ग़ाफिर · 30/85
अनुवाद उच्चारण — ग़ाफिर
وَقَالَ الَّذِي آمَنَ يَا قَوْمِ إِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُم مِّثْلَ يَوْمِ الْأَحْزَابِ ۝٣٠
Wa qaalal lazee aamana yaa qawmi inneee akhaafu `alaikum misla yawmil Ahzaab
📖 हिंदी अर्थ
तो जो शख्स (दर पर्दा) ईमान ला चुका था कहने लगा, भाईयों मुझे तो तुम्हारी निस्बत भी और उम्मतों की तरह रोज़ (बद) का अन्देशा है
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَوْمِ الْأَحْزَابِ - उन गिरोहों (समूहों) का दिन, यानी वे दिन जब अतीत की उम्मतों ने मिलकर अपने नबियों के खिलाफ साजिशें रचीं और उनका विरोध किया।

तफसीर (व्याख्या):

जब फिरऔन और उसके दरबारियों ने हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) को क़त्ल करने का इरादा किया, तो उस ईमानदार व्यक्ति ने, जो फिरऔन के खानदान से था लेकिन अपना ईमान छिपाए हुए था, अपनी क़ौम को नसीहत करते हुए कहा: "ऐ मेरी क़ौम! मैं तुम्हारे लिए डरता हूँ कि अगर तुमने मूसा को नाहक़ क़त्ल कर दिया, तो तुम पर भी वैसा ही अज़ाब आ सकता है जैसा उन गिरोहों पर आया था जो अपने नबियों के खिलाफ इकट्ठे हुए थे।"

यानी उन अगली उम्मतों ने जब अपने पैग़म्बरों का विरोध किया और उन्हें नुक़सान पहुँचाने की कोशिश की, तो अल्लाह ने उन्हें अपनी पकड़ में ले लिया और उन पर ऐसा अज़ाब नाज़िल किया जिसने उन्हें तबाह कर दिया। यह ईमानदार आदमी अपनी क़ौम को आगाह कर रहा था कि तुम भी अगर उसी रास्ते पर चले, तो तुम्हारा अंजाम भी वैसा ही होगा।

यह नसीहत उसने महज़ दुनियावी खौफ़ की बिना पर नहीं दी, बल्कि उसका असली मक़सद यह था कि उन्हें अल्लाह के अज़ाब से डराए और उन्हें सीधे रास्ते पर लाए। वह जानता था कि अल्लाह का अज़ाब बहुत सख्त है और उससे बचने का एक ही रास्ता है - अल्लाह के रसूल पर ईमान लाना और उसकी इताअत करना।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि एक सच्चा मोमिन अपनी क़ौम की भलाई के लिए हमेशा फिक्रमंद रहता है। वह चाहता है कि उसकी क़ौम अल्लाह के अज़ाब से बचे और हिदायत पाए। यह भी सबक है कि नबियों के खिलाफ साजिशें रचने वालों का अंजाम हमेशा बुरा रहा है। अल्लाह अपने नबियों की मदद करता है और उनके दुश्मनों को रुसवा करता है। हमें चाहिए कि हम अपने जीवन में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सुन्नत को अपनाएँ और उन रास्तों से बचें जिन पर चलकर अगली उम्मतें तबाह हुईं। अल्लाह की रहमत उन लोगों के लिए है जो उसके दीन की तरफ बुलाते हैं और अपनी क़ौम को अज़ाब से डराते हैं।

🎧 सुनें

📜 आयत 28-32 — ग़ाफिर

28وَقَالَ رَجُلٌ مُّؤْمِنٌ مِّنْ آلِ فِرْعَوْنَ يَكْتُمُ إِيمَانَهُ أَتَقْتُلُونَ رَجُلًا أَن يَقُولَ رَبِّيَ اللَّهُ وَقَدْ جَاءَكُم بِالْبَيِّنَاتِ مِن رَّبِّكُمْ ۖ وَإِن يَكُ كَاذِبًا فَعَلَيْهِ كَذِبُهُ ۖ وَإِن يَكُ صَادِقًا يُصِبْكُم بَعْضُ الَّذِي يَعِدُكُمْ ۖ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي مَنْ هُوَ مُسْرِفٌ كَذَّابٌ
और फिरऔन के लोगों में एक ईमानदार शख्स (हिज़कील) ने जो अपने ईमान को छिपाए रहता था (लोगों से कहा) कि क्या तुम लोग ऐसे शख्स के क़त्ल के दरपै हो जो (सिर्फ) ये कहता है कि मेरा परवरदिगार अल्लाह है) हालाँकि वह तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से तुम्हारे पास मौजिज़े लेकर आया और अगर (बिल ग़रज़) ये शख्स झूठा है तो इसके झूठ का बवाल इसी पर पड़ेगा और अगर यह कहीं सच्चा हुआ तो जिस (अज़ाब की) तुम्हें ये धमकी देता है उसमें से कुछ तो तुम लोगों पर ज़रूर वाकेए होकर रहेगा बेशक ख़ुदा उस शख्स की हिदायत नहीं करता जो हद से गुज़रने वाला (और) झूठा हो
29يَا قَوْمِ لَكُمُ الْمُلْكُ الْيَوْمَ ظَاهِرِينَ فِي الْأَرْضِ فَمَن يَنصُرُنَا مِن بَأْسِ اللَّهِ إِن جَاءَنَا ۚ قَالَ فِرْعَوْنُ مَا أُرِيكُمْ إِلَّا مَا أَرَىٰ وَمَا أَهْدِيكُمْ إِلَّا سَبِيلَ الرَّشَادِ
ऐ मेरी क़ौम आज तो (बेशक) तुम्हारी बादशाहत है (और) मुल्क में तुम्हारा ही बोल बाला है लेकिन (कल) अगर ख़ुदा का अज़ाब हम पर आ जाए तो हमारी कौन मदद करेगा फिरऔन ने कहा मैं तो वही बात समझाता हूँ जो मैं ख़़ुद समझता हूँ और वही राह दिखाता हूँ जिसमें भलाई है
30وَقَالَ الَّذِي آمَنَ يَا قَوْمِ إِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُم مِّثْلَ يَوْمِ الْأَحْزَابِ
तो जो शख्स (दर पर्दा) ईमान ला चुका था कहने लगा, भाईयों मुझे तो तुम्हारी निस्बत भी और उम्मतों की तरह रोज़ (बद) का अन्देशा है
31مِثْلَ دَأْبِ قَوْمِ نُوحٍ وَعَادٍ وَثَمُودَ وَالَّذِينَ مِن بَعْدِهِمْ ۚ وَمَا اللَّهُ يُرِيدُ ظُلْمًا لِّلْعِبَادِ
(कहीं तुम्हारा भी वही हाल न हो) जैसा कि नूह की क़ौम और आद समूद और उनके बाद वाले लोगों का हाल हुआ और ख़ुदा तो बन्दों पर ज़ुल्म करना चाहता ही नहीं
32وَيَا قَوْمِ إِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُمْ يَوْمَ التَّنَادِ
और ऐ हमारी क़ौम मुझे तो तुम्हारी निस्बत कयामत के दिन का अन्देशा है
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अनुवाद — ग़ाफिर 30

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Tuesday, August 18, 2026

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