ग़ाफिर · 29/85
अनुवाद उच्चारण — ग़ाफिर
يَا قَوْمِ لَكُمُ الْمُلْكُ الْيَوْمَ ظَاهِرِينَ فِي الْأَرْضِ فَمَن يَنصُرُنَا مِن بَأْسِ اللَّهِ إِن جَاءَنَا ۚ قَالَ فِرْعَوْنُ مَا أُرِيكُمْ إِلَّا مَا أَرَىٰ وَمَا أَهْدِيكُمْ إِلَّا سَبِيلَ الرَّشَادِ ۝٢٩
Yaa qawmi lakumul mulkul yawma zaahireena fil ardi famai yansurunaa mim baasil laahi in jaaa`anaa; qaala Fir`awnu maaa ureekum illaa maaa araa wa maaa ahdeekum illaa sabeelar Rashaad
📖 हिंदी अर्थ
ऐ मेरी क़ौम आज तो (बेशक) तुम्हारी बादशाहत है (और) मुल्क में तुम्हारा ही बोल बाला है लेकिन (कल) अगर ख़ुदा का अज़ाब हम पर आ जाए तो हमारी कौन मदद करेगा फिरऔन ने कहा मैं तो वही बात समझाता हूँ जो मैं ख़़ुद समझता हूँ और वही राह दिखाता हूँ जिसमें भलाई है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • ظَاهِرِينَ: ग़ालिब (प्रभुत्वशाली) होकर, ऊपर रहते हुए
  • بَأْسِ: यातना, अज़ाब, कठोर पकड़
  • سَبِيلَ الرَّشَاد: सीधा और भलाई का रास्ता

तफ़सीर:

ऐ मेरी क़ौम के लोगो! आज तुम्हें मिस्र की ज़मीन पर पूरा राज्य और अधिकार हासिल है, तुम ग़ालिब हो और अपनी रिआया (प्रजा) पर पूरा नियंत्रण रखते हो। लेकिन याद रखो, यह सब कुछ फ़ानी है और एक दिन ख़त्म होने वाला है। अगर अल्लाह का अज़ाब आ जाए, तो कौन है जो हमें उससे बचा सकता है? क्या तुम्हारी सल्तनत, तुम्हारी फ़ौजें या तुम्हारी ताक़त अल्लाह की पकड़ से बचा सकती है? यह सवाल उस ईमानदार आदमी ने किया जो फ़िरऔन के दरबार में ईमान छिपाकर रहता था, और वह अपनी क़ौम को अल्लाह के अज़ाब से डरा रहा था।

इस पर फ़िरऔन ने अपनी हठधर्मिता और अहंकार के साथ जवाब दिया: "मैं तुम्हें वही राय देता हूं जो मैं खुद अपने लिए बेहतर समझता हूं, और मैं तुम्हें सिवाय भलाई और सीधे रास्ते के और किसी चीज़ की तरफ़ नहीं बुलाता।" यानी फ़िरऔन अपनी ग़लत राय को ही सच्चाई समझ रहा था और अपनी ज़िद पर अड़ा हुआ था। उसने मूसा (अलैहिस्सलाम) को क़त्ल करने की साज़िश की, यह समझते हुए कि यही रास्ता सही है, जबकि वह अपने और अपनी क़ौम के लिए तबाही का रास्ता चुन रहा था।

दीनी पैग़ाम:

यह आयत हमें सिखाती है कि इंसान को चाहिए कि वह अपनी अक्ल और राय को ही आख़िरी फ़ैसला न समझे, बल्कि अल्लाह की वही और नबी की शिक्षा को अपना रहनुमा बनाए। फ़िरऔन जैसे लोग अपनी सल्तनत और ताक़त पर इतना घमंड करते हैं कि उन्हें यक़ीन हो जाता है कि कोई उन्हें हरा नहीं सकता, लेकिन अल्लाह की पकड़ बहुत सख्त है। हमें चाहिए कि हम अपने जीवन में अल्लाह के हुक्म को सबसे ऊपर रखें, क्योंकि असली इज़्ज़त और कामयाबी उसी की तरफ़ से आती है। जो लोग अपनी राय को ही सब कुछ समझ लेते हैं और हक़ की दावत को ठुकरा देते हैं, वे आख़िरकार उसी अज़ाब में मुब्तला होते हैं जिससे वे बचना चाहते थे। अल्लाह से दुआ है कि वह हमें हक़ को हक़ समझकर उस पर चलने की तौफ़ीक़ दे और बातिल को बातिल समझकर उससे बचने की हिम्मत अता फ़रमाए। आमीन।



📜 आयत 27-31 — ग़ाफिर

27وَقَالَ مُوسَىٰ إِنِّي عُذْتُ بِرَبِّي وَرَبِّكُم مِّن كُلِّ مُتَكَبِّرٍ لَّا يُؤْمِنُ بِيَوْمِ الْحِسَابِ
और मूसा ने कहा कि मैं तो हर मुताकब्बिर से जो हिसाब के दिन (क़यामत पर ईमान नहीं लाता) अपने और तुम्हारे परवरदिगार की पनाह ले चुका हूं
28وَقَالَ رَجُلٌ مُّؤْمِنٌ مِّنْ آلِ فِرْعَوْنَ يَكْتُمُ إِيمَانَهُ أَتَقْتُلُونَ رَجُلًا أَن يَقُولَ رَبِّيَ اللَّهُ وَقَدْ جَاءَكُم بِالْبَيِّنَاتِ مِن رَّبِّكُمْ ۖ وَإِن يَكُ كَاذِبًا فَعَلَيْهِ كَذِبُهُ ۖ وَإِن يَكُ صَادِقًا يُصِبْكُم بَعْضُ الَّذِي يَعِدُكُمْ ۖ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي مَنْ هُوَ مُسْرِفٌ كَذَّابٌ
और फिरऔन के लोगों में एक ईमानदार शख्स (हिज़कील) ने जो अपने ईमान को छिपाए रहता था (लोगों से कहा) कि क्या तुम लोग ऐसे शख्स के क़त्ल के दरपै हो जो (सिर्फ) ये कहता है कि मेरा परवरदिगार अल्लाह है) हालाँकि वह तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से तुम्हारे पास मौजिज़े लेकर आया और अगर (बिल ग़रज़) ये शख्स झूठा है तो इसके झूठ का बवाल इसी पर पड़ेगा और अगर यह कहीं सच्चा हुआ तो जिस (अज़ाब की) तुम्हें ये धमकी देता है उसमें से कुछ तो तुम लोगों पर ज़रूर वाकेए होकर रहेगा बेशक ख़ुदा उस शख्स की हिदायत नहीं करता जो हद से गुज़रने वाला (और) झूठा हो
29يَا قَوْمِ لَكُمُ الْمُلْكُ الْيَوْمَ ظَاهِرِينَ فِي الْأَرْضِ فَمَن يَنصُرُنَا مِن بَأْسِ اللَّهِ إِن جَاءَنَا ۚ قَالَ فِرْعَوْنُ مَا أُرِيكُمْ إِلَّا مَا أَرَىٰ وَمَا أَهْدِيكُمْ إِلَّا سَبِيلَ الرَّشَادِ
ऐ मेरी क़ौम आज तो (बेशक) तुम्हारी बादशाहत है (और) मुल्क में तुम्हारा ही बोल बाला है लेकिन (कल) अगर ख़ुदा का अज़ाब हम पर आ जाए तो हमारी कौन मदद करेगा फिरऔन ने कहा मैं तो वही बात समझाता हूँ जो मैं ख़़ुद समझता हूँ और वही राह दिखाता हूँ जिसमें भलाई है
30وَقَالَ الَّذِي آمَنَ يَا قَوْمِ إِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُم مِّثْلَ يَوْمِ الْأَحْزَابِ
तो जो शख्स (दर पर्दा) ईमान ला चुका था कहने लगा, भाईयों मुझे तो तुम्हारी निस्बत भी और उम्मतों की तरह रोज़ (बद) का अन्देशा है
31مِثْلَ دَأْبِ قَوْمِ نُوحٍ وَعَادٍ وَثَمُودَ وَالَّذِينَ مِن بَعْدِهِمْ ۚ وَمَا اللَّهُ يُرِيدُ ظُلْمًا لِّلْعِبَادِ
(कहीं तुम्हारा भी वही हाल न हो) जैसा कि नूह की क़ौम और आद समूद और उनके बाद वाले लोगों का हाल हुआ और ख़ुदा तो बन्दों पर ज़ुल्म करना चाहता ही नहीं
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अनुवाद — ग़ाफिर 29

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Tuesday, August 18, 2026

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