आल-इमरान · 30/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
يَوْمَ تَجِدُ كُلُّ نَفْسٍ مَّا عَمِلَتْ مِنْ خَيْرٍ مُّحْضَرًا وَمَا عَمِلَتْ مِن سُوءٍ تَوَدُّ لَوْ أَنَّ بَيْنَهَا وَبَيْنَهُ أَمَدًا بَعِيدًا ۗ وَيُحَذِّرُكُمُ اللَّهُ نَفْسَهُ ۗ وَاللَّهُ رَءُوفٌ بِالْعِبَادِ ۝٣٠
Yawma tajidu kullu nafsim maa`amilat min khairim muhdaranw wa maa `amilat min sooo`in tawaddu law anna bainahaa wa bainahooo amadam ba`eedaa; wa yuhazzirukumul laahu nafsah; wallaahu ra`oofum bil`ibaad
📖 हिंदी अर्थ
(और उस दिन को याद रखो) जिस दिन हर शख्स जो कुछ उसने (दुनिया में) नेकी की है और जो कुछ बुराई की है उसको मौजूद पाएगा (और) आरज़ू करेगा कि काश उस की बदी और उसके दरमियान में ज़मानए दराज़ (हाएल) हो जाता और ख़ुदा तुमको अपने ही से डराता है और ख़ुदा अपने बन्दों पर बड़ा शफ़ीक़ और (मेहरबान भी) है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • मुह़ज़रन: सामने मौजूद, तैयार रखा हुआ।
  • तवद्दु: चाहे, कामना करे।
  • अमदन बईदन: बहुत दूर की दूरी, लंबा समय या फासला।

तफ़सीर (व्याख्या):

उस दिन को याद करो जब हर व्यक्ति अपने सामने वह सब कुछ पाएगा जो उसने भलाई का किया होगा—पूरा का पूरा, बिना किसी कमी के, मौजूद और तैयार। और जो बुराई उसने की होगी, वह भी उसके सामने आ खड़ी होगी। उस वक्त वह दिल से चाहेगा कि काश! उसके और उसकी बुराई के बीच बहुत लंबा फासला हो जाता—इतना दूर कि वह उसे कभी न देख सके। लेकिन यह केवल पछतावा और अफसोस होगा, जो उस दिन किसी काम न आएगा।

अल्लाह तआला अपने बंदों को इस दिन से डराता है और अपने अज़ाब से सावधान करता है, ताकि वे गुनाहों से बचें और उसकी नाराज़गी से दूर रहें। यह चेतावनी उसकी ओर से महज़ डराने के लिए नहीं, बल्कि उसकी अत्यधिक दया और करुणा का परिणाम है। वह अपने बंदों पर बहुत मेहरबान है, इसलिए वह उन्हें पहले ही आगाह कर देता है, ताकि वे आज ही सुधार कर लें और कल के पछतावे से बच जाएँ।

फ़ायदे (सबक):

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि हमारा हर अच्छा और बुरा काम लिखा जा रहा है और क़यामत के दिन हमारे सामने पेश किया जाएगा। इसलिए हर काम सोच-समझकर करना चाहिए।
  2. अल्लाह की चेतावनी उसके ग़ुस्से का सबूत नहीं, बल्कि उसकी रहमत का इज़हार है। वह हमें डरा रहा है ताकि हम जहन्नम से बचें और जन्नत की तरफ बढ़ें।
  3. इस आयत से हमें यह उम्मीद मिलती है कि अल्लाह अपने बंदों से बहुत प्यार करता है। वह हमारी भलाई चाहता है, इसलिए उसकी बात मानना और उसके हुक्मों पर चलना ही हमारी सच्ची कामयाबी है।
  4. हमें आज ही अपने अमलों की जाँच करनी चाहिए और जहाँ कमी हो, उसे सुधारने की कोशिश करनी चाहिए, ताकि कल के दिन हमें पछताना न पड़े।


📜 आयत 28-32 — आल-इमरान

28لَّا يَتَّخِذِ الْمُؤْمِنُونَ الْكَافِرِينَ أَوْلِيَاءَ مِن دُونِ الْمُؤْمِنِينَ ۖ وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ فَلَيْسَ مِنَ اللَّهِ فِي شَيْءٍ إِلَّا أَن تَتَّقُوا مِنْهُمْ تُقَاةً ۗ وَيُحَذِّرُكُمُ اللَّهُ نَفْسَهُ ۗ وَإِلَى اللَّهِ الْمَصِيرُ
मोमिनीन मोमिनीन को छोड़ के काफ़िरों को अपना सरपरस्त न बनाऐं और जो ऐसा करेगा तो उससे ख़ुदा से कुछ सरोकार नहीं मगर (इस क़िस्म की तदबीरों से) किसी तरह उन (के शर) से बचना चाहो तो (ख़ैर) और ख़ुदा तुमको अपने ही से डराता है और ख़ुदा ही की तरफ़ लौट कर जाना है
29قُلْ إِن تُخْفُوا مَا فِي صُدُورِكُمْ أَوْ تُبْدُوهُ يَعْلَمْهُ اللَّهُ ۗ وَيَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۗ وَاللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
ऐ रसूल तुम उन (लोगों से) कह दो किजो कुछ तुम्हारे दिलों में है तो ख्वाह उसे छिपाओ या ज़ाहिर करो (बहरहाल) ख़ुदा तो उसे जानता है और जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में वह (सब कुछ) जानता है और ख़ुदा हर चीज़ पर क़ादिर है
30يَوْمَ تَجِدُ كُلُّ نَفْسٍ مَّا عَمِلَتْ مِنْ خَيْرٍ مُّحْضَرًا وَمَا عَمِلَتْ مِن سُوءٍ تَوَدُّ لَوْ أَنَّ بَيْنَهَا وَبَيْنَهُ أَمَدًا بَعِيدًا ۗ وَيُحَذِّرُكُمُ اللَّهُ نَفْسَهُ ۗ وَاللَّهُ رَءُوفٌ بِالْعِبَادِ
(और उस दिन को याद रखो) जिस दिन हर शख्स जो कुछ उसने (दुनिया में) नेकी की है और जो कुछ बुराई की है उसको मौजूद पाएगा (और) आरज़ू करेगा कि काश उस की बदी और उसके दरमियान में ज़मानए दराज़ (हाएल) हो जाता और ख़ुदा तुमको अपने ही से डराता है और ख़ुदा अपने बन्दों पर बड़ा शफ़ीक़ और (मेहरबान भी) है
31قُلْ إِن كُنتُمْ تُحِبُّونَ اللَّهَ فَاتَّبِعُونِي يُحْبِبْكُمُ اللَّهُ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ذُنُوبَكُمْ ۗ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
(ऐ रसूल) उन लोगों से कह दो कि अगर तुम ख़ुदा को दोस्त रखते हो तो मेरी पैरवी करो कि ख़ुदा (भी) तुमको दोस्त रखेगा और तुमको तुम्हारे गुनाह बख्श देगा और खुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
32قُلْ أَطِيعُوا اللَّهَ وَالرَّسُولَ ۖ فَإِن تَوَلَّوْا فَإِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْكَافِرِينَ
(ऐ रसूल) कह दो कि ख़ुदा और रसूल की फ़रमाबरदारी करो फिर अगर यह लोग उससे सरताबी करें तो (समझ लें कि) ख़ुदा काफ़िरों को हरगिज़ दोस्त नहीं रखता
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अनुवाद — आल-इमरान 30

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Tuesday, August 18, 2026

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