Innal lazeena yakkfuroona billaahi wa Rusulihee wa yureedoona ai yufarriqoo bainal laahi wa Rusulihee wa yaqooloona nu`minu biba`dinw wa nakfuru biba` dinw wa yureedoona ai yattakhizoo baina zaalika sabeelaa
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
बेशक जो लोग ख़ुदा और उसके रसूलों से इन्कार करते हैं और ख़ुदा और उसके रसूलों में तफ़रक़ा डालना चाहते हैं और कहते हैं कि हम बाज़ (पैग़म्बरों) पर ईमान लाए हैं और बाज़ का इन्कार करते हैं और चाहते हैं कि इस (कुफ़्र व ईमान) के दरमियान एक दूसरी राह निकलें
🌐 Additional reference in اردو
🌐 اردو
جو لوگ خدا سے اور اس کے پیغمبروں سے کفر کرتے ہیں اور خدا اور اس کے پیغمبروں میں فرق کرنا چاہتے ہیں اور کہتے ہیں کہ ہم بعض کو مانتے ہیں اور بعض کو نہیں مانتے اور ایمان اور کفر کے بیچ میں ایک راہ نکالنی چاہتے ہیں
يَكْفُرُونَ بِاللَّهِ وَرُسُلِهِ: अल्लाह और उसके रसूलों को नकारना और उन पर ईमान न लाना।
يُفَرِّقُوا بَيْنَ اللَّهِ وَرُسُلِهِ: अल्लाह और उसके रसूलों के बीच अंतर करना, यानी अल्लाह पर ईमान लाना लेकिन उसके रसूलों को नकारना।
نُؤْمِنُ بِبَعْضٍ وَنَكْفُرُ بِبَعْضٍ: हम कुछ रसूलों पर ईमान लाते हैं और कुछ को नकारते हैं।
سَبِيلًا: रास्ता, मार्ग।
तफसीर (व्याख्या):
यह आयत उन लोगों के बारे में बताती है जो अल्लाह और उसके रसूलों के साथ कुफ्र (इनकार) करते हैं। इनमें वे लोग शामिल हैं जो अल्लाह पर तो ईमान रखते हैं, लेकिन उसके रसूलों को नहीं मानते, या कुछ रसूलों को मानते हैं और कुछ को नकार देते हैं। यहूदियों और ईसाइयों का हाल यही था—यहूदी मूसा (अलैहिस्सलाम) और तौरात पर ईमान रखते थे, लेकिन ईसा (अलैहिस्सलाम) और मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को नकारते थे; ईसाई ईसा (अलैहिस्सलाम) और इंजील पर ईमान रखते थे, लेकिन मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को नहीं मानते थे। वे सोचते थे कि इस तरह वे एक बीच का रास्ता निकाल लेंगे, जिससे वे अपने आप को सही ठहरा सकें और अपनी मनमानी कर सकें। लेकिन यह उनका भ्रम है, क्योंकि अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान एक अटूट सत्य है—जो एक रसूल को नकारता है, उसने सभी रसूलों को नकारा और अल्लाह पर भी पूर्ण ईमान नहीं लाया। अल्लाह ने सभी रसूलों को एक ही सत्य (तौहीद) के साथ भेजा, और उन सब पर ईमान लाना हर मुसलमान का अनिवार्य कर्तव्य है।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
यह आयत हमें सिखाती है कि ईमान एक समग्र (संपूर्ण) चीज़ है—उसे टुकड़ों में नहीं बाँटा जा सकता। जो अल्लाह के किसी रसूल को नकारता है, उसका ईमान अधूरा और अमान्य है।
इस्लाम में सभी नबियों और रसूलों का सम्मान करना अनिवार्य है, और उनके बीच कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता। यही सच्चे मुसलमान की पहचान है।
यह आयत हमें चेतावनी देती है कि धर्म में आधे-अधूरे रास्ते या समझौते की कोशिश करना गुमराही है। सच्चा रास्ता केवल अल्लाह और उसके सभी रसूलों पर पूर्ण ईमान लाना है।
यह हमें यह भी बताती है कि अल्लाह की रहमत और मार्गदर्शन उन्हीं को मिलता है जो पूरी तरह से उसके आगे सिर झुकाते हैं और उसके भेजे हुए हर रसूल को मानते हैं। यही वह रास्ता है जो हमें सच्ची सफलता और शांति तक पहुँचाता है।
बेशक जो लोग ख़ुदा और उसके रसूलों से इन्कार करते हैं और ख़ुदा और उसके रसूलों में तफ़रक़ा डालना चाहते हैं और कहते हैं कि हम बाज़ (पैग़म्बरों) पर ईमान लाए हैं और बाज़ का इन्कार करते हैं और चाहते हैं कि इस (कुफ़्र व ईमान) के दरमियान एक दूसरी राह निकलें
बेशक जो लोग ख़ुदा और उसके रसूलों से इन्कार करते हैं और ख़ुदा और उसके रसूलों में तफ़रक़ा डालना चाहते हैं और कहते हैं कि हम बाज़ (पैग़म्बरों) पर ईमान लाए हैं और बाज़ का इन्कार करते हैं और चाहते हैं कि इस (कुफ़्र व ईमान) के दरमियान एक दूसरी राह निकलें
और जो लोग ख़ुदा और उसके रसूलों पर ईमान लाए और उनमें से किसी में तफ़रक़ा नहीं करते तो ऐसे ही लोगों को ख़ुदा बहुत जल्द उनका अज्र अता फ़रमाएगा और ख़ुदा तो बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
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