फुस्सिलत · 27/54
अनुवाद उच्चारण — फुस्सिलत
فَلَنُذِيقَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا عَذَابًا شَدِيدًا وَلَنَجْزِيَنَّهُمْ أَسْوَأَ الَّذِي كَانُوا يَعْمَلُونَ ۝٢٧
Falanuzeeqannal lazeena kafaroo `azaaban shadeedanw wa lanajziyannahum aswallazee kaanoo ya`maloon
📖 हिंदी अर्थ
तो हम भी काफ़िरों को सख्त अज़ाब के मज़े चखाएँगे और इनकी कारस्तानियों की बहुत बड़ी सज़ा ये दोज़ख़ है
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَلَنُذِيقَنَّ: हम अवश्य चखाएँगे (अर्थात् अवश्य अनुभव कराएँगे)
  • عَذَابًا شَدِيدًا: अत्यंत कठोर/भीषण यातना
  • وَلَنَجْزِيَنَّهُمْ: और हम अवश्य उन्हें बदला देंगे
  • أَسْوَأَ الَّذِي كَانُوا يَعْمَلُونَ: उनके किए हुए सबसे बुरे कर्मों के अनुसार (सबसे बुरा बदला)

विस्तृत तफ़सीर:

अल्लाह तआला इस आयत में उन लोगों के लिए अपनी ओर से सख्त चेतावनी दे रहा है जिन्होंने कुफ्र (इनकार) का रास्ता अपनाया और अल्लाह के रसूलों को झुठलाया। यह वही लोग हैं जिन्होंने क़ुरआन को सुनकर उसका मज़ाक उड़ाया और उसे खारिज कर दिया। अल्लाह फ़रमाता है कि हम अवश्य उन्हें एक ऐसा भीषण अज़ाब (यातना) चखाएँगे जिसकी कल्पना भी वे नहीं कर सकते। यह अज़ाब दुनिया में भी उन्हें मिलेगा—जैसे बद्र के युद्ध में मुशरिकों को मिला—और आख़िरत में तो उनके लिए जहन्नुम की आग है, जो सबसे बड़ा अज़ाब है।

फिर अल्लाह फ़रमाता है: "हम उन्हें उनके सबसे बुरे कर्मों का बदला देंगे।" यानी जो सबसे ज़्यादा गंभीर और बुरे कर्म उन्होंने किए—जैसे शिर्क (अल्लाह के साथ साझीदार बनाना), अल्लाह की आयतों को झुठलाना, रसूलों का मज़ाक उड़ाना, और लोगों को सच्चे रास्ते से रोकना—उन्हीं के अनुसार उन्हें सबसे बुरा बदला दिया जाएगा। यह अल्लाह का पूरा न्याय है कि जैसा कर्म, वैसा ही बदला।

यह आयत हर उस इंसान के लिए एक गंभीर पैग़ाम है जो अल्लाह के दीन से मुँह मोड़ता है। अल्लाह की पकड़ बहुत सख्त है, और उसका इन्साफ़ कभी चूकता नहीं। लेकिन साथ ही यह भी याद रखिए कि अल्लाह रहमत वाला भी है—जो कोई अपनी ग़लतियों से तौबा कर ले, अल्लाह उसे माफ़ कर देता है। यह आयत हमें सिखाती है कि हम अपने कर्मों की ज़िम्मेदारी लें, और अल्लाह के सामने झुककर उसकी रहमत के भूखे बनें, क्योंकि उसकी रहमत उसके अज़ाब से कहीं बढ़कर है। जो लोग इस दुनिया में अल्लाह के आगे सर झुकाते हैं, उनके लिए आख़िरत में ऐसी जन्नतें हैं जिनकी कोई आँख ने देखा नहीं, कान ने सुना नहीं, और किसी दिल ने कल्पना भी नहीं की।

🎧 सुनें

📜 आयत 25-29 — फुस्सिलत

25۞ وَقَيَّضْنَا لَهُمْ قُرَنَاءَ فَزَيَّنُوا لَهُم مَّا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَحَقَّ عَلَيْهِمُ الْقَوْلُ فِي أُمَمٍ قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلِهِم مِّنَ الْجِنِّ وَالْإِنسِ ۖ إِنَّهُمْ كَانُوا خَاسِرِينَ
और हमने (गोया ख़ुद शैतान को) उनका हमनशीन मुक़र्रर कर दिया था तो उन्होने उनके अगले पिछले तमाम उमूर उनकी नज़रों में भले कर दिखाए तो जिन्नात और इन्सानो की उम्मतें जो उनसे पहले गुज़र चुकी थीं उनके शुमूल (साथ) में (अज़ाब का) वायदा उनके हक़ में भी पूरा हो कर रहा बेशक ये लोग अपने घाटे के दरपै थे
26وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لَا تَسْمَعُوا لِهَٰذَا الْقُرْآنِ وَالْغَوْا فِيهِ لَعَلَّكُمْ تَغْلِبُونَ
और कुफ्फ़ार कहने लगे कि इस क़ुरान को सुनो ही नहीं और जब पढ़ें (तो) इसके (बीच) में ग़ुल मचा दिया करो ताकि (इस तरकीब से) तुम ग़ालिब आ जाओ
27فَلَنُذِيقَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا عَذَابًا شَدِيدًا وَلَنَجْزِيَنَّهُمْ أَسْوَأَ الَّذِي كَانُوا يَعْمَلُونَ
तो हम भी काफ़िरों को सख्त अज़ाब के मज़े चखाएँगे और इनकी कारस्तानियों की बहुत बड़ी सज़ा ये दोज़ख़ है
28ذَٰلِكَ جَزَاءُ أَعْدَاءِ اللَّهِ النَّارُ ۖ لَهُمْ فِيهَا دَارُ الْخُلْدِ ۖ جَزَاءً بِمَا كَانُوا بِآيَاتِنَا يَجْحَدُونَ
ख़ुदा के दुशमनों का बदला है कि वह जो हमरी आयतों से इन्कार करते थे उसकी सज़ा में उनके लिए उसमें हमेशा (रहने) का घर है,
29وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا رَبَّنَا أَرِنَا اللَّذَيْنِ أَضَلَّانَا مِنَ الْجِنِّ وَالْإِنسِ نَجْعَلْهُمَا تَحْتَ أَقْدَامِنَا لِيَكُونَا مِنَ الْأَسْفَلِينَ
और (क़यामत के दिन) कुफ्फ़ार कहेंगे कि ऐ हमारे परवरदिगार जिनों और इन्सानों में से जिन लोगों ने हमको गुमराह किया था (एक नज़र) उनको हमें दिखा दे कि हम उनको पाँव तले (रौन्द) डालें ताकि वह ख़ूब ज़लील हों
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अनुवाद — फुस्सिलत 27

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Tuesday, August 18, 2026

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