अज़-ज़ुमर · 12/75
अनुवाद उच्चारण — सूरा अज़-ज़ुमर
وَأُمِرْتُ لِأَنْ أَكُونَ أَوَّلَ الْمُسْلِمِينَ ۝١٢
Wa umirtu li an akoona awwalal muslimeen
📖 हिंदी अर्थ
और मुझे तो ये हुक्म दिया गया है कि मैं सबसे पहल मुसलमान हूँ

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • أُمِرْتُ — मुझे आदेश दिया गया।
  • أَوَّلَ الْمُسْلِمِينَ — सबसे पहले आज्ञाकारी (इस्लाम लाने वालों में अग्रणी)।

व्याख्या:

अल्लाह तआला ने अपने नबी ﷺ को आदेश दिया कि वे लोगों से स्पष्ट रूप से कहें: "मुझे आदेश दिया गया है कि मैं सबसे पहले आज्ञाकारी बनूँ।" यानी, मैं सबसे पहले अपने रब के सामने सिर झुकाऊँ, उसकी एकता (तौहीद) को स्वीकार करूँ, और उसकी इबादत में किसी को साझी न बनाऊँ। यह आदेश केवल नबी ﷺ के लिए नहीं था, बल्कि उनकी उम्मत के लिए भी था कि वे भी इस्लाम में अग्रणी बनें और दूसरों के लिए नमूना बनें।

इस आयत में दो आदेशों का उल्लेख है: पहला, इबादत को अल्लाह के लिए खालिस करना (सिर्फ उसी की इबादत करना), और दूसरा, इस्लाम में सबसे आगे होने का। यानी, मुसलमान को चाहिए कि वह न केवल खुद को इस्लाम पर स्थापित करे, बल्कि दूसरों को भी इस ओर बुलाए और अच्छे कर्मों में प्रतिस्पर्धा करे।

यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम में सबसे पहले और सबसे आगे होने का मतलब है — अल्लाह के प्रति पूर्ण समर्पण, उसकी आज्ञाओं का पालन, और उसकी राह में दूसरों के लिए मार्गदर्शक बनना। जब हम इस्लाम में अग्रणी बनते हैं, तो हम अपने जीवन को अल्लाह की रज़ा के अनुसार ढालते हैं और समाज में अच्छाई का प्रसार करते हैं।

यह आयत हमें यह भी बताती है कि नबी ﷺ ने सबसे पहले इस्लाम कबूल किया और अपनी उम्मत के लिए राह दिखाई। हमें भी चाहिए कि हम अपने जीवन में इस्लाम को सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण स्थान दें, और दूसरों को भी इस ओर बुलाएँ। यही सच्ची सफलता है — अल्लाह की रज़ा और उसकी जन्नत।

इस आयत से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि हम अपने ईमान में सच्चे हों, अपनी इबादत को खालिस करें, और इस्लाम की राह में सबसे आगे रहने का प्रयास करें। यही वह रास्ता है जो हमें दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी देगा।



📜 आयत 10-14 — सूरा अज़-ज़ुमर

10قُلْ يَا عِبَادِ الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا رَبَّكُمْ ۚ لِلَّذِينَ أَحْسَنُوا فِي هَٰذِهِ الدُّنْيَا حَسَنَةٌ ۗ وَأَرْضُ اللَّهِ وَاسِعَةٌ ۗ إِنَّمَا يُوَفَّى الصَّابِرُونَ أَجْرَهُم بِغَيْرِ حِسَابٍ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि ऐ मेरे ईमानदार बन्दों अपने परवरदिगार (ही) से डरते रहो (क्योंकि) जिन लोगों ने इस दुनिया में नेकी की उन्हीं के लिए (आख़ेरत में) भलाई है और खुदा की ज़मीन तो कुशादा है (जहाँ इबादत न कर सको उसे छोड़ दो) सब्र करने वालों ही की तो उनका भरपूर बेहिसाब बदला दिया जाएगा
11قُلْ إِنِّي أُمِرْتُ أَنْ أَعْبُدَ اللَّهَ مُخْلِصًا لَّهُ الدِّينَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मुझे तो ये हुक्म दिया गया है कि मैं इबादत को उसके लिए ख़ास करके खुदा ही की बन्दगी करो
12وَأُمِرْتُ لِأَنْ أَكُونَ أَوَّلَ الْمُسْلِمِينَ
और मुझे तो ये हुक्म दिया गया है कि मैं सबसे पहल मुसलमान हूँ
13قُلْ إِنِّي أَخَافُ إِنْ عَصَيْتُ رَبِّي عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि अगर मैं अपने परवरदिगार की नाफरमानी करूँ तो मैं एक बड़ी (सख्त) दिन (क़यामत) के अज़ाब से डरता हूँ
14قُلِ اللَّهَ أَعْبُدُ مُخْلِصًا لَّهُ دِينِي
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं अपनी इबादत को उसी के वास्ते ख़ालिस करके खुदा ही की बन्दगी करता हूँ (अब रहे तुम) तो उसके सिवा जिसको चाहो पूजो
अज़-ज़ुमरकुरान सूची
75आयत
मक्कीअवतरण स्थान
12आयत

अनुवाद — अज़-ज़ुमर 12

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Friday, October 2, 2026

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