ग़ाफिर · 54/85
अनुवाद उच्चारण — ग़ाफिर
هُدًى وَذِكْرَىٰ لِأُولِي الْأَلْبَابِ ۝٥٤
Hudanw wa zikraa li ulil albaab
📖 हिंदी अर्थ
जो अक्लमन्दों के लिए (सरतापा) हिदायत व नसीहत है
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • हुदन (هُدًى): मार्गदर्शन, सत्य की ओर ले जाने वाला।
  • ज़िक्रा (ذِكْرَىٰ): नसीहत, याद दिलाना, चेतावनी।
  • उलिल-अल्बाब (أُولِي الْأَلْبَابِ): बुद्धिमान लोग, सही अक़्ल वाले, समझदार।

तफ़सीर:

यह आयत पिछली आयतों से जुड़ी हुई है, जिसमें अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) का ज़िक्र किया है कि उन्हें तौरात दी गई और बनी इसराईल को वह किताब विरासत में मिली। अब इस आयत में अल्लाह फ़रमाता है कि यह किताब (तौरात) हिदायत और नसीहत है उन लोगों के लिए जो अक़्ल रखते हैं।

यानी यह किताब सिर्फ़ एक इतिहास नहीं है, बल्कि उसमें वो रौशनी और हिदायत है जो इंसान को अंधेरों से निकालकर सीधे रास्ते पर लाती है। और यह सिर्फ़ उन्हीं लोगों को फ़ायदा देती है जो अपनी अक़्ल को इस्तेमाल करते हैं, जो सोचते-समझते हैं, और जो अपने दिल के कानों से सुनते हैं।

जो लोग अक़्ल से काम नहीं लेते, जो हठधर्मी और अंधी पैरवी पर अड़े रहते हैं, उनके लिए यह किताब कोई फ़ायदा नहीं देती। क्योंकि हिदायत का असर उसी दिल पर होता है जो खुला हो, और नसीहत उसी को समझ आती है जो सच्चाई की तलाश में हो।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की हर किताब और हर पैग़म्बर का पैग़ाम असल में हमारी भलाई के लिए है। अल्लाह ने कभी किसी को बिना रहनुमाई के नहीं छोड़ा। हर ज़माने में उसने हिदायत का ज़रिया भेजा। आज हमारे पास कुरआन है, जो आख़िरी और मुकम्मल किताब है।

अगर हम सच में अक़्ल रखते हैं, तो हमें कुरआन को पढ़ना चाहिए, समझना चाहिए और उस पर अमल करना चाहिए। क्योंकि कुरआन ही वो किताब है जो हमें दुनिया और आख़िरत की कामयाबी तक पहुँचाती है। यह हमारे लिए रहमत, शिफ़ा और नूर है।

अल्लाह तआला हम सबको उन लोगों में शामिल करे जो अक़्ल रखते हैं, जो हिदायत को क़बूल करते हैं और जो नसीहत से सबक़ लेते हैं। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 52-56 — ग़ाफिर

52يَوْمَ لَا يَنفَعُ الظَّالِمِينَ مَعْذِرَتُهُمْ ۖ وَلَهُمُ اللَّعْنَةُ وَلَهُمْ سُوءُ الدَّارِ
(उस दिन भी) जिस दिन ज़ालिमों को उनकी माज़ेरत कुछ भी फायदे न देगी और उन पर फिटकार (बरसती) होगी और उनके लिए बहुत बुरा घर (जहन्नुम) है
53وَلَقَدْ آتَيْنَا مُوسَى الْهُدَىٰ وَأَوْرَثْنَا بَنِي إِسْرَائِيلَ الْكِتَابَ
और हम ही ने मूसा को हिदायत (की किताब तौरेत) दी और बनी इसराईल को (उस) किताब का वारिस बनाया
54هُدًى وَذِكْرَىٰ لِأُولِي الْأَلْبَابِ
जो अक्लमन्दों के लिए (सरतापा) हिदायत व नसीहत है
55فَاصْبِرْ إِنَّ وَعْدَ اللَّهِ حَقٌّ وَاسْتَغْفِرْ لِذَنبِكَ وَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ بِالْعَشِيِّ وَالْإِبْكَارِ
(ऐ रसूल) तुम (उनकी शरारत) पर सब्र करो बेशक ख़ुदा का वायदा सच्चा है, और अपने (उम्मत की) गुनाहों की माफी माँगो और सुबह व शाम अपने परवरदिगार की हम्द व सना के साथ तसबीह करते रहो
56إِنَّ الَّذِينَ يُجَادِلُونَ فِي آيَاتِ اللَّهِ بِغَيْرِ سُلْطَانٍ أَتَاهُمْ ۙ إِن فِي صُدُورِهِمْ إِلَّا كِبْرٌ مَّا هُم بِبَالِغِيهِ ۚ فَاسْتَعِذْ بِاللَّهِ ۖ إِنَّهُ هُوَ السَّمِيعُ الْبَصِيرُ
जिन लोगों के पास (ख़ुदा की तरफ से) कोई दलील तो आयी नहीं और (फिर) वह ख़ुदा की आयतों में (ख्वाह मा ख्वाह) झगड़े निकालते हैं, उनके दिल में बुराई (की बेजां हवस) के सिवा कुछ नहीं हालाँकि वह लोग उस तक कभी पहुँचने वाले नहीं तो तुम बस ख़ुदा की पनाह माँगते रहो बेशक वह बड़ा सुनने वाला (और) देखने वाला है
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अनुवाद — ग़ाफिर 54

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Tuesday, August 18, 2026

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