अल-अहज़ाब · 17/73
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-अहज़ाब
قُلْ مَن ذَا الَّذِي يَعْصِمُكُم مِّنَ اللَّهِ إِنْ أَرَادَ بِكُمْ سُوءًا أَوْ أَرَادَ بِكُمْ رَحْمَةً ۚ وَلَا يَجِدُونَ لَهُم مِّن دُونِ اللَّهِ وَلِيًّا وَلَا نَصِيرًا ۝١٧
Qul m an zal lazee ya`simukum minal laahi in araada bikum sooo`an aw araada bikum rahmah; wa laa yajidoona lahum min doonil laahi waliyyanw wa laa naseeraa
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) तुम उनसे कह दो कि अगर खुदा तुम्हारे साथ बुराई का इरादा कर बैठे तो तुम्हें उसके (अज़ाब) से कौन ऐसा है जो बचाए या भलाई ही करना चाहे (तो कौन रोक सकता है) और ये लोग खुदा के सिवा न तो किसी को अपना सरपरस्त पाएँगे और न मद्दगार

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَعْصِمُكُمْ (यअसिमुकुम): तुम्हें बचाए, सुरक्षित रखे, रोक दे।
  • سُوءًا (सूअन): बुराई, तकलीफ, हानि — जैसे मौत या हार।
  • رَحْمَةً (रहमतन): दया, भलाई, सुरक्षा और विजय।
  • وَلِيًّا (वलिय्यन): मददगार, संरक्षक, साथ देने वाला।
  • نَصِيرًا (नसीरन): सहायक, रक्षक।

तफसीर (व्याख्या):

ऐ नबी! इन मुनाफ़िक़ों (कपटियों) से कह दीजिए — वे लोग जो जिहाद से भागते हैं और अपनी जान बचाने की कोशिश करते हैं — "बताओ, अगर अल्लाह तुम्हारे साथ कोई बुराई करना चाहे — जैसे मौत, हार या कोई मुसीबत — तो कौन है जो तुम्हें अल्लाह से बचा सके? और अगर अल्लाह तुम पर दया करना चाहे — यानी सुरक्षा, विजय और भलाई देना चाहे — तो कौन है जो उसकी रहमत को रोक सके?"

यानी, अल्लाह ही सब कुछ करने वाला है। वही नुक़सान पहुँचाने वाला है और वही फ़ायदा देने वाला है। कोई ताकत, कोई इंसान, कोई हथियार या कोई किला — कुछ भी अल्लाह की मर्ज़ी के आगे काम नहीं आ सकता। अगर अल्लाह ने चाहा तो कोई तुम्हें बचा नहीं सकता, और अगर अल्लाह ने चाहा तो कोई तुम्हें नुक़सान नहीं पहुँचा सकता।

फिर अल्लाह तआला फ़रमाता है कि ये मुनाफ़िक़ — जो अल्लाह के दीन से दूर भागते हैं और अपनी जान बचाने की फ़िक्र में लगे हैं — उन्हें अल्लाह के सिवा न कोई दोस्त मिलेगा जो उनका हाथ पकड़े, और न कोई मददगार मिलेगा जो उन्हें अल्लाह की पकड़ से बचा सके। वे जितना भी भागें, जितनी भी चालाकी करें, अल्लाह की क़ुदरत से बाहर नहीं जा सकते।


दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):

यह आयत हमें सिखाती है कि हमारी पूरी ज़िंदगी अल्लाह के हाथ में है। जब हम यह समझ लेते हैं कि नुक़सान और फ़ायदा, ज़िंदगी और मौत, इज़्ज़त और रुसवाई — सब कुछ अल्लाह के इख्तियार में है, तो हमारा दिल सिर्फ़ अल्लाह से जुड़ता है। हम किसी इंसान से नहीं डरते और किसी इंसान से उम्मीद नहीं रखते।

यही तो सच्ची ईमान की निशानी है — कि बंदा अल्लाह पर भरोसा करे, उसी से मदद माँगे, और यह यक़ीन रखे कि अल्लाह जो चाहेगा वही होगा। जो शख्स अल्लाह पर भरोसा करता है, अल्लाह उसके लिए काफ़ी है। और जो अल्लाह से दूर भागता है, उसे कहीं पनाह नहीं मिलेगी।

तो आओ, हम अपनी ज़िंदगी को अल्लाह के हवाले कर दें, उसकी राह में क़ुर्बानी दें, और यक़ीन रखें कि अल्लाह हमारा वली (संरक्षक) और नसीर (सहायक) है। जिसका वली अल्लाह हो, उसे किसी और की ज़रूरत नहीं। और जिसे अल्लाह ने छोड़ दिया, उसे कोई नहीं बचा सकता।



📜 आयत 15-19 — सूरा अल-अहज़ाब

15وَلَقَدْ كَانُوا عَاهَدُوا اللَّهَ مِن قَبْلُ لَا يُوَلُّونَ الْأَدْبَارَ ۚ وَكَانَ عَهْدُ اللَّهِ مَسْئُولًا
और (उस वक्त) अपने घरों में भी बहुत कम तवक्क़ुफ़ करेंगे (मगर ये तो जिहाद है) हालाँकि उन लोगों ने पहले ही खुदा से एहद किया था कि हम दुश्मन के मुक़ाबले में (अपनी) पीठ न फेरेंगे और खुदा के एहद की पूछगछ तो (एक न एक दिन) होकर रहेगी
16قُل لَّن يَنفَعَكُمُ الْفِرَارُ إِن فَرَرْتُم مِّنَ الْمَوْتِ أَوِ الْقَتْلِ وَإِذًا لَّا تُمَتَّعُونَ إِلَّا قَلِيلًا
(ऐ रसूल उनसे) कह दो कि अगर तुम मौत का क़त्ल (के ख़ौफ) से भागे भी तो (यह) भागना तुम्हें हरगिज़ कुछ भी मुफ़ीद न होगा और अगर तुम भागकर बच भी गए तो बस यही न की दुनिया में चन्द रोज़ा और चैनकर लो
17قُلْ مَن ذَا الَّذِي يَعْصِمُكُم مِّنَ اللَّهِ إِنْ أَرَادَ بِكُمْ سُوءًا أَوْ أَرَادَ بِكُمْ رَحْمَةً ۚ وَلَا يَجِدُونَ لَهُم مِّن دُونِ اللَّهِ وَلِيًّا وَلَا نَصِيرًا
(ऐ रसूल) तुम उनसे कह दो कि अगर खुदा तुम्हारे साथ बुराई का इरादा कर बैठे तो तुम्हें उसके (अज़ाब) से कौन ऐसा है जो बचाए या भलाई ही करना चाहे (तो कौन रोक सकता है) और ये लोग खुदा के सिवा न तो किसी को अपना सरपरस्त पाएँगे और न मद्दगार
18۞ قَدْ يَعْلَمُ اللَّهُ الْمُعَوِّقِينَ مِنكُمْ وَالْقَائِلِينَ لِإِخْوَانِهِمْ هَلُمَّ إِلَيْنَا ۖ وَلَا يَأْتُونَ الْبَأْسَ إِلَّا قَلِيلًا
तुममें से जो लोग (दूसरों को जिहाद से) रोकते हैं खुदा उनको खूब जानता है और (उनको भी खूब जानता है) जो अपने भाई बन्दों से कहते हैं कि हमारे पास चले भी आओ और खुद भी (फक़त पीछा छुड़ाने को लड़ाई के खेत) में बस एक ज़रा सा आकर तुमसे अपनी जान चुराई
19أَشِحَّةً عَلَيْكُمْ ۖ فَإِذَا جَاءَ الْخَوْفُ رَأَيْتَهُمْ يَنظُرُونَ إِلَيْكَ تَدُورُ أَعْيُنُهُمْ كَالَّذِي يُغْشَىٰ عَلَيْهِ مِنَ الْمَوْتِ ۖ فَإِذَا ذَهَبَ الْخَوْفُ سَلَقُوكُم بِأَلْسِنَةٍ حِدَادٍ أَشِحَّةً عَلَى الْخَيْرِ ۚ أُولَٰئِكَ لَمْ يُؤْمِنُوا فَأَحْبَطَ اللَّهُ أَعْمَالَهُمْ ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عَلَى اللَّهِ يَسِيرًا
और चल दिए और जब (उन पर) कोई ख़ौफ (का मौक़ा) आ पड़ा तो देखते हो कि (आस से) तुम्हारी तरफ देखते हैं (और) उनकी ऑंखें इस तरह घूमती हैं जैसे किसी शख्स पर मौत की बेहोशी छा जाए फिर वह ख़ौफ (का मौक़ा) जाता रहा और ईमानदारों की फतेह हुई तो माले (ग़नीमत) पर गिरते पड़ते फौरन तुम पर अपनी तेज़ ज़बानों से ताना कसने लगे ये लोग (शुरू) से ईमान ही नहीं लाए (फक़त ज़बानी जमा ख़र्च थी) तो खुदा ने भी इनका किया कराया सब अकारत कर दिया और ये तो खुदा के वास्ते एक (निहायत) आसान बात थी
अल-अहज़ाबकुरान सूची
73आयत
मदनीअवतरण स्थान
17आयत

अनुवाद — अल-अहज़ाब 17

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Thursday, October 1, 2026

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