अर-रूम · 36/60
अनुवाद उच्चारण — अर-रूम
وَإِذَا أَذَقْنَا النَّاسَ رَحْمَةً فَرِحُوا بِهَا ۖ وَإِن تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ إِذَا هُمْ يَقْنَطُونَ ۝٣٦
Wa izaaa azaqnan naasa rahmatan farihoo bihaa wa in tusibhum sayyi`atum bimaa qaddamat aydeehim izaa hum yaqnatoon
📖 हिंदी अर्थ
और जब हमने लोगों को (अपनी रहमत की लज्ज़त) चखा दी तो वह उससे खुश हो गए और जब उन्हें अपने हाथों की अगली कारसतानियो की बदौलत कोई मुसीबत पहुँची तो यकबारगी मायूस होकर बैठे रहते हैं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • अज़क़्ना (أَذَقْنَا): हमने चखाया, यानी अनुभव कराया।
  • रहमत (رَحْمَةً): रहमत, कृपा, नेमत, जैसे बारिश, खुशहाली, सेहत।
  • फ़रिहू (فَرِحُوا): वे खुश हुए।
  • सय्यिअत (سَيِّئَةٌ): बुराई, मुसीबत, तकलीफ़, जैसे सूखा, बीमारी, ग़रीबी।
  • यक़्नतून (يَقْنَطُونَ): वे निराश हो जाते हैं, रहमत-ए-इलाही से मायूस हो जाते हैं।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में इंसान की कमज़ोरी और उसके अख़लाक़ (स्वभाव) की हक़ीक़त बयान कर रहे हैं। जब हम इंसानों को अपनी रहमत से नेमतें अता करते हैं—जैसे सेहत, खुशहाली, बारिश, रिज़्क़ में फ़राग़त—तो वे उस नेमत पर इतरा कर खुश होते हैं, शुक्र अदा करने के बजाय अकड़ जाते हैं और घमंड में आ जाते हैं। यह खुशी शुक्र की खुशी नहीं होती, बल्कि ग़ुरूर और लापरवाही की खुशी होती है।

और जब उन्हें उनके अपने किए हुए गुनाहों की वजह से कोई मुसीबत पहुँचती है—जैसे बीमारी, ग़रीबी, डर या तंगी—तो वे तुरंत निराश हो जाते हैं और अल्लाह की रहमत से मायूस होकर उम्मीद खो देते हैं। यानी वे नेमत पर शुक्र नहीं करते और मुसीबत में सब्र नहीं करते। यह अक्सर लोगों की आदत है—राहत में इतराना और तकलीफ़ में निराश हो जाना।

यह आयत हमें सिखाती है कि एक मोमिन का दर्जा इससे बहुत ऊँचा है। मोमिन नेमत पाकर अल्लाह का शुक्र अदा करता है और मुसीबत में सब्र करता है, क्योंकि वह जानता है कि अल्लाह की रहमत उसकी मुसीबत से कहीं बड़ी है। अल्लाह तआला क़ुरआन में फ़रमाते हैं कि "अल्लाह की रहमत से निराश मत होना" (सूरा ज़ुमर: 53)।

प्यारे भाइयो और बहनो! यह आयत हमें दो अहम सबक़ देती है:

  1. नेमत मिले तो शुक्र करें, इतराएँ नहीं, क्योंकि नेमत अल्लाह की तरफ़ से इम्तिहान भी हो सकती है।
  2. मुसीबत आए तो निराश न हों, क्योंकि अल्लाह की रहमत असीम है। गुनाह चाहे कितने भी हों, अल्लाह की रहमत उनसे बड़ी है। बस तौबा और सब्र की ज़रूरत है।

अल्लाह हमें शुक्रगुज़ार और सब्र करने वाला बनाए। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 34-38 — अर-रूम

34لِيَكْفُرُوا بِمَا آتَيْنَاهُمْ ۚ فَتَمَتَّعُوا فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ
ताकि जो (नेअमत) हमने उन्हें दी है उसकी नाशुक्री करें ख़ैर (दुनिया में चन्दरोज़ चैन कर लो) फिर तो बहुत जल्द (अपने किए का मज़ा) तुम्हे मालूम ही होगा
35أَمْ أَنزَلْنَا عَلَيْهِمْ سُلْطَانًا فَهُوَ يَتَكَلَّمُ بِمَا كَانُوا بِهِ يُشْرِكُونَ
क्या हमने उन लोगों पर कोई दलील नाज़िल की है जो उस (के हक़ होने) को बयान करती है जिसे ये लोग ख़ुदा का शरीक ठहराते हैं (हरग़िज नहीं)
36وَإِذَا أَذَقْنَا النَّاسَ رَحْمَةً فَرِحُوا بِهَا ۖ وَإِن تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ إِذَا هُمْ يَقْنَطُونَ
और जब हमने लोगों को (अपनी रहमत की लज्ज़त) चखा दी तो वह उससे खुश हो गए और जब उन्हें अपने हाथों की अगली कारसतानियो की बदौलत कोई मुसीबत पहुँची तो यकबारगी मायूस होकर बैठे रहते हैं
37أَوَلَمْ يَرَوْا أَنَّ اللَّهَ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ وَيَقْدِرُ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ
क्या उन लोगों ने (इतना भी) ग़ौर नहीं किया कि खुदा ही जिसकी रोज़ी चाहता है कुशादा कर देता है और (जिसकी चाहता है) तंग करता है-कुछ शक नहीं कि इसमें ईमानरदार लोगों के वास्ते (कुदरत ख़ुदा की) बहुत सी निशानियाँ हैं
38فَآتِ ذَا الْقُرْبَىٰ حَقَّهُ وَالْمِسْكِينَ وَابْنَ السَّبِيلِ ۚ ذَٰلِكَ خَيْرٌ لِّلَّذِينَ يُرِيدُونَ وَجْهَ اللَّهِ ۖ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ
(तो ऐ रसूल अपनी) क़राबतदार (फातिमा ज़हरा) का हक़ फिदक दे दो और मोहताज व परदेसियों का (भी) जो लोग ख़ुदा की ख़ुशनूदी के ख्वाहॉ हैं उन के हक़ में सब से बेहतर यही है और ऐसे ही लोग आखेरत में दिली मुरादे पाएँगें
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अनुवाद — अर-रूम 36

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Tuesday, August 18, 2026

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