फुस्सिलत · 48/54
अनुवाद उच्चारण — सूरा फुस्सिलत
وَضَلَّ عَنْهُم مَّا كَانُوا يَدْعُونَ مِن قَبْلُ ۖ وَظَنُّوا مَا لَهُم مِّن مَّحِيصٍ ۝٤٨
Wa dalla `anhum maa kaanoo yad`oona min qablu wa zannoo maa lahum mim mahees
📖 हिंदी अर्थ
और इससे पहले जिन माबूदों की परसतिश करते थे वह ग़ायब हो गये और ये लोग समझ जाएगें कि उनके लिए अब मुख़लिसी नहीं

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • ضَلَّ – ग़ायब हो जाना, खो जाना
  • يَدْعُونَ – जिन्हें वे पुकारते थे (अर्थात पूजते थे)
  • مَحِيص – बचने की जगह, भागने का रास्ता, छुटकारा

तफ़सीर:

यह आयत उस भयानक दृश्य का वर्णन करती है जो क़ियामत के दिन मुशरिकों (बहुदेववादियों) के सामने आएगा। जब वे अपने उन माबूदों (उपास्यों) को पुकारेंगे जिन्हें उन्होंने दुनिया में अल्लाह के सिवा पूजा था – चाहे वे मूर्तियाँ हों, या कोई और चीज़ें जिन्हें उन्होंने ख़ुदा का शरीक बनाया था – तो वे सब उनसे ग़ायब हो जाएँगी। कोई मददगार नहीं होगा, कोई सिफ़ारिश करने वाला नहीं होगा, और न ही वे माबूद उनके किसी काम आएँगे।

यह वह समय होगा जब उन्हें पूरा यक़ीन हो जाएगा कि अल्लाह के अज़ाब से बचने का कोई रास्ता नहीं है, कोई पनाहगाह नहीं है, और न ही कोई छिपने की जगह है। दुनिया में उन्होंने सोचा था कि ये मूर्तियाँ और झूठे माबूद उन्हें मुसीबतों से बचाएँगे, लेकिन उस दिन उनका सारा भरम टूट जाएगा और वे समझ जाएँगे कि उनका कोई भी सहारा काम नहीं आएगा।

यह आयत हमारे लिए एक बहुत बड़ी नसीहत है। यह हमें सिखाती है कि हमें अपनी उम्मीदें और भरोसा सिर्फ़ अल्लाह पर रखना चाहिए। जो लोग अल्लाह के सिवा किसी और पर भरोसा करते हैं, वे उस दिन बुरी तरह निराश होंगे। लेकिन जो लोग दुनिया में अल्लाह की इबादत करते हैं और उसी से मदद माँगते हैं, उनके लिए उस दिन ख़ुशख़बरी है – अल्लाह उन्हें कभी निराश नहीं करेगा।

इस आयत से हमें यह भी सबक़ मिलता है कि हमें अपनी ज़िंदगी में किसी को अल्लाह का शरीक नहीं बनाना चाहिए। चाहे वह इंसान हो, पैसा हो, शोहरत हो या कोई और चीज़ – अगर हम किसी चीज़ को अल्लाह की जगह या अल्लाह के साथ पूजते हैं, तो वह हमें उस दिन किसी काम नहीं आएगी। अल्लाह ही अकेला है जो हमें बचा सकता है, और उसी की राह पर चलना ही हमारी सबसे बड़ी कामयाबी है।



📜 आयत 46-50 — सूरा फुस्सिलत

46مَّنْ عَمِلَ صَالِحًا فَلِنَفْسِهِ ۖ وَمَنْ أَسَاءَ فَعَلَيْهَا ۗ وَمَا رَبُّكَ بِظَلَّامٍ لِّلْعَبِيدِ
जिसने अच्छे अच्छे काम किये तो अपने नफे क़े लिए और जो बुरा काम करे उसका वबाल भी उसी पर है और तुम्हारा परवरदिगार तो बन्दों पर (कभी) ज़ुल्म करने वाला नहीं
47۞ إِلَيْهِ يُرَدُّ عِلْمُ السَّاعَةِ ۚ وَمَا تَخْرُجُ مِن ثَمَرَاتٍ مِّنْ أَكْمَامِهَا وَمَا تَحْمِلُ مِنْ أُنثَىٰ وَلَا تَضَعُ إِلَّا بِعِلْمِهِ ۚ وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ أَيْنَ شُرَكَائِي قَالُوا آذَنَّاكَ مَا مِنَّا مِن شَهِيدٍ
क़यामत के इल्म का हवाला उसी की तरफ है (यानि वही जानता है) और बगैर उसके इल्म व (इरादे) के न तो फल अपने पौरों से निकलते हैं और न किसी औरत को हमल रखता है और न वह बच्चा जनती है और जिस दिन (ख़ुदा) उन (मुशरेकीन) को पुकारेगा और पूछेगा कि मेरे शरीक कहाँ हैं- वह कहेंगे हम तो तुझ से अर्ज़ कर चूके हैं कि हम में से कोई (उनसे) वाकिफ़ ही नहीं
48وَضَلَّ عَنْهُم مَّا كَانُوا يَدْعُونَ مِن قَبْلُ ۖ وَظَنُّوا مَا لَهُم مِّن مَّحِيصٍ
और इससे पहले जिन माबूदों की परसतिश करते थे वह ग़ायब हो गये और ये लोग समझ जाएगें कि उनके लिए अब मुख़लिसी नहीं
49لَّا يَسْأَمُ الْإِنسَانُ مِن دُعَاءِ الْخَيْرِ وَإِن مَّسَّهُ الشَّرُّ فَيَئُوسٌ قَنُوطٌ
इन्सान भलाई की दुआए मांगने से तो कभी उकताता नहीं और अगर उसको कोई तकलीफ पहुँच जाए तो (फौरन) न उम्मीद और बेआस हो जाता है
50وَلَئِنْ أَذَقْنَاهُ رَحْمَةً مِّنَّا مِن بَعْدِ ضَرَّاءَ مَسَّتْهُ لَيَقُولَنَّ هَٰذَا لِي وَمَا أَظُنُّ السَّاعَةَ قَائِمَةً وَلَئِن رُّجِعْتُ إِلَىٰ رَبِّي إِنَّ لِي عِندَهُ لَلْحُسْنَىٰ ۚ فَلَنُنَبِّئَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا بِمَا عَمِلُوا وَلَنُذِيقَنَّهُم مِّنْ عَذَابٍ غَلِيظٍ
और अगर उसको कोई तकलीफ पहुँच जाने के बाद हम उसको अपनी रहमत का मज़ा चखाएँ तो यक़ीनी कहने लगता है कि ये तो मेरे लिए ही है और मैं नहीं ख़याल करता कि कभी क़यामत बरपा होगी और अगर (क़यामत हो भी और) मैं अपने परवरदिगार की तरफ़ लौटाया भी जाऊँ तो भी मेरे लिए यक़ीनन उसके यहाँ भलाई ही तो है जो आमाल करते रहे हम उनको (क़यामत में) ज़रूर बता देंगें और उनको सख्त अज़ाब का मज़ा चख़ाएगें
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अनुवाद — फुस्सिलत 48

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Tuesday, September 29, 2026

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