अज़-ज़ुमर · 13/75
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ुमर
قُلْ إِنِّي أَخَافُ إِنْ عَصَيْتُ رَبِّي عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ ۝١٣
Qul inneee akhaafu in `asaitu Rabbee `azaaba Yawmin `azeem
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि अगर मैं अपने परवरदिगार की नाफरमानी करूँ तो मैं एक बड़ी (सख्त) दिन (क़यामत) के अज़ाब से डरता हूँ

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • अख़ाफ़ु (أَخَافُ): मैं डरता हूँ।
  • असैतु (عَصَيْتُ): मैंने नाफ़रमानी की / अवज्ञा की।
  • अज़ाब (عَذَابَ): यातना / दंड।
  • यौमिन अज़ीम (يَوْمٍ عَظِيمٍ): महान दिन, यानी क़ियामत का दिन।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! आप लोगों से कह दीजिए कि मैं अपने रब की नाफ़रमानी से डरता हूँ। अगर मैंने उसके हुक्म की ख़िलाफ़वरज़ी की, उसकी इबादत में किसी को शरीक किया, या उसके बताए हुए रास्ते से हटकर चला, तो मुझे उस महान दिन — यानी क़ियामत के दिन — की सख्त से सख्त यातना का डर है। वह दिन इतना भयानक और हौलनाक होगा कि उसकी हीबत से आसमान टूट पड़ेंगे, पहाड़ रेत की तरह उड़ जाएँगे, और हर इंसान सिर्फ अपने कर्मों के सामने खड़ा होगा।

यह बात नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उस वक्त फ़रमाई जब उन्हें अपने बाप-दादा के दीन (शिर्क) की तरफ बुलाया गया। उन्होंने साफ़ कह दिया कि मैं तो सिर्फ अल्लाह की इबादत करता हूँ और उसी से डरता हूँ। अगर मैं उसकी नाफ़रमानी करूँ, तो मुझे उस दिन के अज़ाब से खौफ़ है, जिस दिन की सज़ा से बचने की ताकत किसी में नहीं।

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह के नबी को भी अपने रब का डर था, तो हम कौन होते हैं जो बेख़ौफ़ होकर गुनाह करें? यह डर बुरा नहीं है, बल्कि यही डर इंसान को नेकी की तरफ ले जाता है। जिस दिल में अल्लाह का खौफ़ होता है, वह दिल गुनाहों से दूर रहता है और नेकियों की तरफ दौड़ता है। यही वह डर है जो इंसान को जन्नत की राह दिखाता है और जहन्नम की आग से बचाता है।

प्यारे भाइयों और बहनों! हमें भी अपने नबी की इस सीख को अपनाना चाहिए। हमें चाहिए कि हम अल्लाह से डरें, उसकी नाफ़रमानी से बचें, और उस दिन के अज़ाब से पनाह माँगें। यह डर हमें सच्ची इबादत की तरफ ले जाएगा, और जो शख्स अल्लाह से डरता है, अल्लाह उसे हर मुसीबत से निकालने का रास्ता देता है और उसे ऐसी जगह से रिज़्क़ देता है जिसका उसे ख़याल भी नहीं होता। तो आइए, हम अपने दिलों में अल्लाह का खौफ़ पैदा करें, क्योंकि यही खौफ़ हमारी कामयाबी की कुंजी है।



📜 आयत 11-15 — अज़-ज़ुमर

11قُلْ إِنِّي أُمِرْتُ أَنْ أَعْبُدَ اللَّهَ مُخْلِصًا لَّهُ الدِّينَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मुझे तो ये हुक्म दिया गया है कि मैं इबादत को उसके लिए ख़ास करके खुदा ही की बन्दगी करो
12وَأُمِرْتُ لِأَنْ أَكُونَ أَوَّلَ الْمُسْلِمِينَ
और मुझे तो ये हुक्म दिया गया है कि मैं सबसे पहल मुसलमान हूँ
13قُلْ إِنِّي أَخَافُ إِنْ عَصَيْتُ رَبِّي عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि अगर मैं अपने परवरदिगार की नाफरमानी करूँ तो मैं एक बड़ी (सख्त) दिन (क़यामत) के अज़ाब से डरता हूँ
14قُلِ اللَّهَ أَعْبُدُ مُخْلِصًا لَّهُ دِينِي
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं अपनी इबादत को उसी के वास्ते ख़ालिस करके खुदा ही की बन्दगी करता हूँ (अब रहे तुम) तो उसके सिवा जिसको चाहो पूजो
15فَاعْبُدُوا مَا شِئْتُم مِّن دُونِهِ ۗ قُلْ إِنَّ الْخَاسِرِينَ الَّذِينَ خَسِرُوا أَنفُسَهُمْ وَأَهْلِيهِمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ أَلَا ذَٰلِكَ هُوَ الْخُسْرَانُ الْمُبِينُ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि फिल हक़ीक़त घाटे में वही लोग हैं जिन्होंने अपना और अपने लड़के वालों का क़यामत के दिन घाटा किया आगाह रहो कि सरीही (खुल्लम खुल्ला) घाटा यही है कि उनके लिए उनके ऊपर से आग ही के ओढ़ने होगें
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अनुवाद — अज़-ज़ुमर 13

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Tuesday, August 18, 2026

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