फुस्सिलत · 49/54
अनुवाद उच्चारण — सूरा फुस्सिलत
لَّا يَسْأَمُ الْإِنسَانُ مِن دُعَاءِ الْخَيْرِ وَإِن مَّسَّهُ الشَّرُّ فَيَئُوسٌ قَنُوطٌ ۝٤٩
Laa yas`amul insaanu min du`aaa`il khairi wa im massa hush sharru fa ya`oosun qanoot
📖 हिंदी अर्थ
इन्सान भलाई की दुआए मांगने से तो कभी उकताता नहीं और अगर उसको कोई तकलीफ पहुँच जाए तो (फौरन) न उम्मीद और बेआस हो जाता है

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَا يَسْأَمُ: नहीं ऊबता, नहीं थकता।
  • دُعَاءِ الْخَيْرِ: भलाई की प्रार्थना, यानी धन, स्वास्थ्य, संतान आदि की माँग।
  • مَسَّهُ الشَّرُّ: उसे कोई कष्ट, गरीबी, बीमारी या तंगी छू जाए।
  • فَيَئُوسٌ: तो वह अत्यधिक निराश हो जाता है।
  • قَنُوطٌ: रहमत से मायूस होकर भलाई की उम्मीद छोड़ देने वाला।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत इंसान की कमज़ोरी और उसकी हालत को बयान करती है। इंसान अपने रब से भलाई माँगते हुए कभी नहीं थकता—चाहे वह धन हो, सेहत हो, औलाद हो या दुनिया की कोई और नेमत। वह लगातार माँगता रहता है, और यह उसकी फ़ितरत है कि वह ख़ैर की तरफ़ बढ़ता रहे। लेकिन जब उसे कोई मुसीबत या तकलीफ़ पहुँचती है—जैसे गरीबी, बीमारी, या कोई दुख—तो वह अल्लाह की रहमत से निराश हो जाता है और उम्मीद खो बैठता है। वह यह भूल जाता है कि जिस अल्लाह ने उसे नेमतें दीं, वही मुसीबत को भी दूर कर सकता है।

यह आयत इंसान की दो कमज़ोरियों को उजागर करती है: एक तरफ वह नेमतों के लिए हमेशा अल्लाह से माँगता रहता है, और दूसरी तरफ मुसीबत आते ही वह अल्लाह की रहमत से मायूस हो जाता है। यह उसके ईमान की कमज़ोरी और अल्लाह पर भरोसे की कमी को दर्शाता है।

दावती पहलू:

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें सिखाती है कि हमें हर हाल में अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए। जब हमारे पास नेमतें हों तो हमें शुक्र करना चाहिए, और जब मुसीबत आए तो हमें सब्र करना चाहिए और अल्लाह की रहमत से उम्मीद नहीं खोनी चाहिए। अल्लाह की रहमत असीम है, और वह हर मुसीबत को दूर करने की ताकत रखता है। निराशा और मायूसी शैतान का हथियार है, जो इंसान को अल्लाह से दूर करता है। हमें चाहिए कि हम हर हाल में अल्लाह से जुड़े रहें, उसी से माँगें, और उसी की रहमत से उम्मीद रखें। याद रखिए, अल्लाह के करीब रहने वाला कभी निराश नहीं होता, क्योंकि उसे यकीन होता है कि अल्लाह की रहमत हर चीज़ से बड़ी है।



📜 आयत 47-51 — सूरा फुस्सिलत

47۞ إِلَيْهِ يُرَدُّ عِلْمُ السَّاعَةِ ۚ وَمَا تَخْرُجُ مِن ثَمَرَاتٍ مِّنْ أَكْمَامِهَا وَمَا تَحْمِلُ مِنْ أُنثَىٰ وَلَا تَضَعُ إِلَّا بِعِلْمِهِ ۚ وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ أَيْنَ شُرَكَائِي قَالُوا آذَنَّاكَ مَا مِنَّا مِن شَهِيدٍ
क़यामत के इल्म का हवाला उसी की तरफ है (यानि वही जानता है) और बगैर उसके इल्म व (इरादे) के न तो फल अपने पौरों से निकलते हैं और न किसी औरत को हमल रखता है और न वह बच्चा जनती है और जिस दिन (ख़ुदा) उन (मुशरेकीन) को पुकारेगा और पूछेगा कि मेरे शरीक कहाँ हैं- वह कहेंगे हम तो तुझ से अर्ज़ कर चूके हैं कि हम में से कोई (उनसे) वाकिफ़ ही नहीं
48وَضَلَّ عَنْهُم مَّا كَانُوا يَدْعُونَ مِن قَبْلُ ۖ وَظَنُّوا مَا لَهُم مِّن مَّحِيصٍ
और इससे पहले जिन माबूदों की परसतिश करते थे वह ग़ायब हो गये और ये लोग समझ जाएगें कि उनके लिए अब मुख़लिसी नहीं
49لَّا يَسْأَمُ الْإِنسَانُ مِن دُعَاءِ الْخَيْرِ وَإِن مَّسَّهُ الشَّرُّ فَيَئُوسٌ قَنُوطٌ
इन्सान भलाई की दुआए मांगने से तो कभी उकताता नहीं और अगर उसको कोई तकलीफ पहुँच जाए तो (फौरन) न उम्मीद और बेआस हो जाता है
50وَلَئِنْ أَذَقْنَاهُ رَحْمَةً مِّنَّا مِن بَعْدِ ضَرَّاءَ مَسَّتْهُ لَيَقُولَنَّ هَٰذَا لِي وَمَا أَظُنُّ السَّاعَةَ قَائِمَةً وَلَئِن رُّجِعْتُ إِلَىٰ رَبِّي إِنَّ لِي عِندَهُ لَلْحُسْنَىٰ ۚ فَلَنُنَبِّئَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا بِمَا عَمِلُوا وَلَنُذِيقَنَّهُم مِّنْ عَذَابٍ غَلِيظٍ
और अगर उसको कोई तकलीफ पहुँच जाने के बाद हम उसको अपनी रहमत का मज़ा चखाएँ तो यक़ीनी कहने लगता है कि ये तो मेरे लिए ही है और मैं नहीं ख़याल करता कि कभी क़यामत बरपा होगी और अगर (क़यामत हो भी और) मैं अपने परवरदिगार की तरफ़ लौटाया भी जाऊँ तो भी मेरे लिए यक़ीनन उसके यहाँ भलाई ही तो है जो आमाल करते रहे हम उनको (क़यामत में) ज़रूर बता देंगें और उनको सख्त अज़ाब का मज़ा चख़ाएगें
51وَإِذَا أَنْعَمْنَا عَلَى الْإِنسَانِ أَعْرَضَ وَنَأَىٰ بِجَانِبِهِ وَإِذَا مَسَّهُ الشَّرُّ فَذُو دُعَاءٍ عَرِيضٍ
(वह अलग) और जब हम इन्सान पर एहसान करते हैं तो (हमारी तरफ से) मुँह फेर लेता है और मुँह बदलकर चल देता है और जब उसे तकलीफ़ पहुँचती है तो लम्बी चौड़ी दुआएँ करने लगता है
फुस्सिलतकुरान सूची
54आयत
मक्कीअवतरण स्थान
49आयत

अनुवाद — फुस्सिलत 49

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Monday, September 28, 2026

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