अल-आराफ · 98/206
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-आराफ
أَوَأَمِنَ أَهْلُ الْقُرَىٰ أَن يَأْتِيَهُم بَأْسُنَا ضُحًى وَهُمْ يَلْعَبُونَ ۝٩٨
Awa amina ahlul quraaa ai yaatiyahum baasunaa duhanw wa hum yal`aboon
📖 हिंदी अर्थ
या उन बस्तियों वाले इससे बेख़ौफ हैं कि उन पर दिन दहाड़े हमारा अज़ाब आ पहुँचे जब वह खेल कूद (में मशग़ूल हो)

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • ضُحًى: दिन का वह समय जब सूर्य खूब निकल आता है, यानी दोपहर से पहले का समय।
  • يَلْعَبُونَ: खेल-कूद में लगे हों, यानी दुनिया के कामों में मस्त और बेखबर हों।

तफसीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला उन बस्तियों के लोगों से पूछ रहे हैं जिन्होंने नबियों को झुठलाया और अपनी सरकशी पर अड़े रहे। क्या वे लोग इस बात से निडर हो गए हैं कि उन पर अल्लाह का अज़ाब दिन चढ़े, सुबह के समय आ जाए, जब वे अपने दुनियावी कामों में पूरी तरह मशगूल हों और खेल-कूद में लगे हों? यानी जिस वक्त इंसान सबसे ज़्यादा गाफिल और बेखबर होता है, उसी वक्त अज़ाब आ जाए। यह ज़िक्र इसलिए किया गया कि उन दोनों वक्तों (रात और दिन) में इंसान की ग़फलत अपने आख़िरी दर्जे पर होती है, इसलिए उन वक्तों में अज़ाब का आना ज़्यादा सख्त और डरावना होता है। यह अल्लाह की तरफ से एक सख्त चेतावनी है कि उनकी मोहलत उन्हें बेखबर न कर दे, क्योंकि अज़ाब अचानक उस वक्त भी आ सकता है जब वे सबसे ज़्यादा अपनी दुनिया में मगन हों।

फायदे (सबक):

  1. इंसान को कभी भी अल्लाह की पकड़ से बेखबर और निडर नहीं होना चाहिए, चाहे वह कितनी ही आराम की हालत में क्यों न हो।
  2. अल्लाह का अज़ाब किसी खास वक्त का मोहताज नहीं, वह जब चाहे आ सकता है, इसलिए हर वक्त उससे डरते रहना चाहिए।
  3. दुनिया की मशगूलियाँ और खेल-तमाशे इंसान को आख़िरत से गाफिल कर देते हैं, यही ग़फलत इंसान के हलाक होने का सबब बनती है।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि अपने जीवन में हर पल अल्लाह की याद रखें और उसकी नाफरमानी से बचें, क्योंकि मौत और अज़ाब का वक्त किसी को मालूम नहीं।
  5. अल्लाह की रहमत और मोहलत का फायदा उठाकर तौबा कर लेना चाहिए, क्योंकि अज़ाब आने के बाद पछतावा किसी काम नहीं आता।


📜 आयत 96-100 — सूरा अल-आराफ

96وَلَوْ أَنَّ أَهْلَ الْقُرَىٰ آمَنُوا وَاتَّقَوْا لَفَتَحْنَا عَلَيْهِم بَرَكَاتٍ مِّنَ السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ وَلَٰكِن كَذَّبُوا فَأَخَذْنَاهُم بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ
और वह बिल्कुल बेख़बर थे और अगर उन बस्तियों के रहने वाले ईमान लाते और परहेज़गार बनते तो हम उन पर आसमान व ज़मीन की बरकतों (के दरवाजे) ख़ोल देते मगर (अफसोस) उन लोगों ने (हमारे पैग़म्बरों को) झूठलाया तो हमने भी उनके करतूतों की बदौलत उन को (अज़ाब में) गिरफ्तार किया
97أَفَأَمِنَ أَهْلُ الْقُرَىٰ أَن يَأْتِيَهُم بَأْسُنَا بَيَاتًا وَهُمْ نَائِمُونَ
(उन) बस्तियों के रहने वाले उस बात से बेख़ौफ हैं कि उन पर हमारा अज़ाब रातों रात आ जाए जब कि वह पड़े बेख़बर सोते हों
98أَوَأَمِنَ أَهْلُ الْقُرَىٰ أَن يَأْتِيَهُم بَأْسُنَا ضُحًى وَهُمْ يَلْعَبُونَ
या उन बस्तियों वाले इससे बेख़ौफ हैं कि उन पर दिन दहाड़े हमारा अज़ाब आ पहुँचे जब वह खेल कूद (में मशग़ूल हो)
99أَفَأَمِنُوا مَكْرَ اللَّهِ ۚ فَلَا يَأْمَنُ مَكْرَ اللَّهِ إِلَّا الْقَوْمُ الْخَاسِرُونَ
तो क्या ये लोग ख़ुदा की तद्बीर से ढीट हो गए हैं तो (याद रहे कि) ख़ुदा के दॉव से घाटा उठाने वाले ही निडर हो बैठे हैं
100أَوَلَمْ يَهْدِ لِلَّذِينَ يَرِثُونَ الْأَرْضَ مِن بَعْدِ أَهْلِهَا أَن لَّوْ نَشَاءُ أَصَبْنَاهُم بِذُنُوبِهِمْ ۚ وَنَطْبَعُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ فَهُمْ لَا يَسْمَعُونَ
क्या जो लोग अहले ज़मीन के बाद ज़मीन के वारिस (व मालिक) होते हैं उन्हें ये मालूम नहीं कि अगर हम चाहते तो उनके गुनाहों की बदौलत उनको मुसीबत में फँसा देते (मगर ये लोग ऐसे नासमझ हैं कि गोया) उनके दिलों पर हम ख़ुद (मोहर कर देते हैं कि ये लोग कुछ सुनते ही नहीं
अल-आराफकुरान सूची
206आयत
मक्कीअवतरण स्थान
98आयत

अनुवाद — अल-आराफ 98

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Wednesday, September 30, 2026

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