بِرَحْمَتِهِ: अपनी दया से, अर्थात नबुव्वत (पैग़म्बरी) और हिदायत से।
ذُو الْفَضْلِ الْعَظِيمِ: महान उदारता और कृपा वाला।
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला अपनी असीम दया और कृपा से अपने बन्दों में से जिसे चाहता है, उसे नबुव्वत (पैग़म्बरी), हिदायत और अपनी विशेष रहमत के लिए चुन लेता है। यह उसका विशेष अनुग्रह है, जो किसी के प्रयास या योग्यता पर निर्भर नहीं, बल्कि उसकी अपनी मर्ज़ी और हिकमत पर आधारित है। वह जिसे चाहता है, सीधे मार्ग की ओर मार्गदर्शन करता है और उसे अपनी रहमत से नवाज़ता है। अल्लाह ही सब कुछ देने वाला है, और उसकी उदारता की कोई सीमा नहीं। यह आयत उन लोगों के दावे का खंडन करती है जो समझते थे कि नबुव्वत केवल बनी इसराईल के लिए है और उन्हीं तक सीमित रहेगी। अल्लाह ने स्पष्ट कर दिया कि वह अपनी रहमत को जिस पर चाहता है, विशेष कर देता है, और यह उसका अधिकार है। इसी का परिणाम है कि आख़िरी नबी मुहम्मद ﷺ को यह सम्मान प्रदान किया गया, जो बनी इसराईल से नहीं थे।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
अल्लाह की रहमत और फज़ल असीम है, और वह जिसे चाहता है, अपनी विशेष दया से नवाज़ता है। यह हमें सिखाता है कि हमें अल्लाह की रहमत से कभी निराश नहीं होना चाहिए।
नबुव्वत और हिदायत अल्लाह का विशेष उपहार है, जो उसकी मर्ज़ी से आता है। यह हमें बताता है कि इस्लाम एक सार्वभौमिक दीन है, जो किसी विशेष जाति या वंश तक सीमित नहीं।
यह आयत हमें अल्लाह के फैसलों पर संतुष्ट रहने और उसकी हिकमत पर भरोसा करने की शिक्षा देती है, क्योंकि वही जानता है कि किसे कब और कैसे अपनी रहमत से नवाज़ना है।
अल्लाह की उदारता की कोई सीमा नहीं, इसलिए हमें उससे अधिक से अधिक माँगना चाहिए और उसकी रहमत के लिए प्रयासरत रहना चाहिए।
और अहले किताब से एक गिरोह ने (अपने लोगों से) कहा कि मुसलमानों पर जो किताब नाज़िल हुईहै उसपर सुबह सवेरे ईमान लाओ और आख़िर वक्त ऌन्कार कर दिया करो शायद मुसलमान (इसी तदबीर से अपने दीन से) फिर जाए
और तुम्हारे दीन की पैरवरी करे उसके सिवा किसी दूसरे की बात का ऐतबार न करो (ऐ रसूल) तुम कह दो कि बस ख़ुदा ही की हिदायत तो हिदायत है (यहूदी बाहम ये भी कहते हैं कि) उसको भी न (मानना) कि जैसा (उम्दा दीन) तुमको दिया गया है, वैसा किसी और को दिया जाय या तुमसे कोई शख्स ख़ुदा के यहॉ झगड़ा करे (ऐ रसूल तुम उनसे) कह दो कि (ये क्या ग़लत ख्याल है) फ़ज़ल (व करम) ख़ुदा के हाथ में है वह जिसको चाहे दे और ख़ुदा बड़ी गुन्जाईश वाला है (और हर शै को)े जानता है
और अहले किताब कुछ ऐसे भी हैं कि अगर उनके पास रूपए की ढेर अमानत रख दो तो भी उसे (जब चाहो) वैसे ही तुम्हारे हवाले कर देंगे और बाज़ ऐसे हें कि अगर एक अशर्फ़ी भी अमानत रखो तो जब तक तुम बराबर (उनके सर) पर खड़े न रहोगे तुम्हें वापस न देंगे ये (बदमुआम लगी) इस वजह से है कि उन का तो ये क़ौल है कि (अरब के) जाहिलो (का हक़ मार लेने) में हम पर कोई इल्ज़ाम की राह ही नहीं और जान बूझ कर खुदा पर झूठ (तूफ़ान) जोड़ते हैं
सूराकुरान वेबसाइट की स्थापना पवित्र किताब और पाक सुन्नत की सेवा, अल्लाह की ओर बुलावा, और कुरान व सुन्नत के मार्ग पर धार्मिक विज्ञान को सुगम बनाने के एक विनम्र प्रयास के रूप में की गई थी। हम अल्लाह की प्रशंसा और उसके अनुग्रह के लिए धन्यवाद करते हैं, और उससे प्रार्थना करते हैं कि वह हमारे कार्यों को स्वीकार करे और उन्हें केवल उसके महान चेहरे के लिए विशुद्ध बनाए।