फुस्सिलत · 26/54
अनुवाद उच्चारण — सूरा फुस्सिलत
وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لَا تَسْمَعُوا لِهَٰذَا الْقُرْآنِ وَالْغَوْا فِيهِ لَعَلَّكُمْ تَغْلِبُونَ ۝٢٦
Wa qaalal lazeena kafaroo laa tasma`oo lihaazal Quraani walghaw feehi la`allakum taghlihoon
📖 हिंदी अर्थ
और कुफ्फ़ार कहने लगे कि इस क़ुरान को सुनो ही नहीं और जब पढ़ें (तो) इसके (बीच) में ग़ुल मचा दिया करो ताकि (इस तरकीब से) तुम ग़ालिब आ जाओ

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَا تَسْمَعُوا – सुनो मत, कान न दो
  • وَالْغَوْا – शोर मचाओ, चिल्लाओ, बकवास बोलो (यानी कुरान की तिलावत के दौरान ऊँची आवाज़ में बेतुकी बातें करो ताकि उसकी आवाज़ दब जाए)
  • لَعَلَّكُمْ تَغْلِبُونَ – ताकि तुम ग़ालिब आ जाओ, कामयाब हो जाओ

तफसीर (व्याख्या):

जब अल्लाह के रसूल ﷺ कुरान की तिलावत करते और लोगों को उसकी ओर बुलाते, तो काफ़िरों को कोई जवाब नहीं सूझता था। वे सच्चाई के सामने बेबस थे, क्योंकि कुरान की दलीलें इतनी मज़बूत थीं कि उनके पास कोई तर्क नहीं था। इसलिए उन्होंने आपस में साज़िश रची और एक-दूसरे को नसीहत दी कि "इस कुरान को हरगिज़ न सुनो, और जब मुहम्मद ﷺ इसे पढ़ें तो ज़ोर-ज़ोर से शोर मचाओ, चिल्लाओ, तालियाँ बजाओ, बेतुकी बातें करो, कविताएँ पढ़ो — ताकि लोगों का ध्यान भटक जाए और उनके कानों तक कुरान की आवाज़ न पहुँचे।" उनका ख़याल था कि इस तरह वे रसूल ﷺ को हरा देंगे और उनकी दावत को बेअसर कर देंगे।

यह उनकी नादानी और सच्चाई से भागने की कोशिश थी। वे यह भूल गए कि अल्लाह का कलाम (कुरान) कोई इंसानी बात नहीं है जो शोर से दब जाए। कुरान तो दिलों पर राज करता है, और अल्लाह की हिफ़ाज़त में है। जितना वे शोर मचाते, कुरान की सच्चाई उतनी ही रोशन होती जाती। आज भी दुनिया भर में लाखों लोग कुरान सुनकर हिदायत पाते हैं, और उन काफ़िरों की साज़िशें इतिहास के पन्नों में दफ़न हो चुकी हैं।

इस आयत से हमें सीख मिलती है कि सच्चाई को दबाने की कोशिश करने वाले चाहे कितनी भी तरकीबें अपनाएँ, अल्लाह का दीन हमेशा बुलंद रहता है। और हम मुसलमानों को चाहिए कि कुरान को पूरे ध्यान और अदब से सुनें, क्योंकि यही हमारी कामयाबी की कुंजी है। जो लोग कुरान से मुँह मोड़ते हैं, वे असल में अपने ही नुक़सान का सामान करते हैं। अल्लाह हमें कुरान को समझने, सुनने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 24-28 — सूरा फुस्सिलत

24فَإِن يَصْبِرُوا فَالنَّارُ مَثْوًى لَّهُمْ ۖ وَإِن يَسْتَعْتِبُوا فَمَا هُم مِّنَ الْمُعْتَبِينَ
फिर अगर ये लोग सब्र भी करें तो भी इनका ठिकाना दोज़ख़ ही है और अगर तौबा करें तो भी इनकी तौबा क़ुबूल न की जाएगी
25۞ وَقَيَّضْنَا لَهُمْ قُرَنَاءَ فَزَيَّنُوا لَهُم مَّا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَحَقَّ عَلَيْهِمُ الْقَوْلُ فِي أُمَمٍ قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلِهِم مِّنَ الْجِنِّ وَالْإِنسِ ۖ إِنَّهُمْ كَانُوا خَاسِرِينَ
और हमने (गोया ख़ुद शैतान को) उनका हमनशीन मुक़र्रर कर दिया था तो उन्होने उनके अगले पिछले तमाम उमूर उनकी नज़रों में भले कर दिखाए तो जिन्नात और इन्सानो की उम्मतें जो उनसे पहले गुज़र चुकी थीं उनके शुमूल (साथ) में (अज़ाब का) वायदा उनके हक़ में भी पूरा हो कर रहा बेशक ये लोग अपने घाटे के दरपै थे
26وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لَا تَسْمَعُوا لِهَٰذَا الْقُرْآنِ وَالْغَوْا فِيهِ لَعَلَّكُمْ تَغْلِبُونَ
और कुफ्फ़ार कहने लगे कि इस क़ुरान को सुनो ही नहीं और जब पढ़ें (तो) इसके (बीच) में ग़ुल मचा दिया करो ताकि (इस तरकीब से) तुम ग़ालिब आ जाओ
27فَلَنُذِيقَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا عَذَابًا شَدِيدًا وَلَنَجْزِيَنَّهُمْ أَسْوَأَ الَّذِي كَانُوا يَعْمَلُونَ
तो हम भी काफ़िरों को सख्त अज़ाब के मज़े चखाएँगे और इनकी कारस्तानियों की बहुत बड़ी सज़ा ये दोज़ख़ है
28ذَٰلِكَ جَزَاءُ أَعْدَاءِ اللَّهِ النَّارُ ۖ لَهُمْ فِيهَا دَارُ الْخُلْدِ ۖ جَزَاءً بِمَا كَانُوا بِآيَاتِنَا يَجْحَدُونَ
ख़ुदा के दुशमनों का बदला है कि वह जो हमरी आयतों से इन्कार करते थे उसकी सज़ा में उनके लिए उसमें हमेशा (रहने) का घर है,
फुस्सिलतकुरान सूची
54आयत
मक्कीअवतरण स्थान
26आयत

अनुवाद — फुस्सिलत 26

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Monday, September 28, 2026

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