अल-अनआम · 120/165
अनुवाद उच्चारण — अल-अनआम
وَذَرُوا ظَاهِرَ الْإِثْمِ وَبَاطِنَهُ ۚ إِنَّ الَّذِينَ يَكْسِبُونَ الْإِثْمَ سَيُجْزَوْنَ بِمَا كَانُوا يَقْتَرِفُونَ ۝١٢٠
Wa zaroo zaahiral ismi wa baatinah; innal lazeena yaksiboonal ismaa sa yujzawna bimaa kaanoo yaqtarifoon
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ लोगों) ज़ाहिरी और बातिनी गुनाह (दोनों) को (बिल्कुल) छोड़ दो जो लोग गुनाह करते हैं उन्हें अपने आमाल का अनक़रीब ही बदला दिया जाएगा
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • ظَاهِرَ الْإِثْمِ: खुलेआम किए जाने वाले पाप।
  • بَاطِنَهُ: छिपे हुए पाप, जो गुप्त रूप से किए जाएँ।
  • يَكْسِبُونَ: कमाते हैं, अर्जित करते हैं।
  • يَقْتَرِفُونَ: करते हैं, कमाते हैं (बुरे कर्म)।

तफसीर:

अल्लाह तआला इस आयत में अपने बंदों को साफ़ और स्पष्ट आदेश देता है कि वे हर प्रकार के पाप को छोड़ दें—चाहे वह खुलेआम किया जाए या छिपकर। इसका अर्थ यह है कि मुसलमान को चाहिए कि वह न केवल सार्वजनिक रूप से गुनाहों से बचे, बल्कि अपने दिल और नीयत को भी पाक रखे, क्योंकि अल्लाह को वह सब कुछ दिखाई देता है जो ज़ाहिर है और जो बातिन (छिपा हुआ) है।

इस आयत में दो प्रकार के पापों का उल्लेख है: एक वे जो लोगों के सामने किए जाते हैं (जैसे चोरी, झूठ, बदसूरत हरकतें), और दूसरे वे जो गुप्त रूप से किए जाते हैं (जैसे बुरी नज़र, दिल में किसी के प्रति बुराई की भावना, छिपकर की जाने वाली बुराइयाँ)। अल्लाह फरमाता है कि इन दोनों प्रकार के पापों से बचना ज़रूरी है।

फिर अल्लाह ने चेतावनी दी कि जो लोग इन पापों को कमाते हैं—चाहे वे खुले हों या छिपे—उन्हें उनके किए का पूरा बदला दिया जाएगा। यह बदला आख़िरत में अवश्य मिलेगा, भले ही दुनिया में देर से मिले। अल्लाह न्यायपूर्ण है और उसका हर फैसला सटीक है।

फ़ायदे:

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम सिर्फ़ बाहरी अमल की पाकीज़गी नहीं चाहता, बल्कि अंदरूनी सफ़ाई भी चाहता है। एक सच्चा मुसलमान वही है जो खुले और छिपे दोनों हालात में अल्लाह से डरता है।
  2. इससे हमें यह समझ मिलती है कि अल्लाह की निगरानी हर समय हम पर है—चाहे हम अकेले हों या लोगों के बीच। यह एहसास हमें गुनाहों से दूर रखता है और हमारे दिल में अल्लाह का खौफ़ पैदा करता है।
  3. यह आयत हमें आशा भी देती है कि अल्लाह का इंसाफ़ बिल्कुल सटीक है—हर अच्छे और बुरे कर्म का हिसाब होगा, इसलिए हमें अपनी ज़िंदगी को अच्छे कर्मों से भरना चाहिए।
  4. इससे यह भी पता चलता है कि पाप छिपाकर करने से अल्लाह से नहीं छिपाया जा सकता, इसलिए बेहतर है कि हम दिल और ज़ुबान दोनों को पाक रखें और अल्लाह की रहमत के तलबगार बनें।
🎧 सुनें

📜 आयत 118-122 — अल-अनआम

118فَكُلُوا مِمَّا ذُكِرَ اسْمُ اللَّهِ عَلَيْهِ إِن كُنتُم بِآيَاتِهِ مُؤْمِنِينَ
तो अगर तुम उसकी आयतों पर ईमान रखते हो तो जिस ज़ीबह पर (वक्ते ़ज़िबाह) ख़ुदा का नाम लिया गया हो उसी को खाओ
119وَمَا لَكُمْ أَلَّا تَأْكُلُوا مِمَّا ذُكِرَ اسْمُ اللَّهِ عَلَيْهِ وَقَدْ فَصَّلَ لَكُم مَّا حَرَّمَ عَلَيْكُمْ إِلَّا مَا اضْطُرِرْتُمْ إِلَيْهِ ۗ وَإِنَّ كَثِيرًا لَّيُضِلُّونَ بِأَهْوَائِهِم بِغَيْرِ عِلْمٍ ۗ إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ بِالْمُعْتَدِينَ
और तुम्हें क्या हो गया है कि जिस पर ख़ुदा का नाम लिया गया हो उसमें नहीं खाते हो हालॉकि जो चीज़ें उसने तुम पर हराम कर दीं हैं वह तुमसे तफसीलन बयान कर दीं हैं मगर (हाँ) जब तुम मजबूर हो तो अलबत्ता (हराम भी खा सकते हो) और बहुतेरे तो (ख्वाहमख्वाह) अपनी नफसानी ख्वाहिशों से बे समझे बूझे (लोगों को) बहका देते हैं और तुम्हारा परवरदिगार तो हक़ से तजाविज़ करने वालों से ख़ूब वाक़िफ है
120وَذَرُوا ظَاهِرَ الْإِثْمِ وَبَاطِنَهُ ۚ إِنَّ الَّذِينَ يَكْسِبُونَ الْإِثْمَ سَيُجْزَوْنَ بِمَا كَانُوا يَقْتَرِفُونَ
(ऐ लोगों) ज़ाहिरी और बातिनी गुनाह (दोनों) को (बिल्कुल) छोड़ दो जो लोग गुनाह करते हैं उन्हें अपने आमाल का अनक़रीब ही बदला दिया जाएगा
121وَلَا تَأْكُلُوا مِمَّا لَمْ يُذْكَرِ اسْمُ اللَّهِ عَلَيْهِ وَإِنَّهُ لَفِسْقٌ ۗ وَإِنَّ الشَّيَاطِينَ لَيُوحُونَ إِلَىٰ أَوْلِيَائِهِمْ لِيُجَادِلُوكُمْ ۖ وَإِنْ أَطَعْتُمُوهُمْ إِنَّكُمْ لَمُشْرِكُونَ
और जिस (ज़बीहे) पर ख़ुदा का नाम न लिया गया उसमें से मत खाओ (क्योंकि) ये बेशक बदचलनी है और शयातीन तो अपने हवा ख़वाहों के दिल में वसवसा डाला ही करते हैं ताकि वह तुमसे (बेकार) झगड़े किया करें और अगर (कहीं) तुमने उनका कहना मान लिया तो (समझ रखो कि) बेशुबहा तुम भी मुशरिक हो
122أَوَمَن كَانَ مَيْتًا فَأَحْيَيْنَاهُ وَجَعَلْنَا لَهُ نُورًا يَمْشِي بِهِ فِي النَّاسِ كَمَن مَّثَلُهُ فِي الظُّلُمَاتِ لَيْسَ بِخَارِجٍ مِّنْهَا ۚ كَذَٰلِكَ زُيِّنَ لِلْكَافِرِينَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
क्या जो शख़्श (पहले) मुर्दा था फिर हमने उसको ज़िन्दा किया और उसके लिए एक नूर बनाया जिसके ज़रिए वह लोगों में (बेतकल्लुफ़) चलता फिरता है उस शख़्श का सामना हो सकता है जिसकी ये हालत है कि (हर तरफ से) अंधेरे में (फँसा हुआ है) कि वहाँ से किसी तरह निकल नहीं सकता (जिस तरह मोमिनों के वास्ते ईमान आरास्ता किया गया) उसी तरह काफिरों के वास्ते उनके आमाल (बद) आरास्ता कर दिए गए हैं
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अनुवाद — अल-अनआम 120

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Tuesday, August 18, 2026

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