आल-इमरान · 32/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
قُلْ أَطِيعُوا اللَّهَ وَالرَّسُولَ ۖ فَإِن تَوَلَّوْا فَإِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْكَافِرِينَ ۝٣٢
Qul atee`ul laaha war Rasoola fa in tawallaw fa innal laaha laa yuhibbul kaafireen
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) कह दो कि ख़ुदा और रसूल की फ़रमाबरदारी करो फिर अगर यह लोग उससे सरताबी करें तो (समझ लें कि) ख़ुदा काफ़िरों को हरगिज़ दोस्त नहीं रखता

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَطِيعُوا: आज्ञा का पालन करो, हुक्म मानो।
  • تَوَلَّوْا: मुँह मोड़ लें, आज्ञा मानने से इनकार कर दें।
  • الْكَافِرِينَ: जो लोग अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा को न मानें और उसे झुठलाएँ।

तफसीर (व्याख्या):

ऐ नबी! आप कह दीजिए कि अल्लाह की आज्ञा का पालन करो, उसकी किताब (क़ुरआन) पर अमल करके, और रसूल की आज्ञा का पालन करो, उसकी सुन्नत (जीवन-पद्धति) पर चलकर — चाहे वह आपके जीवनकाल में हो या आपके बाद। यह आज्ञा हर उस आदेश को मानने पर लागू होती है जो अल्लाह ने दिया है और हर उस निषेध से बचने पर जो उसने रोका है। लेकिन अगर ये लोग आपकी बात मानने से मुँह मोड़ लें और अपनी ज़िद और अवज्ञा पर अड़े रहें, तो वे जान लें कि अल्लाह ऐसे काफ़िरों से प्रेम नहीं करता — जो उसकी और उसके रसूल की आज्ञा का उल्लंघन करते हैं। अल्लाह की नापसंदगी और उसकी यात्रा उन्हीं के लिए है, और उनके लिए कोई क्षमा भी नहीं है।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि अल्लाह की आज्ञा और रसूल की आज्ञा को अलग नहीं किया जा सकता — दोनों एक ही सूत्र में बँधे हैं। जो रसूल की सुन्नत को छोड़कर केवल क़ुरआन पर चलने का दावा करता है, वह वास्तव में अल्लाह की आज्ञा का भी उल्लंघन करता है।
  2. अल्लाह की मुहब्बत पाने का एकमात्र रास्ता उसकी और उसके रसूल की आज्ञा का पालन है। जो इस रास्ते से हटता है, वह अल्लाह की मुहब्बत से वंचित रह जाता है — और यह सबसे बड़ी हानि है।
  3. यह आयत हमें चेतावनी देती है कि अवज्ञा और घमंड इंसान को कुफ़्र तक ले जा सकता है। इसलिए हमें हर हाल में नम्रता और विनम्रता के साथ अल्लाह के हुक्मों को क़बूल करना चाहिए।
  4. इस आयत में मोमिनों के लिए खुशखबरी है कि अल्लाह उन्हें प्यार करता है जो उसकी आज्ञा का पालन करते हैं, और यही प्यार सबसे बड़ी नेमत है जो इंसान को दुनिया और आख़िरत में कामयाबी देता है।


📜 आयत 30-34 — आल-इमरान

30يَوْمَ تَجِدُ كُلُّ نَفْسٍ مَّا عَمِلَتْ مِنْ خَيْرٍ مُّحْضَرًا وَمَا عَمِلَتْ مِن سُوءٍ تَوَدُّ لَوْ أَنَّ بَيْنَهَا وَبَيْنَهُ أَمَدًا بَعِيدًا ۗ وَيُحَذِّرُكُمُ اللَّهُ نَفْسَهُ ۗ وَاللَّهُ رَءُوفٌ بِالْعِبَادِ
(और उस दिन को याद रखो) जिस दिन हर शख्स जो कुछ उसने (दुनिया में) नेकी की है और जो कुछ बुराई की है उसको मौजूद पाएगा (और) आरज़ू करेगा कि काश उस की बदी और उसके दरमियान में ज़मानए दराज़ (हाएल) हो जाता और ख़ुदा तुमको अपने ही से डराता है और ख़ुदा अपने बन्दों पर बड़ा शफ़ीक़ और (मेहरबान भी) है
31قُلْ إِن كُنتُمْ تُحِبُّونَ اللَّهَ فَاتَّبِعُونِي يُحْبِبْكُمُ اللَّهُ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ذُنُوبَكُمْ ۗ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
(ऐ रसूल) उन लोगों से कह दो कि अगर तुम ख़ुदा को दोस्त रखते हो तो मेरी पैरवी करो कि ख़ुदा (भी) तुमको दोस्त रखेगा और तुमको तुम्हारे गुनाह बख्श देगा और खुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
32قُلْ أَطِيعُوا اللَّهَ وَالرَّسُولَ ۖ فَإِن تَوَلَّوْا فَإِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْكَافِرِينَ
(ऐ रसूल) कह दो कि ख़ुदा और रसूल की फ़रमाबरदारी करो फिर अगर यह लोग उससे सरताबी करें तो (समझ लें कि) ख़ुदा काफ़िरों को हरगिज़ दोस्त नहीं रखता
33۞ إِنَّ اللَّهَ اصْطَفَىٰ آدَمَ وَنُوحًا وَآلَ إِبْرَاهِيمَ وَآلَ عِمْرَانَ عَلَى الْعَالَمِينَ
बेशक ख़ुदा ने आदम और नूह और ख़ानदाने इबराहीम और खानदाने इमरान को सारे जहान से बरगुज़ीदा किया है
34ذُرِّيَّةً بَعْضُهَا مِن بَعْضٍ ۗ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ
बाज़ की औलाद को बाज़ से और ख़ुदा (सबकी) सुनता (और सब कुछ) जानता है
आल-इमरानकुरान सूची
200आयत
मदनीRevelation
32आयत

अनुवाद — आल-इमरान 32

सूरा आल-इमरान आयत 32 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (ऐ रसूल) कह दो कि ख़ुदा और रसूल की फ़रमाबरदारी…

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Wednesday, August 19, 2026

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