अल-अनआम · 156/165
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-अनआम
أَن تَقُولُوا إِنَّمَا أُنزِلَ الْكِتَابُ عَلَىٰ طَائِفَتَيْنِ مِن قَبْلِنَا وَإِن كُنَّا عَن دِرَاسَتِهِمْ لَغَافِلِينَ ۝١٥٦
An taqooloo innammaaa unzilal Kitaabu `alaa taaa`ifataini min qablinaa wa in kunnaa `an diraasatihim laghaafileen
📖 हिंदी अर्थ
(और ऐ मुशरेकीन ये किताब हमने इसलिए नाज़िल की कि तुम कहीं) यह कह बैठो कि हमसे पहले किताब ख़ुदा तो बस सिर्फ दो ही गिरोहों (यहूद व नसारा) पर नाज़िल हुई थी अगरचे हम तो उनके पढ़ने (पढ़ाने) से बेखबर थे

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • طَائِفَتَيْنِ: दो समुदाय (यहूदी और नसारा/ईसाई)
  • دِرَاسَتِهِمْ: उनकी पढ़ाई, उनके ग्रंथों का अध्ययन और पाठ
  • لَغَافِلِينَ: बिल्कुल बेखबर, अनजान

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने यह कुरआन इसलिए उतारा ताकि तुम अरब के काफिरों को यह कहने का कोई बहाना न मिले कि "हमारे पहले जो किताबें (तौरात और इंजील) उतारी गईं, वे सिर्फ दो समुदायों (यहूदियों और ईसाइयों) पर उतारी गईं, और हम उनकी पढ़ाई से बिल्कुल बेखबर रहे।" यानी अरब के मुशरिकीन यह कह सकते थे कि हमारे पास कोई आसमानी किताब नहीं आई, और जो किताबें पहले आईं, वे उन लोगों की भाषा में थीं जो हमारी भाषा नहीं है, और हमें उनके बारे में कोई जानकारी नहीं। अल्लाह ने कुरआन को अरबी भाषा में उतारकर और उसे उनके बीच पढ़कर सुनाकर उनकी यह दलील खत्म कर दी, ताकि क़यामत के दिन उनके पास कोई बहाना न बचे।

फ़ायदे (सबक):

  1. अल्लाह तआला अपने बंदों पर इतना मेहरबान है कि उसने हर ज़माने में हिदायत का ज़रिया भेजा, ताकि किसी को बहाना बनाने का मौका न मिले।
  2. कुरआन का उतरना अरबों पर अल्लाह की सबसे बड़ी नेमत थी, क्योंकि इससे पहले वे किसी किताब और रसूल से महरूम थे।
  3. इस आयत से पता चलता है कि अल्लाह की हुज्जत (प्रमाण) क़ायम करना उसकी सुन्नत (रीति) है, और वह किसी पर अज़ाब नहीं करता जब तक कि उसे रसूल न भेज दे।
  4. हमें चाहिए कि कुरआन को पढ़ें, समझें और उस पर अमल करें, क्योंकि यह हमारे लिए हिदायत और रहमत है, और इससे बेखबर रहना बड़ी महरूमी है।
  5. इस आयत से यह भी सीख मिलती है कि इंसान को अपनी ज़िम्मेदारी से भागना नहीं चाहिए और न ही बहाने बनाने चाहिए; अल्लाह ने हर उम्मत पर अपनी हुज्जत क़ायम कर दी है।


📜 आयत 154-158 — सूरा अल-अनआम

154ثُمَّ آتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ تَمَامًا عَلَى الَّذِي أَحْسَنَ وَتَفْصِيلًا لِّكُلِّ شَيْءٍ وَهُدًى وَرَحْمَةً لَّعَلَّهُم بِلِقَاءِ رَبِّهِمْ يُؤْمِنُونَ
फिर हमनें जो नेक़ी करें उस पर अपनी नेअमत पूरी करने के वास्ते मूसा को क़िताब (तौरौत) अता फरमाई और उसमें हर चीज़ की तफ़सील (बयान कर दी ) थी और (लोगों के लिए अज़सरतापा(सर से पैर तक)) हिदायत व रहमत है ताकि वह लोग अपनें परवरदिगार के सामने हाज़िर होने का यक़ीन करें
155وَهَٰذَا كِتَابٌ أَنزَلْنَاهُ مُبَارَكٌ فَاتَّبِعُوهُ وَاتَّقُوا لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
और ये किताब (क़ुरान) जिसको हमने (अब नाज़िल किया है क्या है-बरक़त वाली किताब) है तो तुम लोग उसी की पैरवी करो (और ख़ुदा से) डरते रहो ताकि तुम पर रहम किया जाए
156أَن تَقُولُوا إِنَّمَا أُنزِلَ الْكِتَابُ عَلَىٰ طَائِفَتَيْنِ مِن قَبْلِنَا وَإِن كُنَّا عَن دِرَاسَتِهِمْ لَغَافِلِينَ
(और ऐ मुशरेकीन ये किताब हमने इसलिए नाज़िल की कि तुम कहीं) यह कह बैठो कि हमसे पहले किताब ख़ुदा तो बस सिर्फ दो ही गिरोहों (यहूद व नसारा) पर नाज़िल हुई थी अगरचे हम तो उनके पढ़ने (पढ़ाने) से बेखबर थे
157أَوْ تَقُولُوا لَوْ أَنَّا أُنزِلَ عَلَيْنَا الْكِتَابُ لَكُنَّا أَهْدَىٰ مِنْهُمْ ۚ فَقَدْ جَاءَكُم بَيِّنَةٌ مِّن رَّبِّكُمْ وَهُدًى وَرَحْمَةٌ ۚ فَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّن كَذَّبَ بِآيَاتِ اللَّهِ وَصَدَفَ عَنْهَا ۗ سَنَجْزِي الَّذِينَ يَصْدِفُونَ عَنْ آيَاتِنَا سُوءَ الْعَذَابِ بِمَا كَانُوا يَصْدِفُونَ
या ये कहने लगो कि अगर हम पर किताबे (ख़ुदा नाज़िल होती तो हम उन लोगों से कहीं बढ़कर राहे रास्त पर होते तो (देखो) अब तो यक़ीनन तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से तुम्हारे पास एक रौशन दलील है (किताबे ख़ुदा) और हिदायत और रहमत आ चुकी तो जो शख्स ख़ुदा के आयात को झुठलाए और उससे मुँह फेरे उनसे बढ़ कर ज़ालिम कौन है जो लोग हमारी आयतों से मुँह फेरते हैं हम उनके मुँह फेरने के बदले में अनक़रीब ही बुरे अज़ाब की सज़ा देगें (ऐ रसूल) क्या ये लोग सिर्फ उसके मुन्तिज़र है कि उनके पास फरिश्ते आएं
158هَلْ يَنظُرُونَ إِلَّا أَن تَأْتِيَهُمُ الْمَلَائِكَةُ أَوْ يَأْتِيَ رَبُّكَ أَوْ يَأْتِيَ بَعْضُ آيَاتِ رَبِّكَ ۗ يَوْمَ يَأْتِي بَعْضُ آيَاتِ رَبِّكَ لَا يَنفَعُ نَفْسًا إِيمَانُهَا لَمْ تَكُنْ آمَنَتْ مِن قَبْلُ أَوْ كَسَبَتْ فِي إِيمَانِهَا خَيْرًا ۗ قُلِ انتَظِرُوا إِنَّا مُنتَظِرُونَ
या तुम्हारा परवरदिगार खुद (तुम्हारे पास) आये या तुम्हारे परवरदिगार की कुछ निशानियाँ आ जाएं (आख़िरकार क्योकर समझाया जाए) हालांकि जिस दिन तुम्हारे परवरदिगार की बाज़ निशानियाँ आ जाएंगी तो जो शख्स पहले से ईमान नहीं लाया होगा या अपने मोमिन होने की हालत में कोई नेक काम नहीं किया होगा तो अब उसका ईमान लाना उसको कुछ भी मुफ़ीद न होगा - (ऐ रसूल) तुम (उनसे) कह दो कि (अच्छा यही सही) तुम (भी) इन्तिज़ार करो हम भी इन्तिज़ार करते हैं
अल-अनआमकुरान सूची
165आयत
मक्कीअवतरण स्थान
156आयत

अनुवाद — अल-अनआम 156

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Saturday, October 3, 2026

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