अल-आराफ · 99/206
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-आराफ
أَفَأَمِنُوا مَكْرَ اللَّهِ ۚ فَلَا يَأْمَنُ مَكْرَ اللَّهِ إِلَّا الْقَوْمُ الْخَاسِرُونَ ۝٩٩
Afa aminoo makral laah; falaa yaamanu makral laahi illal qawmul khaasiroon
📖 हिंदी अर्थ
तो क्या ये लोग ख़ुदा की तद्बीर से ढीट हो गए हैं तो (याद रहे कि) ख़ुदा के दॉव से घाटा उठाने वाले ही निडर हो बैठे हैं

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • مَكْرَ اللهِ: अल्लाह की चालाकी/योजना, अर्थात उसका इस्तिदराज (धीरे-धीरे पकड़ना) — जब वह किसी को उसके कुकर्मों के बावजूद दुनिया में नेमतें देता रहता है ताकि वह और अधिक गुमराह हो जाए और फिर अचानक उसे पकड़ ले।
  • الْقَوْمُ الْخَاسِرُونَ: वे लोग जो घाटे में हैं, यानी जिन्होंने कुफ्र और अवज्ञा के कारण अपना ईमान और आख़िरत बर्बाद कर ली।

तफ़सीर:

क्या उन झुठलाने वाली बस्तियों के लोग अल्लाह की चालाकी (मक्र) से निडर हो गए हैं? अल्लाह ने उन्हें दुनिया में ताकत, धन-दौलत और सुख-सुविधाएँ देकर उनकी परीक्षा ली, और उन्हें यह सोचने का मौका दिया कि यह नेमतें उनके अच्छे कर्मों का प्रतिफल हैं — जबकि वास्तव में यह उनके लिए इस्तिदराज (धीरे-धीरे पकड़) था, ताकि वे और अधिक कुफ्र और पाप में डूब जाएँ और फिर अचानक उन पर अज़ाब आ जाए।

यह एक सख्त चेतावनी है कि अल्लाह की पकड़ से कोई भी निडर नहीं हो सकता। जो लोग अल्लाह के मक्र से निडर हो जाते हैं, वे वास्तव में घाटे में हैं — उन्होंने अपनी आख़िरत को बर्बाद कर लिया और अपने कुफ्र के कारण वे हलाक होने वालों में से हैं। जो लोग अल्लाह से डरते हैं और उसकी नेमतों को देखकर उसका शुक्र अदा करते हैं, वे कभी उसकी चालाकी से निडर नहीं होते; बल्कि वे हमेशा उसकी पकड़ से डरते रहते हैं और उसकी इबादत में लगे रहते हैं।

फ़ायदे:

  1. अल्लाह की नेमतें कभी-कभी उसकी नाराज़गी का ज़रिया बन जाती हैं — जब इंसान उन्हें देखकर घमंड करे और अल्लाह की नाफ़रमानी करे। इसलिए हर नेमत पर अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए और उसकी नाराज़गी से डरना चाहिए।
  2. अल्लाह की पकड़ से निडर होना सबसे बड़ी भूल है — यह इंसान को हलाकत की ओर ले जाती है। मोमिन हमेशा अल्लाह के अज़ाब से डरता है और उसकी रहमत की उम्मीद रखता है।
  3. यह आयत हमें सिखाती है कि दुनिया की चमक-दमक और सुख-सुविधाएँ किसी की नेकी का सबूत नहीं हैं — बल्कि यह परीक्षा हो सकती है। इसलिए हमें अपने आचरण और ईमान को मज़बूत करना चाहिए, न कि दुनिया की नेमतों पर इतराना चाहिए।
  4. अल्लाह का डर इंसान को हर बुराई से बचाता है और उसे सीधे रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ देता है — यही सच्ची कामयाबी है।


📜 आयत 97-101 — सूरा अल-आराफ

97أَفَأَمِنَ أَهْلُ الْقُرَىٰ أَن يَأْتِيَهُم بَأْسُنَا بَيَاتًا وَهُمْ نَائِمُونَ
(उन) बस्तियों के रहने वाले उस बात से बेख़ौफ हैं कि उन पर हमारा अज़ाब रातों रात आ जाए जब कि वह पड़े बेख़बर सोते हों
98أَوَأَمِنَ أَهْلُ الْقُرَىٰ أَن يَأْتِيَهُم بَأْسُنَا ضُحًى وَهُمْ يَلْعَبُونَ
या उन बस्तियों वाले इससे बेख़ौफ हैं कि उन पर दिन दहाड़े हमारा अज़ाब आ पहुँचे जब वह खेल कूद (में मशग़ूल हो)
99أَفَأَمِنُوا مَكْرَ اللَّهِ ۚ فَلَا يَأْمَنُ مَكْرَ اللَّهِ إِلَّا الْقَوْمُ الْخَاسِرُونَ
तो क्या ये लोग ख़ुदा की तद्बीर से ढीट हो गए हैं तो (याद रहे कि) ख़ुदा के दॉव से घाटा उठाने वाले ही निडर हो बैठे हैं
100أَوَلَمْ يَهْدِ لِلَّذِينَ يَرِثُونَ الْأَرْضَ مِن بَعْدِ أَهْلِهَا أَن لَّوْ نَشَاءُ أَصَبْنَاهُم بِذُنُوبِهِمْ ۚ وَنَطْبَعُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ فَهُمْ لَا يَسْمَعُونَ
क्या जो लोग अहले ज़मीन के बाद ज़मीन के वारिस (व मालिक) होते हैं उन्हें ये मालूम नहीं कि अगर हम चाहते तो उनके गुनाहों की बदौलत उनको मुसीबत में फँसा देते (मगर ये लोग ऐसे नासमझ हैं कि गोया) उनके दिलों पर हम ख़ुद (मोहर कर देते हैं कि ये लोग कुछ सुनते ही नहीं
101تِلْكَ الْقُرَىٰ نَقُصُّ عَلَيْكَ مِنْ أَنبَائِهَا ۚ وَلَقَدْ جَاءَتْهُمْ رُسُلُهُم بِالْبَيِّنَاتِ فَمَا كَانُوا لِيُؤْمِنُوا بِمَا كَذَّبُوا مِن قَبْلُ ۚ كَذَٰلِكَ يَطْبَعُ اللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِ الْكَافِرِينَ
(ऐ रसूल) ये चन्द बस्तियाँ हैं जिन के हालात हम तुमसे बयान करते हैं और इसमें तो शक़ ही नहीं कि उनके पैग़म्बर उनके पास वाजेए व रौशन मौजिज़े लेकर आए मगर ये लोग जिसके पहले झुठला चुके थे उस पर भला काहे को ईमान लाने वाले थे ख़ुदा यूं काफिरों के दिलों पर अलामत मुकर्रर कर देता है (कि ये ईमान न लाएँगें)
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मक्कीअवतरण स्थान
99आयत

अनुवाद — अल-आराफ 99

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Monday, September 28, 2026

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