अर-रूम · 35/60
अनुवाद उच्चारण — अर-रूम
أَمْ أَنزَلْنَا عَلَيْهِمْ سُلْطَانًا فَهُوَ يَتَكَلَّمُ بِمَا كَانُوا بِهِ يُشْرِكُونَ ۝٣٥
Am anzalnaa `alaihim sultaanan fahuwa yatakallamu bimaa kaanoo bihee yushrikoon
📖 हिंदी अर्थ
क्या हमने उन लोगों पर कोई दलील नाज़िल की है जो उस (के हक़ होने) को बयान करती है जिसे ये लोग ख़ुदा का शरीक ठहराते हैं (हरग़िज नहीं)
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • सुल्तान: प्रमाण, स्पष्ट तर्क, या कोई ऐसी किताब जो स्पष्ट रूप से बोलती हो।
  • युशरिकून: शिर्क करना, अल्लाह के साथ किसी और को साझीदार बनाना।

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में मुशरिकीन (बहुदेववादियों) से पूछ रहे हैं कि क्या हमने उन पर कोई ऐसा प्रमाण या किताब उतारी है जो उनके शिर्क (अल्लाह के साथ साझीदार बनाने) की गवाही देती हो? क्या कोई ऐसी आसमानी किताब या तर्क उनके पास है जो उनके इस कुकर्म को सही ठहराता हो? बिल्कुल नहीं! यह सवाल उन्हें शर्मिंदा करने और उनकी बुनियाद को हिलाने के लिए है। उनके पास न तो कोई आसमानी किताब है, न कोई तर्क, न कोई प्रमाण। वे सिर्फ अपनी मनमर्जी, पूर्वजों की अंधी परंपरा और निराधार कल्पनाओं के पीछे चल रहे हैं।

यह आयत बड़ी स्पष्टता से बताती है कि शिर्क और कुफ्र का कोई आधार नहीं है। अल्लाह ने हमेशा अपने रसूलों के माध्यम से सच्चाई भेजी, जो तौहीद (एकेश्वरवाद) की ओर बुलाती है। किसी भी नबी ने शिर्क की शिक्षा नहीं दी। इसलिए, जो लोग शिर्क करते हैं, वे बिना किसी सबूत के अल्लाह पर झूठ बोल रहे हैं और अपने लिए ऐसा रास्ता चुन रहे हैं जो उन्हें सिर्फ अंधकार और विनाश की ओर ले जाता है।

दावती पहलू (आमंत्रण का दृष्टिकोण):

यह आयत हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हम अपने जीवन में जो भी रास्ता चुनते हैं, क्या उसके पास कोई ठोस प्रमाण है? इस्लाम एक ऐसा धर्म है जो तर्क, बुद्धि और प्रमाण पर आधारित है। अल्लाह ने कुरआन को "हुदा" (मार्गदर्शन) और "बुरहान" (प्रमाण) कहा है। जब हम कुरआन पढ़ते हैं, तो हम पाते हैं कि यह हर युग में मौजूद सवालों का जवाब देता है और दिलों को सुकून देता है। शिर्क और कुफ्र के रास्ते पर चलने वालों के पास न तो कोई किताब है, न कोई तर्क — सिर्फ अंधी परंपरा और भ्रम।

आइए हम उस सच्चाई को अपनाएं जो प्रमाण और तर्क पर आधारित है — वह है अल्लाह की इबादत और उसके रसूल ﷺ की पैरवी। यही वह रास्ता है जो हमें दुनिया और आखिरत में सफलता दिलाएगा। अल्लाह हमें सच्चाई समझने और उस पर चलने की तौफीक दे। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 33-37 — अर-रूम

33وَإِذَا مَسَّ النَّاسَ ضُرٌّ دَعَوْا رَبَّهُم مُّنِيبِينَ إِلَيْهِ ثُمَّ إِذَا أَذَاقَهُم مِّنْهُ رَحْمَةً إِذَا فَرِيقٌ مِّنْهُم بِرَبِّهِمْ يُشْرِكُونَ
और जब लोगों को कोई मुसीबत छू भी गयी तो उसी की तरफ रुजू होकर अपने परवरदिगार को पुकारने लगते हैं फिर जब वह अपनी रहमत की लज्ज़त चखा देता है तो उन्हीं में से कुछ लोग अपने परवरदिगार के साथ शिर्क करने लगते हैं
34لِيَكْفُرُوا بِمَا آتَيْنَاهُمْ ۚ فَتَمَتَّعُوا فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ
ताकि जो (नेअमत) हमने उन्हें दी है उसकी नाशुक्री करें ख़ैर (दुनिया में चन्दरोज़ चैन कर लो) फिर तो बहुत जल्द (अपने किए का मज़ा) तुम्हे मालूम ही होगा
35أَمْ أَنزَلْنَا عَلَيْهِمْ سُلْطَانًا فَهُوَ يَتَكَلَّمُ بِمَا كَانُوا بِهِ يُشْرِكُونَ
क्या हमने उन लोगों पर कोई दलील नाज़िल की है जो उस (के हक़ होने) को बयान करती है जिसे ये लोग ख़ुदा का शरीक ठहराते हैं (हरग़िज नहीं)
36وَإِذَا أَذَقْنَا النَّاسَ رَحْمَةً فَرِحُوا بِهَا ۖ وَإِن تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ إِذَا هُمْ يَقْنَطُونَ
और जब हमने लोगों को (अपनी रहमत की लज्ज़त) चखा दी तो वह उससे खुश हो गए और जब उन्हें अपने हाथों की अगली कारसतानियो की बदौलत कोई मुसीबत पहुँची तो यकबारगी मायूस होकर बैठे रहते हैं
37أَوَلَمْ يَرَوْا أَنَّ اللَّهَ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ وَيَقْدِرُ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ
क्या उन लोगों ने (इतना भी) ग़ौर नहीं किया कि खुदा ही जिसकी रोज़ी चाहता है कुशादा कर देता है और (जिसकी चाहता है) तंग करता है-कुछ शक नहीं कि इसमें ईमानरदार लोगों के वास्ते (कुदरत ख़ुदा की) बहुत सी निशानियाँ हैं
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अनुवाद — अर-रूम 35

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Tuesday, August 18, 2026

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