आल-इमरान · 31/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
قُلْ إِن كُنتُمْ تُحِبُّونَ اللَّهَ فَاتَّبِعُونِي يُحْبِبْكُمُ اللَّهُ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ذُنُوبَكُمْ ۗ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ ۝٣١
Qul in kuntum tuhibboonal laaha fattabi` oonee yuhbibkumul laahu wa yaghfir lakum zunoobakum; wallaahu Ghafoorur Raheem
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) उन लोगों से कह दो कि अगर तुम ख़ुदा को दोस्त रखते हो तो मेरी पैरवी करो कि ख़ुदा (भी) तुमको दोस्त रखेगा और तुमको तुम्हारे गुनाह बख्श देगा और खुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • تُحِبُّونَ اللَّهَ: अल्लाह से प्रेम करते हो।
  • فَاتَّبِعُونِي: मेरा अनुसरण करो, मेरी पैरवी करो।
  • يُحْبِبْكُمُ اللَّهُ: अल्लाह तुमसे प्रेम करेगा।
  • غَفُورٌ رَّحِيمٌ: अत्यंत क्षमाशील, अत्यंत दयावान।

व्याख्या:

हे नबी! आप कह दीजिए कि यदि तुम सच्चे दिल से अल्लाह से प्रेम करते हो, तो मेरी शिक्षाओं और मेरे मार्ग का अनुसरण करो—अपने बाहरी कर्मों और आंतरिक विश्वास दोनों में। यही प्रेम का वास्तविक प्रमाण है। जो व्यक्ति इस प्रकार मेरा अनुसरण करेगा, अल्लाह उससे प्रेम करेगा और उसके पापों को क्षमा कर देगा। निस्संदेह, अल्लाह अपने ईमानवाले सेवकों के पापों को क्षमा करने वाला और उन पर दया करने वाला है।

यह आयत उन सभी लोगों के लिए निर्णायक प्रमाण है जो अल्लाह से प्रेम का दावा करते हैं। यहूदियों और ईसाइयों ने दावा किया था कि हम अल्लाह के प्रिय हैं, लेकिन अल्लाह ने स्पष्ट कर दिया कि प्रेम का दावा केवल शब्दों से नहीं, बल्कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के आदेशों और निषेधों का पालन करने से सिद्ध होता है। जो व्यक्ति इस दावे में सच्चा है, उसका कर्तव्य है कि वह नबी के मार्ग को अपनाए, क्योंकि नबी ही अल्लाह के आदेशों का सच्चा प्रतिनिधि है। इसके बिना प्रेम का दावा झूठा है।

शिक्षाएँ और लाभ:

  1. अल्लाह से प्रेम का वास्तविक प्रमाण नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का अनुसरण है। केवल मौखिक दावा पर्याप्त नहीं।
  2. यह आयत प्रेम के उस सिद्धांत को स्थापित करती है जो ईमान की मूल भावना है—अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने का मार्ग नबी की पैरवी में है।
  3. अल्लाह की क्षमा और दया असीम है; वह अपने सेवकों के पापों को क्षमा करने के लिए तैयार है, बशर्ते वे सच्चे दिल से उसकी ओर लौटें।
  4. यह आयत मुसलमानों को सिखाती है कि प्रेम केवल भावना नहीं, बल्कि व्यावहारिक आज्ञाकारिता है। यह उन्हें नबी की सुन्नत को अपनाने और उस पर दृढ़ रहने की प्रेरणा देती है।
  5. यहाँ से हमें यह सीख मिलती है कि अल्लाह की राह में प्रेम और आज्ञाकारिता ही सच्ची सफलता की कुंजी है, जो पापों की क्षमा और अल्लाह की प्रसन्नता का कारण बनती है।


📜 आयत 29-33 — आल-इमरान

29قُلْ إِن تُخْفُوا مَا فِي صُدُورِكُمْ أَوْ تُبْدُوهُ يَعْلَمْهُ اللَّهُ ۗ وَيَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۗ وَاللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
ऐ रसूल तुम उन (लोगों से) कह दो किजो कुछ तुम्हारे दिलों में है तो ख्वाह उसे छिपाओ या ज़ाहिर करो (बहरहाल) ख़ुदा तो उसे जानता है और जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में वह (सब कुछ) जानता है और ख़ुदा हर चीज़ पर क़ादिर है
30يَوْمَ تَجِدُ كُلُّ نَفْسٍ مَّا عَمِلَتْ مِنْ خَيْرٍ مُّحْضَرًا وَمَا عَمِلَتْ مِن سُوءٍ تَوَدُّ لَوْ أَنَّ بَيْنَهَا وَبَيْنَهُ أَمَدًا بَعِيدًا ۗ وَيُحَذِّرُكُمُ اللَّهُ نَفْسَهُ ۗ وَاللَّهُ رَءُوفٌ بِالْعِبَادِ
(और उस दिन को याद रखो) जिस दिन हर शख्स जो कुछ उसने (दुनिया में) नेकी की है और जो कुछ बुराई की है उसको मौजूद पाएगा (और) आरज़ू करेगा कि काश उस की बदी और उसके दरमियान में ज़मानए दराज़ (हाएल) हो जाता और ख़ुदा तुमको अपने ही से डराता है और ख़ुदा अपने बन्दों पर बड़ा शफ़ीक़ और (मेहरबान भी) है
31قُلْ إِن كُنتُمْ تُحِبُّونَ اللَّهَ فَاتَّبِعُونِي يُحْبِبْكُمُ اللَّهُ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ذُنُوبَكُمْ ۗ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
(ऐ रसूल) उन लोगों से कह दो कि अगर तुम ख़ुदा को दोस्त रखते हो तो मेरी पैरवी करो कि ख़ुदा (भी) तुमको दोस्त रखेगा और तुमको तुम्हारे गुनाह बख्श देगा और खुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
32قُلْ أَطِيعُوا اللَّهَ وَالرَّسُولَ ۖ فَإِن تَوَلَّوْا فَإِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْكَافِرِينَ
(ऐ रसूल) कह दो कि ख़ुदा और रसूल की फ़रमाबरदारी करो फिर अगर यह लोग उससे सरताबी करें तो (समझ लें कि) ख़ुदा काफ़िरों को हरगिज़ दोस्त नहीं रखता
33۞ إِنَّ اللَّهَ اصْطَفَىٰ آدَمَ وَنُوحًا وَآلَ إِبْرَاهِيمَ وَآلَ عِمْرَانَ عَلَى الْعَالَمِينَ
बेशक ख़ुदा ने आदम और नूह और ख़ानदाने इबराहीम और खानदाने इमरान को सारे जहान से बरगुज़ीदा किया है
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अनुवाद — आल-इमरान 31

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Tuesday, August 18, 2026

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