अल-मुरसलात · 26/50
अनुवाद उच्चारण — अल-मुरसलात
أَحْيَاءً وَأَمْوَاتًا ۝٢٦
Ahyaaa`anw wa amwaataa
📖 हिंदी अर्थ
और उसमें ऊँचे ऊँचे अटल पहाड़ रख दिए

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • अह्या (أَحْيَاءً): जीवित लोग, जो धरती की सतह पर निवास करते हैं।
  • अम्वातन (وَأَمْوَاتًا): मृत लोग, जिन्हें धरती की गोद में दफनाया जाता है।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने इस आयत में अपनी महान शक्ति और कृपा का ज़िक्र करते हुए फ़रमाया कि क्या हमने यह धरती तुम्हारे लिए ऐसी जगह नहीं बनाई जो तुम्हें अपने सीने में समेटे हुए है? यह धरती अपनी पीठ पर जीवित लोगों को ढोती है—वे लोग जो इस पर चलते-फिरते हैं, इसे आबाद करते हैं, खेती करते हैं, मकान बनाते हैं और अपनी ज़िंदगी की सारी ज़रूरतें यहीं से पूरी करते हैं। और इसकी गोद (पेट) में मुर्दों को समेटे हुए है—जब कोई इंसान मर जाता है, तो उसे इसी धरती में दफनाया जाता है, और यह उसे अपने अंदर छिपा लेती है।

यह अल्लाह की बेहद बड़ी नेमत है कि उसने धरती को इस काबिल बनाया कि वह जीवितों के लिए आरामगाह और मृतकों के लिए क़ब्रगाह है। अगर धरती ऐसी न होती, तो इंसानों का जीवन असंभव होता। यही नहीं, अल्लाह ने इस धरती में पहाड़ों को मज़बूत खूँटों की तरह गाड़ दिया है ताकि वह तुम्हें लेकर डगमगाए नहीं, और तुम्हें मीठा, साफ और पीने योग्य पानी पिलाया।

यह आयत हमें सोचने पर मजबूर करती है कि जिस अल्लाह ने धरती को इस तरह हमारे लिए आरामदेह बनाया, जीवितों का पालन-पोषण किया और मृतकों को अपनी अमानत में ले लिया, क्या वह हमें दोबारा जीवित करके हिसाब लेने की ताक़त नहीं रखता? बेशक वह क़ुदरत रखता है। यही वह अल्लाह है जो क़यामत के दिन सबको उठाएगा और उनके अच्छे-बुरे कर्मों का हिसाब लेगा।

तो ऐ इंसान! इस धरती पर अपनी ज़िंदगी के दिनों में अल्लाह की इबादत कर, उसके हुक्मों पर चल, और याद रख कि एक दिन तुझे भी इसी धरती की गोद में सोना है, और फिर उस दिन उठना है जब हर इंसान को उसके किए का बदला मिलेगा। यह धरती तेरे लिए सबक़ है—जीवितों के लिए आरामगाह और मुर्दों के लिए क़ब्रगाह—तो इससे सीख ले और अपने रब की रहमत और इंसाफ़ पर ईमान ला। अल्लाह ने जो नेमतें दी हैं, उनका शुक्र अदा कर और उसकी नाफ़रमानी से बच, क्योंकि वही ज़िंदगी देने वाला और मौत देने वाला है, और वही क़यामत के दिन सबको ज़िंदा करके उठाने वाला है।



📜 आयत 24-28 — अल-मुरसलात

24وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِّلْمُكَذِّبِينَ
उन दिन झुठलाने वालों की ख़राबी है
25أَلَمْ نَجْعَلِ الْأَرْضَ كِفَاتًا
क्या हमने ज़मीन को ज़िन्दों और मुर्दों को समेटने वाली नहीं बनाया
26أَحْيَاءً وَأَمْوَاتًا
और उसमें ऊँचे ऊँचे अटल पहाड़ रख दिए
27وَجَعَلْنَا فِيهَا رَوَاسِيَ شَامِخَاتٍ وَأَسْقَيْنَاكُم مَّاءً فُرَاتًا
और तुम लोगों को मीठा पानी पिलाया
28وَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِّلْمُكَذِّبِينَ
उस दिन झुठलाने वालों की ख़राबी है
अल-मुरसलातकुरान सूची
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26आयत

अनुवाद — अल-मुरसलात 26

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Tuesday, August 18, 2026

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