अन-निसा · 7/176
अनुवाद उच्चारण — अन-निसा
لِّلرِّجَالِ نَصِيبٌ مِّمَّا تَرَكَ الْوَالِدَانِ وَالْأَقْرَبُونَ وَلِلنِّسَاءِ نَصِيبٌ مِّمَّا تَرَكَ الْوَالِدَانِ وَالْأَقْرَبُونَ مِمَّا قَلَّ مِنْهُ أَوْ كَثُرَ ۚ نَصِيبًا مَّفْرُوضًا ۝٧
Lirrijaali naseebum mimmaa tarakal waalidaani wal aqraboona wa lin nisaaa`i naseebum mimmaa tarakal waalidaani wal aqraboona mimmaa qalla minhu aw kasur; naseebam mafroodaa
📖 हिंदी अर्थ
मॉ बाप और क़राबतदारों के तर्के में कुछ हिस्सा ख़ास मर्दों का है और उसी तरह माँ बाब और क़राबतदारो के तरके में कुछ हिस्सा ख़ास औरतों का भी है ख्वाह तर्क कम हो या ज्यादा (हर शख्स का) हिस्सा (हमारी तरफ़ से) मुक़र्रर किया हुआ है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • نَصِيبٌ: हिस्सा, भाग
  • تَرَكَ: छोड़ा, मृतक का छोड़ा हुआ धन (विरासत)
  • الْوَالِدَانِ: माता-पिता
  • الْأَقْرَبُونَ: रिश्तेदार, निकट के सम्बन्धी
  • مِمَّا قَلَّ مِنْهُ أَوْ كَثُرَ: चाहे वह (धन) थोड़ा हो या अधिक
  • نَصِيبًا مَّفْرُوضًا: निर्धारित किया हुआ हिस्सा, जो अल्लाह ने अनिवार्य कर दिया हो

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत मीरास (विरासत) के उस मौलिक सिद्धांत को स्थापित करती है जो जाहिलियत के दौर में मौजूद बुरी प्रथा को समाप्त करता है। उस समय अरब समाज में केवल लड़के और बड़े आदमी ही विरासत पाते थे, जबकि औरतें, लड़कियाँ और छोटे बच्चे विरासत से पूरी तरह वंचित रह जाते थे। अल्लाह तआला ने इस आयत में स्पष्ट कर दिया कि:

पुरुषों के लिए — चाहे वे बड़े हों या छोटे, उस धन में हिस्सा है जो माता-पिता और निकट के रिश्तेदार (जैसे भाई, चाचा आदि) मरते समय छोड़कर जाएँ।

और स्त्रियों के लिए भी — उसी धन में हिस्सा है, चाहे वह धन थोड़ा हो या अधिक। यह हिस्सा अल्लाह की ओर से निर्धारित और अनिवार्य है, जिसे देने से किसी को इनकार नहीं करना चाहिए।

इस आयत ने स्त्रियों और बच्चों को वह अधिकार दिया जो उन्हें सदियों से नहीं मिला था। यह कोई सामान्य हिस्सा नहीं है, बल्कि अल्लाह ने इसे "مَفْرُوضًا" (निर्धारित और अनिवार्य) कहा है, यानी यह एक ऐसा हक़ है जिसे अदा करना हर मुसलमान पर लाज़िमी है।

फ़ायदे (लाभ):

  1. इस्लाम में स्त्री का सम्मान: यह आयत साबित करती है कि इस्लाम ने 1400 साल पहले स्त्रियों को आर्थिक अधिकार दिए, जब दुनिया की कोई सभ्यता उन्हें यह अधिकार नहीं देती थी। यह इस्लाम की सच्ची तस्वीर है — जो औरत को ज़िल्लत नहीं, बल्कि इज़्ज़त देता है।
  2. अल्लाह की रहमत और इंसाफ़: अल्लाह ने अपनी बेपनाह रहमत से हर इंसान का हक़ निर्धारित किया है, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, बड़ा हो या छोटा। यह अल्लाह के न्याय की निशानी है कि उसने किसी को उसके हक़ से महरूम नहीं रखा।
  3. माल की हक़ीक़त: यह आयत हमें सिखाती है कि धन चाहे थोड़ा हो या अधिक, उसमें दूसरों का भी हक़ होता है। इससे हमें माल की محبت में कंजूसी नहीं करनी चाहिए, बल्कि अल्लाह के बताए हुए हिस्से उनके हक़दारों तक पहुँचाने चाहिएं।
  4. खानदानी रिश्तों की मज़बूती: जब हर व्यक्ति को उसका हक़ मिलेगा, तो खानदान में मोहब्बत और भाईचारा बढ़ेगा। यह आयत उन झगड़ों को खत्म करती है जो विरासत की वजह से खानदानों में पैदा होते हैं।
  5. क़ुरआन की कामिल तालीमात: यह आयत इस बात का सबूत है कि क़ुरआन हर ज़माने और हर मुआमले में इंसानों की रहनुमाई करता है — चाहे वह इबादत हो या मुआमलात, दुनिया हो या आख़िरत।
🎧 सुनें

📜 आयत 5-9 — अन-निसा

5وَلَا تُؤْتُوا السُّفَهَاءَ أَمْوَالَكُمُ الَّتِي جَعَلَ اللَّهُ لَكُمْ قِيَامًا وَارْزُقُوهُمْ فِيهَا وَاكْسُوهُمْ وَقُولُوا لَهُمْ قَوْلًا مَّعْرُوفًا
और अपने वह माल जिनपर ख़ुदा ने तुम्हारी गुज़र न क़रार दी है बेवकूफ़ों (ना समझ यतीम) को न दे बैठो हॉ उसमें से उन्हें खिलाओ और उनको पहनाओ (तो मज़ाएक़ा नहीं) और उनसे (शौक़ से) अच्छी तरह बात करो
6وَابْتَلُوا الْيَتَامَىٰ حَتَّىٰ إِذَا بَلَغُوا النِّكَاحَ فَإِنْ آنَسْتُم مِّنْهُمْ رُشْدًا فَادْفَعُوا إِلَيْهِمْ أَمْوَالَهُمْ ۖ وَلَا تَأْكُلُوهَا إِسْرَافًا وَبِدَارًا أَن يَكْبَرُوا ۚ وَمَن كَانَ غَنِيًّا فَلْيَسْتَعْفِفْ ۖ وَمَن كَانَ فَقِيرًا فَلْيَأْكُلْ بِالْمَعْرُوفِ ۚ فَإِذَا دَفَعْتُمْ إِلَيْهِمْ أَمْوَالَهُمْ فَأَشْهِدُوا عَلَيْهِمْ ۚ وَكَفَىٰ بِاللَّهِ حَسِيبًا
और यतीमों को कारोबार में लगाए रहो यहॉ तक के ब्याहने के क़ाबिल हों फिर उस वक्त तुम उन्हे (एक महीने का ख़र्च) उनके हाथ से कराके अगर होशियार पाओ तो उनका माल उनके हवाले कर दो और (ख़बरदार) ऐसा न करना कि इस ख़ौफ़ से कि कहीं ये बड़े हो जाएंगे फ़ुज़ूल ख़र्ची करके झटपट उनका माल चट कर जाओ और जो (जो वली या सरपरस्त) दौलतमन्द हो तो वह (माले यतीम अपने ख़र्च में लाने से) बचता रहे और (हॉ) जो मोहताज हो वह अलबत्ता (वाजिबी) दस्तूर के मुताबिक़ खा सकता है पस जब उनके माल उनके हवाले करने लगो तो लोगों को उनका गवाह बना लो और (यूं तो) हिसाब लेने को ख़ुदा काफ़ी ही है
7لِّلرِّجَالِ نَصِيبٌ مِّمَّا تَرَكَ الْوَالِدَانِ وَالْأَقْرَبُونَ وَلِلنِّسَاءِ نَصِيبٌ مِّمَّا تَرَكَ الْوَالِدَانِ وَالْأَقْرَبُونَ مِمَّا قَلَّ مِنْهُ أَوْ كَثُرَ ۚ نَصِيبًا مَّفْرُوضًا
मॉ बाप और क़राबतदारों के तर्के में कुछ हिस्सा ख़ास मर्दों का है और उसी तरह माँ बाब और क़राबतदारो के तरके में कुछ हिस्सा ख़ास औरतों का भी है ख्वाह तर्क कम हो या ज्यादा (हर शख्स का) हिस्सा (हमारी तरफ़ से) मुक़र्रर किया हुआ है
8وَإِذَا حَضَرَ الْقِسْمَةَ أُولُو الْقُرْبَىٰ وَالْيَتَامَىٰ وَالْمَسَاكِينُ فَارْزُقُوهُم مِّنْهُ وَقُولُوا لَهُمْ قَوْلًا مَّعْرُوفًا
और जब (तर्क की) तक़सीम के वक्त (वह) क़राबतदार (जिनका कोई हिस्सा नहीं) और यतीम बच्चे और मोहताज लोग आ जाएं तो उन्हे भी कुछ उसमें से दे दो और उसे अच्छी तरह (उनवाने शाइस्ता से) बात करो
9وَلْيَخْشَ الَّذِينَ لَوْ تَرَكُوا مِنْ خَلْفِهِمْ ذُرِّيَّةً ضِعَافًا خَافُوا عَلَيْهِمْ فَلْيَتَّقُوا اللَّهَ وَلْيَقُولُوا قَوْلًا سَدِيدًا
और उन लोगों को डरना (और ख्याल करना चाहिये) कि अगर वह लोग ख़ुद अपने बाद (नन्हे नन्हे) नातवॉ बच्चे छोड़ जाते तो उन पर (किस क़दर) तरस आता पस उनको (ग़रीब बच्चों पर सख्ती करने में) ख़ुदा से डरना चाहिये और उनसे सीधी तरह बात करना चाहिए
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अनुवाद — अन-निसा 7

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Tuesday, August 18, 2026

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