आल-इमरान · 74/200
अनुवाद उच्चारण — सूरा आल-इमरान
يَخْتَصُّ بِرَحْمَتِهِ مَن يَشَاءُ ۗ وَاللَّهُ ذُو الْفَضْلِ الْعَظِيمِ ۝٧٤
Yakhtassu birahmatihee mai yashaaa`; wallaahu zulfadil `azeem
📖 हिंदी अर्थ
जिसको चाहे अपनी रहमत के लिये ख़ास कर लेता है और ख़ुदा बड़ा फ़ज़लों करम वाला हे

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • يَخْتَصُّ: चुन लेना, विशेष रूप से देना।
  • بِرَحْمَتِهِ: अपनी दया से, अर्थात नबुव्वत (पैग़म्बरी) और हिदायत से।
  • ذُو الْفَضْلِ الْعَظِيمِ: महान उदारता और कृपा वाला।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला अपनी असीम दया और कृपा से अपने बन्दों में से जिसे चाहता है, उसे नबुव्वत (पैग़म्बरी), हिदायत और अपनी विशेष रहमत के लिए चुन लेता है। यह उसका विशेष अनुग्रह है, जो किसी के प्रयास या योग्यता पर निर्भर नहीं, बल्कि उसकी अपनी मर्ज़ी और हिकमत पर आधारित है। वह जिसे चाहता है, सीधे मार्ग की ओर मार्गदर्शन करता है और उसे अपनी रहमत से नवाज़ता है। अल्लाह ही सब कुछ देने वाला है, और उसकी उदारता की कोई सीमा नहीं। यह आयत उन लोगों के दावे का खंडन करती है जो समझते थे कि नबुव्वत केवल बनी इसराईल के लिए है और उन्हीं तक सीमित रहेगी। अल्लाह ने स्पष्ट कर दिया कि वह अपनी रहमत को जिस पर चाहता है, विशेष कर देता है, और यह उसका अधिकार है। इसी का परिणाम है कि आख़िरी नबी मुहम्मद ﷺ को यह सम्मान प्रदान किया गया, जो बनी इसराईल से नहीं थे।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. अल्लाह की रहमत और फज़ल असीम है, और वह जिसे चाहता है, अपनी विशेष दया से नवाज़ता है। यह हमें सिखाता है कि हमें अल्लाह की रहमत से कभी निराश नहीं होना चाहिए।
  2. नबुव्वत और हिदायत अल्लाह का विशेष उपहार है, जो उसकी मर्ज़ी से आता है। यह हमें बताता है कि इस्लाम एक सार्वभौमिक दीन है, जो किसी विशेष जाति या वंश तक सीमित नहीं।
  3. यह आयत हमें अल्लाह के फैसलों पर संतुष्ट रहने और उसकी हिकमत पर भरोसा करने की शिक्षा देती है, क्योंकि वही जानता है कि किसे कब और कैसे अपनी रहमत से नवाज़ना है।
  4. अल्लाह की उदारता की कोई सीमा नहीं, इसलिए हमें उससे अधिक से अधिक माँगना चाहिए और उसकी रहमत के लिए प्रयासरत रहना चाहिए।


📜 आयत 72-76 — सूरा आल-इमरान

72وَقَالَت طَّائِفَةٌ مِّنْ أَهْلِ الْكِتَابِ آمِنُوا بِالَّذِي أُنزِلَ عَلَى الَّذِينَ آمَنُوا وَجْهَ النَّهَارِ وَاكْفُرُوا آخِرَهُ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
और अहले किताब से एक गिरोह ने (अपने लोगों से) कहा कि मुसलमानों पर जो किताब नाज़िल हुईहै उसपर सुबह सवेरे ईमान लाओ और आख़िर वक्त ऌन्कार कर दिया करो शायद मुसलमान (इसी तदबीर से अपने दीन से) फिर जाए
73وَلَا تُؤْمِنُوا إِلَّا لِمَن تَبِعَ دِينَكُمْ قُلْ إِنَّ الْهُدَىٰ هُدَى اللَّهِ أَن يُؤْتَىٰ أَحَدٌ مِّثْلَ مَا أُوتِيتُمْ أَوْ يُحَاجُّوكُمْ عِندَ رَبِّكُمْ ۗ قُلْ إِنَّ الْفَضْلَ بِيَدِ اللَّهِ يُؤْتِيهِ مَن يَشَاءُ ۗ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ
और तुम्हारे दीन की पैरवरी करे उसके सिवा किसी दूसरे की बात का ऐतबार न करो (ऐ रसूल) तुम कह दो कि बस ख़ुदा ही की हिदायत तो हिदायत है (यहूदी बाहम ये भी कहते हैं कि) उसको भी न (मानना) कि जैसा (उम्दा दीन) तुमको दिया गया है, वैसा किसी और को दिया जाय या तुमसे कोई शख्स ख़ुदा के यहॉ झगड़ा करे (ऐ रसूल तुम उनसे) कह दो कि (ये क्या ग़लत ख्याल है) फ़ज़ल (व करम) ख़ुदा के हाथ में है वह जिसको चाहे दे और ख़ुदा बड़ी गुन्जाईश वाला है (और हर शै को)े जानता है
74يَخْتَصُّ بِرَحْمَتِهِ مَن يَشَاءُ ۗ وَاللَّهُ ذُو الْفَضْلِ الْعَظِيمِ
जिसको चाहे अपनी रहमत के लिये ख़ास कर लेता है और ख़ुदा बड़ा फ़ज़लों करम वाला हे
75۞ وَمِنْ أَهْلِ الْكِتَابِ مَنْ إِن تَأْمَنْهُ بِقِنطَارٍ يُؤَدِّهِ إِلَيْكَ وَمِنْهُم مَّنْ إِن تَأْمَنْهُ بِدِينَارٍ لَّا يُؤَدِّهِ إِلَيْكَ إِلَّا مَا دُمْتَ عَلَيْهِ قَائِمًا ۗ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَالُوا لَيْسَ عَلَيْنَا فِي الْأُمِّيِّينَ سَبِيلٌ وَيَقُولُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ وَهُمْ يَعْلَمُونَ
और अहले किताब कुछ ऐसे भी हैं कि अगर उनके पास रूपए की ढेर अमानत रख दो तो भी उसे (जब चाहो) वैसे ही तुम्हारे हवाले कर देंगे और बाज़ ऐसे हें कि अगर एक अशर्फ़ी भी अमानत रखो तो जब तक तुम बराबर (उनके सर) पर खड़े न रहोगे तुम्हें वापस न देंगे ये (बदमुआम लगी) इस वजह से है कि उन का तो ये क़ौल है कि (अरब के) जाहिलो (का हक़ मार लेने) में हम पर कोई इल्ज़ाम की राह ही नहीं और जान बूझ कर खुदा पर झूठ (तूफ़ान) जोड़ते हैं
76بَلَىٰ مَنْ أَوْفَىٰ بِعَهْدِهِ وَاتَّقَىٰ فَإِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُتَّقِينَ
हाँ (अलबत्ता) जो शख्स अपने एहद को पूरा करे और परहेज़गारी इख्तेयार करे तो बेशक ख़ुदा परहेज़गारों को दोस्त रखता है
आल-इमरानकुरान सूची
200आयत
मदनीअवतरण स्थान
74आयत

अनुवाद — आल-इमरान 74

सूरा आल-इमरान आयत 74 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : जिसको चाहे अपनी रहमत के लिये ख़ास कर लेता है…

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Wednesday, September 30, 2026

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