अन-निसा · 145/176
अनुवाद उच्चारण — अन-निसा
إِنَّ الْمُنَافِقِينَ فِي الدَّرْكِ الْأَسْفَلِ مِنَ النَّارِ وَلَن تَجِدَ لَهُمْ نَصِيرًا ۝١٤٥
Innal munaafiqeena fiddarkil asfali minan Naari wa lan tajjida lahum naseeraa
📖 हिंदी अर्थ
इसमें तो शक ही नहीं कि मुनाफ़िक जहन्नुम के सबसे नीचे तबके में होंगे और (ऐ रसूल) तुम वहॉ किसी को उनका हिमायती भी न पाओगे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الدَّرْكِ الأَسْفَلِ: नरक का सबसे निचला और सबसे भयानक स्तर, जो सबसे गहरा और सबसे कष्टदायक स्थान है।
  • نَصِيرًا: सहायक, मददगार, कोई जो उन्हें इस आज़ाब से बचा सके।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) के अंजाम को बयान कर रहा है। ये वे लोग हैं जो बाहर से मुसलमान बनते हैं लेकिन दिल में कुफ़्र और ईमान से नफ़रत रखते हैं। अल्लाह फ़रमाता है कि ये मुनाफ़िक़ क़ियामत के दिन नरक के सबसे निचले और सबसे गहरे हिस्से में डाले जाएँगे। यह वह स्थान है जो सबसे अधिक गर्म, सबसे अधिक तंग और सबसे अधिक यातनादायक होगा। उनके लिए कोई मददगार नहीं होगा जो उन्हें इस भयानक अज़ाब से बचा सके या उनकी पीड़ा कम कर सके। यह उनके दोहरेपन और धोखे की सज़ा है, क्योंकि उन्होंने दुनिया में ईमान का दिखावा किया और अल्लाह और मुसलमानों को धोखा दिया, इसलिए अल्लाह उन्हें सबसे बुरे ठिकाने में डालेगा।

फ़ायदे (सबक):

  1. नफ़ाक़ (दोहरापन) सबसे बुरी बीमारी है — यह आयत हमें सिखाती है कि दिल में ईमान न होते हुए भी मुसलमान बनने का दिखावा करना सबसे बड़ा गुनाह है, और इसकी सज़ा सबसे भयानक होगी। इसलिए हमें अपने दिल और अमल को साफ़ रखना चाहिए और कभी धोखेबाज़ी नहीं करनी चाहिए।
  2. ईमान की हिफ़ाज़त करें — हमें अपने ईमान की रक्षा करनी चाहिए और उसे कमज़ोर नहीं पड़ने देना चाहिए, क्योंकि ईमान की कमज़ोरी ही इंसान को नफ़ाक़ की तरफ ले जाती है।
  3. अल्लाह की रहमत का एहसास — यह आयत हमें यह भी याद दिलाती है कि अल्लाह ने हमें ईमान और इस्लाम की नेमत दी है, इसलिए हमें इस नेमत की क़द्र करनी चाहिए और उस पर साबित क़दम रहना चाहिए।
  4. सच्चाई और इख़लास की तरग़ीब — यह आयत हमें सच्चे मुसलमान बनने की तरग़ीब देती है, यानी जो हमारे दिल में हो वही हमारी ज़ुबान और अमल पर हो। सच्चाई और इख़लास ही वह रास्ता है जो हमें जहन्नम के सबसे निचले दर्जे से बचाकर जन्नत की ऊँचाइयों तक पहुँचाता है।


📜 आयत 143-147 — अन-निसा

143مُّذَبْذَبِينَ بَيْنَ ذَٰلِكَ لَا إِلَىٰ هَٰؤُلَاءِ وَلَا إِلَىٰ هَٰؤُلَاءِ ۚ وَمَن يُضْلِلِ اللَّهُ فَلَن تَجِدَ لَهُ سَبِيلًا
इस कुफ़्र व ईमान के बीच अधड़ में पड़े झूल रहे हैं न उन (मुसलमानों) की तरफ़ न उन काफ़िरों की तरफ़ और (ऐ रसूल) जिसे ख़ुदा गुमराही में छोड़ दे उसकी (हिदायत की) तुम हरगिज़ सबील नहीं कर सकते
144يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا الْكَافِرِينَ أَوْلِيَاءَ مِن دُونِ الْمُؤْمِنِينَ ۚ أَتُرِيدُونَ أَن تَجْعَلُوا لِلَّهِ عَلَيْكُمْ سُلْطَانًا مُّبِينًا
ऐ ईमान वालों मोमिनीन को छोड़कर काफ़िरों को (अपना) सरपरस्त न बनाओ क्या ये तुम चाहते हो कि ख़ुदा का सरीही इल्ज़ाम अपने सर क़ायम कर लो
145إِنَّ الْمُنَافِقِينَ فِي الدَّرْكِ الْأَسْفَلِ مِنَ النَّارِ وَلَن تَجِدَ لَهُمْ نَصِيرًا
इसमें तो शक ही नहीं कि मुनाफ़िक जहन्नुम के सबसे नीचे तबके में होंगे और (ऐ रसूल) तुम वहॉ किसी को उनका हिमायती भी न पाओगे
146إِلَّا الَّذِينَ تَابُوا وَأَصْلَحُوا وَاعْتَصَمُوا بِاللَّهِ وَأَخْلَصُوا دِينَهُمْ لِلَّهِ فَأُولَٰئِكَ مَعَ الْمُؤْمِنِينَ ۖ وَسَوْفَ يُؤْتِ اللَّهُ الْمُؤْمِنِينَ أَجْرًا عَظِيمًا
मगर (हॉ) जिन लोगों ने (निफ़ाक़ से) तौबा कर ली और अपनी हालत दुरूस्त कर ली और ख़ुदा से लगे लिपटे रहे और अपने दीन को महज़ ख़ुदा के वास्ते निरा खरा कर लिया तो ये लोग मोमिनीन के साथ (बेहिश्त में) होंगे और मोमिनीन को ख़ुदा अनक़रीब ही बड़ा (अच्छा) बदला अता फ़रमाएगा
147مَّا يَفْعَلُ اللَّهُ بِعَذَابِكُمْ إِن شَكَرْتُمْ وَآمَنتُمْ ۚ وَكَانَ اللَّهُ شَاكِرًا عَلِيمًا
अगर तुमने ख़ुदा का शुक्र किया और उसपर ईमान लाए तो ख़ुदा तुम पर अज़ाब करके क्या करेगा बल्कि ख़ुदा तो (ख़ुद शुक्र करने वालों का) क़दरदॉ और वाक़िफ़कार है
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अनुवाद — अन-निसा 145

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Tuesday, August 18, 2026

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