अस-साफ्फात · 93/182
अनुवाद उच्चारण — अस-साफ्फात
فَرَاغَ عَلَيْهِمْ ضَرْبًا بِالْيَمِينِ ۝٩٣
Faraagha `alaihim darbam bilyameen
📖 हिंदी अर्थ
कि तुम बोलते तक नहीं
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • فَرَاغَ — वह झुके, उनकी ओर प्रवृत्त हुए, या चुपके से उन पर हमला करने के लिए गए।
  • عَلَيْهِمْ — उन (मूर्तियों) पर।
  • ضَرْبًا — मारते हुए, प्रहार करते हुए।
  • بِالْيَمِينِ — अपने दाहिने हाथ से।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के उस ऐतिहासिक क़िस्से का हिस्सा है, जब उन्होंने अपनी क़ौम के बुतों (मूर्तियों) को तोड़ने का फ़ैसला किया। जब क़ौम ईद के त्योहार पर शहर से बाहर गई, तो इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने मौका पाकर मंदिर में जाकर सभी मूर्तियों को चकनाचूर कर दिया। इस आयत में अल्लाह तआला फ़रमाता है कि इब्राहीम उन मूर्तियों पर झुके और अपने दाहिने हाथ से उन्हें ज़ोरदार प्रहार करते हुए तोड़ डाला।

यहाँ "दाहिने हाथ" का ज़िक्र इसलिए किया गया है क्योंकि दाहिना हाथ ताक़त और क्षमता में बाएँ हाथ से बढ़कर होता है। यह इशारा है कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने यह काम पूरी ताक़त और हिम्मत के साथ किया, बिना किसी डर या झिझक के। उन्होंने यह काम छिपकर या कमज़ोरी से नहीं, बल्कि पूरे साहस और भरोसे के साथ किया, क्योंकि वे जानते थे कि ये मूर्तियाँ न तो कोई नुक़सान पहुँचा सकती हैं और न ही कोई फ़ायदा।

इस घटना से हमें कई सबक़ मिलते हैं:

  1. सच्चाई के लिए साहस: इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अकेले ही झूठ और बुतपरस्ती के खिलाफ़ आवाज़ उठाई। उन्हें डर नहीं था कि क़ौम उन्हें नुक़सान पहुँचाएगी या सज़ा देगी। उनका भरोसा सिर्फ़ अल्लाह पर था। यह हमें सिखाता है कि सच्चाई के रास्ते पर चलने के लिए हिम्मत और अल्लाह पर भरोसा ज़रूरी है।
  2. बुतपरस्ती की बेहूदगी: जब इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने मूर्तियों को तोड़ा, तो उन्होंने अपनी क़ौम को यह साबित कर दिया कि ये पत्थर की मूर्तियाँ न तो अपनी रक्षा कर सकती हैं और न ही किसी की मदद कर सकती हैं। फिर इनकी पूजा क्यों की जाए? यही वह सवाल है जो हर इंसान को खुद से पूछना चाहिए — क्या हम उसकी इबादत कर रहे हैं जो सुनता है, देखता है और मदद कर सकता है, या ऐसी चीज़ों की जो बेजान हैं?
  3. तौहीद (एकेश्वरवाद) की महानता: यह आयत हमें याद दिलाती है कि इस्लाम का मूल संदेश तौहीद है — सिर्फ़ एक अल्लाह की इबादत करना। इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अपनी पूरी ज़िंदगी इसी संदेश के लिए समर्पित कर दी, और हमें भी उन्हीं के रास्ते पर चलना चाहिए।
  4. अल्लाह पर भरोसा: इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने जब यह काम किया, तो उन्हें पूरा यक़ीन था कि अल्लाह उनकी हिफ़ाज़त करेगा। और सच में, अल्लाह ने उन्हें आग से सुरक्षित रखा। यह हमारे लिए एक बड़ी तसल्ली है कि जब हम अल्लाह के लिए काम करते हैं, तो वह हमें कभी अकेला नहीं छोड़ता।

इस क़िस्से से हमें यह भी सीख मिलती है कि बुराई और झूठ के खिलाफ़ आवाज़ उठाना हर मुसलमान का फ़र्ज़ है, चाहे वह अकेला ही क्यों न हो। अल्लाह हमें इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की तरह सच्चाई पर साबित क़दम रहने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 91-95 — अस-साफ्फात

91فَرَاغَ إِلَىٰ آلِهَتِهِمْ فَقَالَ أَلَا تَأْكُلُونَ
(बस) फिर तो इबराहीम चुपके से उनके बुतों की तरफ मुतावज्जे हुए और (तान से) कहा तुम्हारे सामने इतने चढ़ाव रखते हैं
92مَا لَكُمْ لَا تَنطِقُونَ
आख़िर तुम खाते क्यों नहीं (अरे तुम्हें क्या हो गया है)
93فَرَاغَ عَلَيْهِمْ ضَرْبًا بِالْيَمِينِ
कि तुम बोलते तक नहीं
94فَأَقْبَلُوا إِلَيْهِ يَزِفُّونَ
फिर तो इबराहीम दाहिने हाथ से मारते हुए उन पर पिल पड़े (और तोड़-फोड़ कर एक बड़े बुत के गले में कुल्हाड़ी डाल दी)
95قَالَ أَتَعْبُدُونَ مَا تَنْحِتُونَ
जब उन लोगों को ख़बर हुई तो इबराहीम के पास दौड़ते हुए पहुँचे
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Tuesday, August 18, 2026

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