अस-साफ्फात · 94/182
अनुवाद उच्चारण — सूरा अस-साफ्फात
فَأَقْبَلُوا إِلَيْهِ يَزِفُّونَ ۝٩٤
Fa aqbalooo ilaihi yaziffoon
📖 हिंदी अर्थ
फिर तो इबराहीम दाहिने हाथ से मारते हुए उन पर पिल पड़े (और तोड़-फोड़ कर एक बड़े बुत के गले में कुल्हाड़ी डाल दी)

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَأَقْبَلُوا: वे सब आगे बढ़े, रुख किया।
  • إِلَيْهِ: उसकी ओर (हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की ओर)।
  • يَزِفُّونَ: तेज़ी से दौड़ते हुए, कदमों को मिलाकर जल्दी-जल्दी चलते हुए। यह शब्द ग़ुस्से और जल्दबाज़ी के साथ आगे बढ़ने को दर्शाता है।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने उन मूर्तियों को टुकड़े-टुकड़े कर दिया, जिन्हें उनकी क़ौम पूजती थी, और केवल सबसे बड़ी मूर्ति को बचा छोड़ा ताकि उससे पूछा जा सके, तो जब क़ौम के लोगों ने यह मंज़र देखा, तो वे ग़ुस्से और हैरानी के साथ उसकी तरफ़ तेज़ी से दौड़ते हुए आए। उनके कदमों में जल्दबाज़ी थी, उनकी आँखों में ग़ुस्सा था, और वे इस बात से बेचैन थे कि उनके देवताओं के साथ यह किसने किया। वे इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पास पहुँचे, जबकि उनका चेहरा ग़ुस्से से लाल था और वे उन्हें सबक़ सिखाने के लिए तैयार थे। लेकिन हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम बिल्कुल शांत और भरोसेमंद थे, क्योंकि उन्हें अपने रब पर पूरा यक़ीन था।

दावती पहलू (आमंत्रण का पहलू):

यह दृश्य हमें सिखाता है कि सच्चाई पर क़ायम रहने वाला इंसान अकेला होने के बावजूद भी निडर होता है। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अकेले थे, लेकिन उनका भरोसा अल्लाह पर था, इसलिए उन्होंने बुतों को तोड़ने में कोई हिचकिचाहट नहीं की। आज भी जब कोई इंसान सच्चाई पर होता है, तो उसे दुनिया की तरफ़ से ग़ुस्से और दुश्मनी का सामना करना पड़ता है, लेकिन अल्लाह उसे हिम्मत और सब्र देता है। यह घटना हमें बताती है कि बुतों (चाहे वे पत्थर के हों या अपनी इच्छाओं और बुरी आदतों के) को तोड़ने का साहस ही सच्चा ईमान है। जो लोग अल्लाह की इबादत छोड़कर दूसरी चीज़ों पर भरोसा करते हैं, वे उसी तरह बेबस हैं जैसे ये मूर्तियाँ थीं, जो न तो अपनी रक्षा कर सकीं और न ही अपने पूजने वालों की मदद कर सकीं। हमें चाहिए कि हम अपने जीवन में केवल अल्लाह पर भरोसा करें, क्योंकि वही सब कुछ कर सकता है, और हर मुश्किल में वही हमारी मदद करता है।



📜 आयत 92-96 — सूरा अस-साफ्फात

92مَا لَكُمْ لَا تَنطِقُونَ
आख़िर तुम खाते क्यों नहीं (अरे तुम्हें क्या हो गया है)
93فَرَاغَ عَلَيْهِمْ ضَرْبًا بِالْيَمِينِ
कि तुम बोलते तक नहीं
94فَأَقْبَلُوا إِلَيْهِ يَزِفُّونَ
फिर तो इबराहीम दाहिने हाथ से मारते हुए उन पर पिल पड़े (और तोड़-फोड़ कर एक बड़े बुत के गले में कुल्हाड़ी डाल दी)
95قَالَ أَتَعْبُدُونَ مَا تَنْحِتُونَ
जब उन लोगों को ख़बर हुई तो इबराहीम के पास दौड़ते हुए पहुँचे
96وَاللَّهُ خَلَقَكُمْ وَمَا تَعْمَلُونَ
इबराहीम ने कहा (अफ़सोस) तुम लोग उसकी परसतिश करते हो जिसे तुम लोग खुद तराश कर बनाते हो
अस-साफ्फातकुरान सूची
182आयत
मक्कीअवतरण स्थान
94आयत

अनुवाद — अस-साफ्फात 94

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Saturday, October 3, 2026

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