) में पेश क़दमी कर जाते हैं उनकी वजह से तुम रन्ज न करो क्योंकि ये लोग ख़ुदा को कुछ ज़रर नहीं पहुँचा सकते (बल्कि) ख़ुदा तो ये चाहता है कि आख़ेरत में उनका हिस्सा न क़रार दे और उनके लिए बड़ा (सख्त) अज़ाब है
177إِنَّ الَّذِينَ اشْتَرَوُا الْكُفْرَ بِالْإِيمَانِ لَن يَضُرُّوا اللَّهَ شَيْئًا وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
बेशक जिन लोगों ने ईमान के एवज़ कुफ़्र ख़रीद किया वह हरगिज़ खुदा का कुछ भी नहीं बिगाड़ेंगे (बल्कि आप अपना) और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है
178وَلَا يَحْسَبَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا أَنَّمَا نُمْلِي لَهُمْ خَيْرٌ لِّأَنفُسِهِمْ ۚ إِنَّمَا نُمْلِي لَهُمْ لِيَزْدَادُوا إِثْمًا ۚ وَلَهُمْ عَذَابٌ مُّهِينٌ
और जिन लोगों ने कुफ़्र इख्तियार किया वह हरगिज़ ये न ख्याल करें कि हमने जो उनको मोहलत व बेफिक्री दे रखी है वह उनके हक़ में बेहतर है (हालॉकि) हमने मोहल्लत व बेफिक्री सिर्फ इस वजह से दी है ताकि वह और ख़ूब गुनाह कर लें और (आख़िर तो) उनके लिए रूसवा करने वाला अज़ाब है
आल-इमरानकुरान सूची
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अनुवाद — आल-इमरान 176

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Tuesday, August 18, 2026

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