फुस्सिलत · 50/54
अनुवाद उच्चारण — फुस्सिलत
وَلَئِنْ أَذَقْنَاهُ رَحْمَةً مِّنَّا مِن بَعْدِ ضَرَّاءَ مَسَّتْهُ لَيَقُولَنَّ هَٰذَا لِي وَمَا أَظُنُّ السَّاعَةَ قَائِمَةً وَلَئِن رُّجِعْتُ إِلَىٰ رَبِّي إِنَّ لِي عِندَهُ لَلْحُسْنَىٰ ۚ فَلَنُنَبِّئَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا بِمَا عَمِلُوا وَلَنُذِيقَنَّهُم مِّنْ عَذَابٍ غَلِيظٍ ۝٥٠
Wa la in azaqnaahu rahmatam minnaa mim ba`di dar raaa`a massat hu la yaqoolanna haazaa lee wa maaa azunnus Saa`ata qaaa`imatanw wa la`in ruji`tu ilaa Rabbeee inna lee `indahoo lalhusnaa; falanu nabbi`annal lazeena kafaroo bimaa `amiloo wa lanuzeeqan nahum min `azaabin ghaleez
📖 हिंदी अर्थ
और अगर उसको कोई तकलीफ पहुँच जाने के बाद हम उसको अपनी रहमत का मज़ा चखाएँ तो यक़ीनी कहने लगता है कि ये तो मेरे लिए ही है और मैं नहीं ख़याल करता कि कभी क़यामत बरपा होगी और अगर (क़यामत हो भी और) मैं अपने परवरदिगार की तरफ़ लौटाया भी जाऊँ तो भी मेरे लिए यक़ीनन उसके यहाँ भलाई ही तो है जो आमाल करते रहे हम उनको (क़यामत में) ज़रूर बता देंगें और उनको सख्त अज़ाब का मज़ा चख़ाएगें

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَذَقْنَاهُ رَحْمَةً: हमने उसे सुख-समृद्धि और आराम का स्वाद चखाया।
  • ضَرَّاءَ: कष्ट, बीमारी, तंगी और मुसीबत।
  • هَذَا لِي: यह सब मेरा हक़ है, मैं इसका हक़दार हूँ।
  • السَّاعَةَ: क़ियामत।
  • لَلْحُسْنَى: बेहतरीन अंजाम, यानी जन्नत।
  • عَذَابٍ غَلِيظٍ: सख्त और दर्दनाक अज़ाब।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत इंसान की उस कमज़ोर और नाशुक्री फ़ितरत की तरफ़ इशारा करती है जब वह मुसीबत में होता है तो अल्लाह से दुआएँ माँगता है, लेकिन जैसे ही अल्लाह उस पर अपनी रहमत से सुख-समृद्धि, सेहत और खुशहाली का दरवाज़ा खोलता है, वह सब कुछ भूल जाता है और घमंड में आकर कहता है: "यह सब मेरी काबिलियत और मेरे हक़ की वजह से मुझे मिला है।" वह यह नहीं सोचता कि यह अल्लाह की तरफ़ से एक इम्तिहान है और उस पर शुक्र अदा करना चाहिए।

इसके अलावा वह क़ियामत के आने का भी इनकार करता है और कहता है: "मुझे नहीं लगता कि क़ियामत कभी आएगी।" और अगर मान लिया जाए कि क़ियामत आएगी और मैं अपने रब की तरफ़ लौटाया जाऊँगा, तो भी मेरे लिए वहाँ जन्नत और अच्छा अंजाम ही होगा, क्योंकि मैं तो इतना अच्छा इंसान हूँ। यह सब वह अल्लाह की रहमत का मज़ाक उड़ाते हुए और अपने घमंड में चूर होकर कहता है।

अल्लाह तआला फ़रमाता है कि ऐसे काफ़िरों को हम क़ियामत के दिन उनके सारे कर्म बता देंगे, जो उन्होंने दुनिया में किए थे, चाहे वे छोटे हों या बड़े। और हम उन्हें सख्त से सख्त अज़ाब का मज़ा चखाएँगे, जो उनके कुफ़्र और गुनाहों की सज़ा होगी।


दावती पहलू (नसीहत):

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें सिखाती है कि हमें हर हाल में अल्लाह का शुक्रगुज़ार बनना चाहिए। जब अल्लाह हमें नेअमतें देता है, तो हमें घमंड नहीं करना चाहिए, बल्कि यह समझना चाहिए कि यह अल्लाह की मेहरबानी है। हमें क़ियामत पर पूरा यक़ीन रखना चाहिए और अपने अमलों को सुधारना चाहिए। याद रखिए, अल्लाह की रहमत उन्हीं को मिलती है जो उसके शुक्रगुज़ार होते हैं, और उसका अज़ाब उन्हीं के लिए है जो उसकी नेअमतों को भूलकर सिर्फ़ अपने आप पर भरोसा करते हैं। आइए, हम अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की राह पर चलाएँ और उसकी रहमत के हक़दार बनें।



📜 आयत 48-52 — फुस्सिलत

48وَضَلَّ عَنْهُم مَّا كَانُوا يَدْعُونَ مِن قَبْلُ ۖ وَظَنُّوا مَا لَهُم مِّن مَّحِيصٍ
और इससे पहले जिन माबूदों की परसतिश करते थे वह ग़ायब हो गये और ये लोग समझ जाएगें कि उनके लिए अब मुख़लिसी नहीं
49لَّا يَسْأَمُ الْإِنسَانُ مِن دُعَاءِ الْخَيْرِ وَإِن مَّسَّهُ الشَّرُّ فَيَئُوسٌ قَنُوطٌ
इन्सान भलाई की दुआए मांगने से तो कभी उकताता नहीं और अगर उसको कोई तकलीफ पहुँच जाए तो (फौरन) न उम्मीद और बेआस हो जाता है
50وَلَئِنْ أَذَقْنَاهُ رَحْمَةً مِّنَّا مِن بَعْدِ ضَرَّاءَ مَسَّتْهُ لَيَقُولَنَّ هَٰذَا لِي وَمَا أَظُنُّ السَّاعَةَ قَائِمَةً وَلَئِن رُّجِعْتُ إِلَىٰ رَبِّي إِنَّ لِي عِندَهُ لَلْحُسْنَىٰ ۚ فَلَنُنَبِّئَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا بِمَا عَمِلُوا وَلَنُذِيقَنَّهُم مِّنْ عَذَابٍ غَلِيظٍ
और अगर उसको कोई तकलीफ पहुँच जाने के बाद हम उसको अपनी रहमत का मज़ा चखाएँ तो यक़ीनी कहने लगता है कि ये तो मेरे लिए ही है और मैं नहीं ख़याल करता कि कभी क़यामत बरपा होगी और अगर (क़यामत हो भी और) मैं अपने परवरदिगार की तरफ़ लौटाया भी जाऊँ तो भी मेरे लिए यक़ीनन उसके यहाँ भलाई ही तो है जो आमाल करते रहे हम उनको (क़यामत में) ज़रूर बता देंगें और उनको सख्त अज़ाब का मज़ा चख़ाएगें
51وَإِذَا أَنْعَمْنَا عَلَى الْإِنسَانِ أَعْرَضَ وَنَأَىٰ بِجَانِبِهِ وَإِذَا مَسَّهُ الشَّرُّ فَذُو دُعَاءٍ عَرِيضٍ
(वह अलग) और जब हम इन्सान पर एहसान करते हैं तो (हमारी तरफ से) मुँह फेर लेता है और मुँह बदलकर चल देता है और जब उसे तकलीफ़ पहुँचती है तो लम्बी चौड़ी दुआएँ करने लगता है
52قُلْ أَرَأَيْتُمْ إِن كَانَ مِنْ عِندِ اللَّهِ ثُمَّ كَفَرْتُم بِهِ مَنْ أَضَلُّ مِمَّنْ هُوَ فِي شِقَاقٍ بَعِيدٍ
(ऐ रसूल) तुम कहो कि भला देखो तो सही कि अगर ये (क़ुरान) ख़ुदा की बारगाह से (आया) हो और फिर तुम उससे इन्कार करो तो जो (ऐसे) परले दर्जे की मुख़ालेफत में (पड़ा) हो उससे बढ़कर और कौन गुमराह हो सकता है
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अनुवाद — फुस्सिलत 50

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Tuesday, August 18, 2026

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