Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- أُولَاهُمْ: उनके अग्रणी, नेता, बड़े लोग।
- أُخْرَاهُمْ: उनके पिछले लोग, अनुयायी, सामान्य अनुयायी।
- فَضْلٍ: कोई श्रेष्ठता, कोई बड़ाई, कोई अतिरिक्त अधिकार।
- فَذُوقُوا: तो चखो, अनुभव करो।
- تَكْسِبُونَ: तुम कमाते थे, अर्जित करते थे।
तफ़सीर (व्याख्या):
जब नेता और बड़े लोग, जिन्होंने दूसरों को गुमराह किया था, और उनके अनुयायी, जिन्होंने उनकी बात मानकर गलती की थी, दोनों जहन्नम में इकट्ठे होंगे, तो वहाँ एक दूसरे से झगड़ने और बहस करने लगेंगे। उस समय नेता और अग्रणी लोग अपने अनुयायियों से कहेंगे: "हमारी तुम पर कोई श्रेष्ठता नहीं है, न ही हमारे पास तुमसे बढ़कर कोई अधिकार या दलील थी। हम सब इस गुमराही और कुफ्र में बराबर थे। तुमने भी अपनी मर्जी से हमारी बात मानी और हमारे पीछे चले, जबकि तुम्हारे पास सोचने-समझने की शक्ति थी। इसलिए अब हमारी तुम पर कोई बड़ाई नहीं है, और न ही तुम्हारे पास हमारे मुकाबले कोई अतिरिक्त दलील है।"
फिर अल्लाह तआला उन सबको, नेताओं और अनुयायियों दोनों को, एक साथ संबोधित करते हुए कहेंगे: "तो अब तुम सब उस आज़ाब (यातना) का मज़ा चखो, जो तुम्हारे अपने किए हुए कर्मों का नतीजा है। यह यातना तुम्हारे कुफ्र, शिर्क और गुनाहों की सज़ा है, जो तुम दुनिया में कमाते रहे थे।" यानी आज़ाब का कारण कोई और नहीं, बल्कि उनके अपने कर्म हैं, इसलिए वे किसी और को दोष नहीं दे सकते।
फ़ायदे (लाभ):
- इस आयत से पता चलता है कि अल्लाह के यहाँ हर इंसान अपने कर्मों का ज़िम्मेदार है। नेता और अनुयायी, दोनों अपनी-अपनी गलतियों की सज़ा पाएँगे, और कोई किसी का बोझ नहीं उठाएगा।
- यह हमें सिखाती है कि हमें अंधी पैरवी (अंधी नक़ल) नहीं करनी चाहिए। किसी की बात मानने से पहले उसे क़ुरआन और सुन्नत की कसौटी पर परखना चाहिए, क्योंकि क़ियामत के दिन "मैंने तो अपने बड़ों की बात मानी थी" जैसा बहाना काम नहीं आएगा।
- यह आयत हमें सच्चाई की तरफ बुलाती है कि हम अपने जीवन में सही रास्ता चुनें, क्योंकि अल्लाह का फ़ैसला बिल्कुल न्यायपूर्ण है। वह किसी पर ज़ुल्म नहीं करता, बल्कि हर किसी को उसके किए का बदला देता है।
- यहाँ से हमें यह भी सबक मिलता है कि हमें दूसरों को गुमराह करने से बचना चाहिए, क्योंकि जो लोग दूसरों को गुमराह करते हैं, उनका गुनाह और भी बढ़ जाता है, और वे अपने अनुयायियों के साथ मिलकर यातना में शामिल होंगे।
- यह आयत हमें इस्लाम की सच्चाई और अल्लाह के न्याय की ओर आकर्षित करती है, और बताती है कि सिर्फ़ ईमान और अच्छे कर्म ही हमें इस यातना से बचा सकते हैं।
📜 आयत 37-41 — सूरा अल-आराफ
अनुवाद — अल-आराफ 39
सूरा अल-आराफ आयत 39 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और उनमें से पहली जमाअत पिछली जमाअत की तरफ मुख़ातिब…सूरा आयत 39/206 — सूरा अल-आराफ الأعراف (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-आराफ सुनें, सूरा अल-आराफ अनुवाद, सूरा अल-आराफ mp3, सूरा अल-आराफ pdf. आयत 37–41. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Wednesday, September 30, 2026
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