अत-तौबा · 2/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
فَسِيحُوا فِي الْأَرْضِ أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍ وَاعْلَمُوا أَنَّكُمْ غَيْرُ مُعْجِزِي اللَّهِ ۙ وَأَنَّ اللَّهَ مُخْزِي الْكَافِرِينَ ۝٢
Faseehoo fil ardi arba`ata ashhurinw wa`lamoooannakum ghairu mu`jizil laahi wa annal laaha mukhzil kaafireen
📖 हिंदी अर्थ
तो (ऐ मुशरिकों) बस तुम चार महीने (ज़ीकादा, जिल हिज्जा, मुहर्रम रजब) तो (चैन से बेख़तर) रूए ज़मीन में सैरो सियाहत (घूम फिर) कर लो और ये समझते रहे कि तुम (किसी तरह) ख़ुदा को आजिज़ नहीं कर सकते और ये भी कि ख़ुदा काफ़िरों को ज़रूर रूसवा करके रहेगा
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَسِيحُوا: चलो-फिरो, यात्रा करो।
  • مُعْجِزِي الله: अल्लाह को विवश करने वाले, अल्लाह की पकड़ से बच निकलने वाले।
  • مُخْزِي: अपमानित करने वाला, रुसवा करने वाला।

तफसीर (व्याख्या):

हे मुशरिको! यह अल्लाह की ओर से एक घोषणा है कि तुम चार महीने तक धरती में स्वतंत्र रूप से घूम-फिर सकते हो, जहाँ चाहो जाओ, और इस अवधि में तुम्हें मुसलमानों की ओर से कोई हानि नहीं पहुँचेगी। यह अवधि उन लोगों के लिए है जिन्होंने अपनी संधि तोड़ दी थी, या जिनकी संधि की कोई निश्चित अवधि नहीं थी। जिनकी संधि चार महीने से कम की थी, उन्हें पूरे चार महीने की मोहलत दी गई, और जिनकी संधि चार महीने से अधिक की थी, उन्हें घटाकर चार महीने कर दी गई। यह अवधि हज्जे-अकबर (10वीं हिजरी) के दिन से शुरू होती है।

इसके बाद तुम्हें यह अच्छी तरह जान लेना चाहिए कि तुम अल्लाह को विवश नहीं कर सकते, अर्थात् उसकी पकड़ से बच निकलना तुम्हारे बस में नहीं है। यदि तुम अपने कुफ्र और शिर्क पर बने रहे, तो अल्लाह तुम्हें अवश्य पकड़ेगा। अल्लाह काफिरों को दुनिया में कत्ल, कैद और अपमान के माध्यम से रुसवा करेगा, और आखिरत में उन्हें जहन्नम की आग में डालेगा। यह उन लोगों के लिए एक कड़ी चेतावनी है कि चार महीने की मोहलत के बाद उनके लिए कोई सुरक्षा या संधि नहीं होगी, बल्कि वे अल्लाह और उसके रसूल के दुश्मन माने जाएँगे, जब तक कि वे तौबा न कर लें।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. अल्लाह अपने बंदों पर बड़ा दयालु और कृपालु है। उसने मुशरिकों को भी, जो सबसे बड़े अपराधी थे, चार महीने की मोहलत दी ताकि वे अपने जीवन की स्थिति सुधार सकें और तौबा कर सकें। यह अल्लाह की रहमत की विशालता को दर्शाता है।
  2. यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की पकड़ से कोई नहीं बच सकता। चाहे इंसान कितना भी ताकतवर या चालाक क्यों न हो, अल्लाह की कुदरत के आगे सब बेबस है।
  3. इस्लाम में वादे और संधियों की पूर्ति का बड़ा महत्व है, लेकिन जब दूसरा पक्ष संधि तोड़ दे, तो स्पष्ट रूप से उसे अवगत करा देना चाहिए, जैसा कि अल्लाह ने यहाँ किया।
  4. इस आयत से यह भी पता चलता है कि अल्लाह काफिरों को दुनिया में भी अपमानित करता है और आखिरत में भी। यह मोमिनों के लिए सबसे बड़ी खुशखबरी है कि अल्लाह उनके दुश्मनों को रुसवा करने वाला है।
  5. यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की ओर से दी गई मोहलत किसी की इज़्ज़त नहीं बढ़ाती, बल्कि यह एक अवसर है कि इंसान अपनी गलतियों को सुधार ले और अल्लाह की ओर लौट आए।
🎧 सुनें

📜 आयत 1-4 — अत-तौबा

1بَرَاءَةٌ مِّنَ اللَّهِ وَرَسُولِهِ إِلَى الَّذِينَ عَاهَدتُّم مِّنَ الْمُشْرِكِينَ
(ऐ मुसलमानों) जिन मुशरिकों से तुम लोगों ने सुलह का एहद किया था अब ख़ुदा और उसके रसूल की तरफ से उनसे (एक दम) बेज़ारी है
2فَسِيحُوا فِي الْأَرْضِ أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍ وَاعْلَمُوا أَنَّكُمْ غَيْرُ مُعْجِزِي اللَّهِ ۙ وَأَنَّ اللَّهَ مُخْزِي الْكَافِرِينَ
तो (ऐ मुशरिकों) बस तुम चार महीने (ज़ीकादा, जिल हिज्जा, मुहर्रम रजब) तो (चैन से बेख़तर) रूए ज़मीन में सैरो सियाहत (घूम फिर) कर लो और ये समझते रहे कि तुम (किसी तरह) ख़ुदा को आजिज़ नहीं कर सकते और ये भी कि ख़ुदा काफ़िरों को ज़रूर रूसवा करके रहेगा
3وَأَذَانٌ مِّنَ اللَّهِ وَرَسُولِهِ إِلَى النَّاسِ يَوْمَ الْحَجِّ الْأَكْبَرِ أَنَّ اللَّهَ بَرِيءٌ مِّنَ الْمُشْرِكِينَ ۙ وَرَسُولُهُ ۚ فَإِن تُبْتُمْ فَهُوَ خَيْرٌ لَّكُمْ ۖ وَإِن تَوَلَّيْتُمْ فَاعْلَمُوا أَنَّكُمْ غَيْرُ مُعْجِزِي اللَّهِ ۗ وَبَشِّرِ الَّذِينَ كَفَرُوا بِعَذَابٍ أَلِيمٍ
और ख़ुदा और उसके रसूल की तरफ से हज अकबर के दिन (तुम) लोगों को मुनादी की जाती है कि ख़ुदा और उसका रसूल मुशरिकों से बेज़ार (और अलग) है तो (मुशरिकों) अगर तुम लोगों ने (अब भी) तौबा की तो तुम्हारे हक़ में यही बेहतर है और अगर तुम लोगों ने (इससे भी) मुंह मोड़ा तो समझ लो कि तुम लोग ख़ुदा को हरगिज़ आजिज़ नहीं कर सकते और जिन लोगों ने कुफ्र इख्तेयार किया उनको दर्दनाक अज़ाब की ख़ुश ख़बरी दे दो
4إِلَّا الَّذِينَ عَاهَدتُّم مِّنَ الْمُشْرِكِينَ ثُمَّ لَمْ يَنقُصُوكُمْ شَيْئًا وَلَمْ يُظَاهِرُوا عَلَيْكُمْ أَحَدًا فَأَتِمُّوا إِلَيْهِمْ عَهْدَهُمْ إِلَىٰ مُدَّتِهِمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُتَّقِينَ
मगर (हाँ) जिन मुशरिकों से तुमने एहदो पैमान किया था फिर उन लोगों ने भी कभी कुछ तुमसे (वफ़ा एहद में) कमी नहीं की और न तुम्हारे मुक़ाबले में किसी की मदद की हो तो उनके एहद व पैमान को जितनी मुद्द्त के वास्ते मुक़र्रर किया है पूरा कर दो ख़ुदा परहेज़गारों को यक़ीनन दोस्त रखता है
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अनुवाद — अत-तौबा 2

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Tuesday, August 18, 2026

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