अल-मआरिज · 26/44
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-मआरिज
وَالَّذِينَ يُصَدِّقُونَ بِيَوْمِ الدِّينِ ۝٢٦
Wallazeena yusaddiqoona bi yawmid Deen
📖 हिंदी अर्थ
और जो लोग रोज़े जज़ा की तस्दीक़ करते हैं

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • يُصَدِّقُونَ: सत्य मानते हैं, पुष्टि करते हैं।
  • يَوْمِ الدِّينِ: प्रतिफल और हिसाब का दिन, यानी क़ियामत का दिन।

विस्तृत तफ़सीर:

अल्लाह तआला इस आयत में उन मोमिनों की विशेषताओं का ज़िक्र कर रहे हैं जो जन्नत के हक़दार हैं। वे लोग "यौमिद्दीन" यानी उस दिन पर पूरा यक़ीन रखते हैं, जब अल्लाह हर इंसान को उसके अमल का पूरा-पूरा बदला देगा। यह सिर्फ़ ज़ुबानी ईमान नहीं है, बल्कि उनका यह विश्वास उनके दिलों में गहराई तक उतरा हुआ है, जिसका असर उनके अमल पर साफ़ दिखाई देता है।

यह ईमान उन्हें हर उस काम से रोकता है जो अल्लाह को नापसंद है, और उन्हें उन अच्छे कामों की तरफ़ प्रेरित करता है जिनसे अल्लाह खुश होता है। वे जानते हैं कि यह दुनिया का जीवन आख़िरी जीवन नहीं है, बल्कि इसके बाद एक और जीवन है, जहाँ हर छोटे-बड़े अमल का हिसाब होगा। यही विश्वास उन्हें नेकी पर स्थिर रखता है और गुनाहों से बचाता है।

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें सिखाती है कि आख़िरत का यक़ीन ही असल में इंसान की ज़िंदगी को सही दिशा देता है। जब हमें पूरा विश्वास हो जाए कि एक दिन हमें अपने हर अमल का हिसाब देना है, तो हम कभी भी अल्लाह की नाफ़रमानी की हिम्मत नहीं करेंगे। यही ईमान हमें नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हर नेक काम की तरफ़ ले जाता है।

अल्लाह तआला से दुआ है कि वह हमें सच्चे दिल से यौमुद्दीन पर ईमान लाने की तौफ़ीक़ दे और हमारे अमल को अपनी रज़ा के मुताबिक़ बनाए। आमीन।



📜 आयत 24-28 — सूरा अल-मआरिज

24وَالَّذِينَ فِي أَمْوَالِهِمْ حَقٌّ مَّعْلُومٌ
और जिनके माल में माँगने वाले और न माँगने वाले के
25لِّلسَّائِلِ وَالْمَحْرُومِ
लिए एक मुक़र्रर हिस्सा है
26وَالَّذِينَ يُصَدِّقُونَ بِيَوْمِ الدِّينِ
और जो लोग रोज़े जज़ा की तस्दीक़ करते हैं
27وَالَّذِينَ هُم مِّنْ عَذَابِ رَبِّهِم مُّشْفِقُونَ
और जो लोग अपने परवरदिगार के अज़ाब से डरते रहते हैं
28إِنَّ عَذَابَ رَبِّهِمْ غَيْرُ مَأْمُونٍ
बेशक उनको परवरदिगार के अज़ाब से बेख़ौफ न होना चाहिए
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26आयत

अनुवाद — अल-मआरिज 26

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Saturday, October 3, 2026

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