अल-क़लम · 46/52
अनुवाद उच्चारण — अल-क़लम
أَمْ تَسْأَلُهُمْ أَجْرًا فَهُم مِّن مَّغْرَمٍ مُّثْقَلُونَ ۝٤٦
Am tas`aluhum ajran fahum mim maghramim musqaloon
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) क्या तुम उनसे (तबलीग़े रिसालत का) कुछ सिला माँगते हो कि उन पर तावान का बोझ पड़ रहा है
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • أَمْ: क्या (प्रश्नवाचक)
  • تَسْأَلُهُمْ أَجْرًا: उनसे कोई पारिश्रमिक या बदला माँगते हैं
  • مَغْرَم: हानि, खर्चा, वह धन जो देना पड़े
  • مُثْقَلُونَ: बोझ से दबे हुए, भारी बोझ उठाने वाले

तफ़सीर:

ऐ नबी! क्या आप इन मुशरिकों से कोई पारिश्रमिक माँगते हैं जो उन्हें भारी लग रहा हो और वे उसी बोझ के कारण आपकी बात मानने से कतरा रहे हों? हरगिज़ नहीं! आप तो उन्हें सिर्फ अल्लाह की राह की तरफ बुलाते हैं और इसके बदले में उनसे दुनिया का कोई मोल नहीं चाहते। आपका दावत-ए-हक़ बिल्कुल निःस्वार्थ है, खालिस अल्लाह की रज़ा के लिए है।

यह आयत उन काफिरों की तरफ इशारा है जो ईमान लाने से इनकार करते थे। अल्लाह तआला फरमाता है: क्या तुम उनसे कोई उजरत माँगते हो जिसके बोझ से वे दबे जा रहे हों? हरगिज़ नहीं! तुम तो उन्हें मुफ्त में हिदायत दे रहे हो, बिना किसी दुनियावी मुआवज़े के। फिर उनके पीछे हटने की क्या वजह है? क्या उनके पास ग़ैब का इल्म है कि वे अपने लिए लिख रहे हैं? यानी वे अपनी ज़ात पर इतना नाज़ करते हैं कि खुद को मोमिनों से बेहतर समझते हैं, हालाँकि यह उनकी जहालत और गुमराही है।

इस आयत में एक बड़ी तसल्ली और ताकीद है कि दीन की दावत कभी दुनियावी मतलब के लिए नहीं होनी चाहिए। जब दावत खालिस अल्लाह के लिए होती है, तो उसका असर दिलों पर पड़ता है। और जो लोग इसे ठुकराते हैं, वे दरअसल अपने ही नफ्स और अंधी हठधर्मिता के पीछे चल रहे होते हैं। यह आयत हमें सिखाती है कि हमारी नीयत हमेशा साफ होनी चाहिए, और हमें किसी से किसी दुनियावी फायदे की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। अल्लाह ही सबसे बड़ा देने वाला है, और उसकी राह में किया गया हर काम, चाहे छोटा हो या बड़ा, उसके यहाँ अमूल्य है।

🎧 सुनें

📜 आयत 44-48 — अल-क़लम

44فَذَرْنِي وَمَن يُكَذِّبُ بِهَٰذَا الْحَدِيثِ ۖ سَنَسْتَدْرِجُهُم مِّنْ حَيْثُ لَا يَعْلَمُونَ
तो मुझे उस कलाम के झुठलाने वाले से समझ लेने दो हम उनको आहिस्ता आहिस्ता इस तरह पकड़ लेंगे कि उनको ख़बर भी न होगी
45وَأُمْلِي لَهُمْ ۚ إِنَّ كَيْدِي مَتِينٌ
और मैं उनको मोहलत दिये जाता हूँ बेशक मेरी तदबीर मज़बूत है
46أَمْ تَسْأَلُهُمْ أَجْرًا فَهُم مِّن مَّغْرَمٍ مُّثْقَلُونَ
(ऐ रसूल) क्या तुम उनसे (तबलीग़े रिसालत का) कुछ सिला माँगते हो कि उन पर तावान का बोझ पड़ रहा है
47أَمْ عِندَهُمُ الْغَيْبُ فَهُمْ يَكْتُبُونَ
या उनके इस ग़ैब (की ख़बर) है कि ये लोग लिख लिया करते हैं
48فَاصْبِرْ لِحُكْمِ رَبِّكَ وَلَا تَكُن كَصَاحِبِ الْحُوتِ إِذْ نَادَىٰ وَهُوَ مَكْظُومٌ
तो तुम अपने परवरदिगार के हुक्म के इन्तेज़ार में सब्र करो और मछली (का निवाला होने) वाले (यूनुस) के ऐसे न हो जाओ कि जब वह ग़ुस्से में भरे हुए थे और अपने परवरदिगार को पुकारा
अल-क़लमकुरान सूची
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अनुवाद — अल-क़लम 46

सूरा अल-क़लम आयत 46 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (ऐ रसूल) क्या तुम उनसे (तबलीग़े रिसालत का) कुछ सिला…

सूरा आयत 46/52 — अल-क़लम القلم (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-क़लम सुनें, अल-क़लम अनुवाद, अल-क़लम mp3, अल-क़लम pdf. आयत 44–48. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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