अल-हुजुरात · 16/18
अनुवाद उच्चारण — अल-हुजुरात
قُلْ أَتُعَلِّمُونَ اللَّهَ بِدِينِكُمْ وَاللَّهُ يَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۚ وَاللَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ ۝١٦
Qul atu`allimoonal laaha bideenikum wallaahu ya`lamu maa fis samaawaati wa maa fil ard; wallaahu bikulli shai`in `Aleem
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल इनसे) पूछो तो कि क्या तुम ख़ुदा को अपनी दीदारी जताते हो और ख़ुदा तो जो कुछ आसमानों मे है और जो कुछ ज़मीन में है (ग़रज़ सब कुछ) जानता है और ख़ुदा हर चीज़ से ख़बरदार है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • أَتُعَلِّمُونَ — क्या तुम सिखाते/बताते हो?
  • بِدِينِكُمْ — अपने धर्म (ईमान) के बारे में।
  • يَعْلَمُ — वह जानता है।
  • عَلِيمٌ — सब कुछ जानने वाला।

तफ़सीर:

ऐ नबी! आप इन देहाती अरबों से कहिए जो अपने ईमान का दावा करते हैं और कसमें खाते हैं कि हम सच्चे मोमिन हैं: “क्या तुम अल्लाह को अपने दीन की ख़बर देते हो? क्या तुम उसे बताना चाहते हो कि हमारे दिलों में ईमान है?” यह कितनी अजीब बात है! क्या अल्लाह को तुम्हारे बताने की ज़रूरत है? वह तो वह सब कुछ जानता है जो आसमानों में है और जो ज़मीन में है। उसके इल्म से कोई चीज़ छिपी नहीं है — न तुम्हारे दिलों के राज़ छिपे हैं, न तुम्हारे अमल, न तुम्हारी नीयतें। वह हर चीज़ का पूरा ज्ञान रखता है।

यह आयत उन लोगों के बारे में उतरी जो सिर्फ़ ज़ुबान से ईमान का दावा करते थे, लेकिन उनके दिलों में सच्चा ईमान नहीं था। वे नबी ﷺ के पास आकर कसमें खाते थे कि हम सच्चे मोमिन हैं, जबकि अल्लाह उनके दिलों का हाल खूब जानता था।

इस आयत से हमें सीख मिलती है कि ईमान का दावा करना आसान है, लेकिन असली चीज़ दिल की पवित्रता और अल्लाह की रज़ा है। अल्लाह को किसी के बताने की ज़रूरत नहीं — वह तो हर दिल की गहराई तक देखता है। हमें चाहिए कि अपने ईमान को सिर्फ़ ज़ुबान से नहीं, बल्कि अच्छे अमल और सच्ची नीयत से साबित करें। अल्लाह से कोई चीज़ छिपी नहीं है, इसलिए हमें उसके सामने सच्चे और ख़ालिस बनना चाहिए। यही सच्ची कामयाबी का रास्ता है — कि हम अल्लाह को अपने दिलों की सच्चाई दिखाएँ, न कि सिर्फ़ ज़ुबान से दावे करें। अल्लाह तआला अपने बंदों के दिलों का हाल जानता है और उसी के पास हर चीज़ का इल्म है।

🎧 सुनें

📜 आयत 14-18 — अल-हुजुरात

14۞ قَالَتِ الْأَعْرَابُ آمَنَّا ۖ قُل لَّمْ تُؤْمِنُوا وَلَٰكِن قُولُوا أَسْلَمْنَا وَلَمَّا يَدْخُلِ الْإِيمَانُ فِي قُلُوبِكُمْ ۖ وَإِن تُطِيعُوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ لَا يَلِتْكُم مِّنْ أَعْمَالِكُمْ شَيْئًا ۚ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
अरब के देहाती कहते हैं कि हम ईमान लाए (ऐ रसूल) तुम कह दो कि तुम ईमान नहीं लाए बल्कि (यूँ) कह दो कि इस्लाम लाए हालॉकि ईमान का अभी तक तुम्हारे दिल में गुज़र हुआ ही नहीं और अगर तुम ख़ुदा की और उसके रसूल की फरमाबरदारी करोगे तो ख़ुदा तुम्हारे आमाल में से कुछ कम नहीं करेगा - बेशक ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
15إِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ الَّذِينَ آمَنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ ثُمَّ لَمْ يَرْتَابُوا وَجَاهَدُوا بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ ۚ أُولَٰئِكَ هُمُ الصَّادِقُونَ
(सच्चे मोमिन) तो बस वही हैं जो ख़ुदा और उसके रसूल पर ईमान लाए फिर उन्होंने उसमें किसी तरह का शक़ शुबह न किया और अपने माल से और अपनी जानों से ख़ुदा की राह में जेहाद किया यही लोग (दावाए ईमान में) सच्चे हैं
16قُلْ أَتُعَلِّمُونَ اللَّهَ بِدِينِكُمْ وَاللَّهُ يَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۚ وَاللَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ
(ऐ रसूल इनसे) पूछो तो कि क्या तुम ख़ुदा को अपनी दीदारी जताते हो और ख़ुदा तो जो कुछ आसमानों मे है और जो कुछ ज़मीन में है (ग़रज़ सब कुछ) जानता है और ख़ुदा हर चीज़ से ख़बरदार है
17يَمُنُّونَ عَلَيْكَ أَنْ أَسْلَمُوا ۖ قُل لَّا تَمُنُّوا عَلَيَّ إِسْلَامَكُم ۖ بَلِ اللَّهُ يَمُنُّ عَلَيْكُمْ أَنْ هَدَاكُمْ لِلْإِيمَانِ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
(ऐ रसूल) तुम पर ये लोग (इसलाम लाने का) एहसान जताते हैं तुम (साफ़) कह दो कि तुम अपने इसलाम का मुझ पर एहसान न जताओ (बल्कि) अगर तुम (दावाए ईमान में) सच्चे हो तो समझो कि, ख़ुदा ने तुम पर एहसान किया कि उसने तुमको ईमान का रास्ता दिखाया
18إِنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ غَيْبَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ وَاللَّهُ بَصِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ
बेशक ख़ुदा तो सारे आसमानों और ज़मीन की छिपी हुई बातों को जानता है और जो तुम करते हो ख़ुदा उसे देख रहा है
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अनुवाद — अल-हुजुरात 16

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Tuesday, August 18, 2026

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