अत-तौबा · 32/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
يُرِيدُونَ أَن يُطْفِئُوا نُورَ اللَّهِ بِأَفْوَاهِهِمْ وَيَأْبَى اللَّهُ إِلَّا أَن يُتِمَّ نُورَهُ وَلَوْ كَرِهَ الْكَافِرُونَ ۝٣٢
Yureedoona ai yutfi`oo nooral laahi bi`afwaahihim wa yaaballaahu illaaa ai yutimma noorahoo wa law karihal kaafiroon
📖 हिंदी अर्थ
जिस चीज़ को ये लोग उसका शरीक़ बनाते हैं वह उससे पाक व पाक़ीजा है ये लोग चाहते हैं कि अपने मुँह से (फ़ूंक मारकर) ख़ुदा के नूर को बुझा दें और ख़ुदा इसके सिवा कुछ मानता ही नहीं कि अपने नूर को पूरा ही करके रहे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يُطْفِئُوا: बुझा दें, समाप्त कर दें।
  • نُورَ اللَّهِ: अल्लाह का नूर (प्रकाश), जिसका अर्थ है इस्लाम, क़ुरआन और वे स्पष्ट प्रमाण जो अल्लाह ने अपने रसूल ﷺ के माध्यम से भेजे हैं।
  • بِأَفْوَاهِهِمْ: अपने मुँह से, अर्थात अपने झूठे दावों और बातों के द्वारा।
  • يَأْبَى اللَّهُ: अल्लाह इनकार करता है, अर्थात अल्लाह की इच्छा इसके विपरीत है।
  • يُتِمَّ نُورَهُ: अपने नूर को पूरा करे, अर्थात इस्लाम को पूर्ण और विजयी बनाए।
  • وَلَوْ كَرِهَ الْكَافِرُونَ: चाहे काफ़िर (इनकार करने वाले) इसे कितना ही नापसंद करें।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन काफ़िरों के हालात का वर्णन करती है जो अल्लाह के दीन (इस्लाम) को मिटाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे थे। वे अपने मुँह से झूठे आरोप लगाते थे, रसूल ﷺ को जादूगर और शायर कहते थे, और क़ुरआन के बारे में मनगढ़ंत बातें कहते थे। उनका उद्देश्य यह था कि वे इन बातों से इस्लाम के प्रकाश को बुझा दें और लोगों को सत्य के मार्ग से भटका दें। लेकिन अल्लाह ने अपनी क़ुदरत से यह तय कर रखा था कि वह अपने दीन को पूरा करके रहेगा, उसे स्पष्ट रूप से प्रकट करेगा और उसे सभी दीनों पर ग़ालिब बनाएगा। अल्लाह की इच्छा के आगे काफ़िरों की सारी कोशिशें नाकाम रहेंगी, चाहे वे इससे कितना ही नफ़रत करें। यह अल्लाह का वादा है कि सत्य की जीत अवश्य होगी, और असत्य की हार तय है। काफ़िरों के मुँह से निकले हुए शब्द उस नूर को नहीं बुझा सकते, क्योंकि अल्लाह का नूर उसकी अपनी रोशनी से पूर्ण होता है, न कि किसी इंसान की बातों से।


फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. अल्लाह पर भरोसा: इस आयत से मुसलमानों को यह सीख मिलती है कि अल्लाह का दीन किसी इंसान की बातों या साज़िशों से कमज़ोर नहीं पड़ता। अल्लाह अपने दीन की हिफ़ाज़त ख़ुद करता है, इसलिए मोमिन को पूरा भरोसा रखना चाहिए।
  2. सत्य की विजय अवश्यंभावी: यह आयत मुसलमानों को यक़ीन दिलाती है कि चाहे दुनिया में कितनी भी मुश्किलें आएँ, सत्य की जीत तय है। यह विश्वास मुसलमान को हर हाल में सब्र और स्थिरता प्रदान करता है।
  3. काफ़िरों की कोशिशों की नाकामी: यह आयत बताती है कि अल्लाह के दीन के ख़िलाफ़ चलने वाली सारी साज़िशें बेकार हैं। यह मुसलमानों के लिए तसल्ली का सबब है कि उन्हें दुश्मनों के नुक़्सान से डरने की ज़रूरत नहीं।
  4. अल्लाह की इच्छा का बोलबाला: जब अल्लाह किसी चीज़ का इरादा कर लेता है, तो उसे कोई रोक नहीं सकता। यह बात मोमिन के दिल में अल्लाह की अज़मत और उसकी क़ुदरत का एहसास पैदा करती है।
  5. इस्लाम की हिफ़ाज़त: यह आयत मुसलमानों को यह भी सिखाती है कि उन्हें अपने दीन की हिफ़ाज़त के लिए कोशिश करनी चाहिए, लेकिन अंतिम भरोसा अल्लाह पर ही रखना चाहिए, क्योंकि असली हिफ़ाज़त करने वाला अल्लाह ही है।


📜 आयत 30-34 — अत-तौबा

30وَقَالَتِ الْيَهُودُ عُزَيْرٌ ابْنُ اللَّهِ وَقَالَتِ النَّصَارَى الْمَسِيحُ ابْنُ اللَّهِ ۖ ذَٰلِكَ قَوْلُهُم بِأَفْوَاهِهِمْ ۖ يُضَاهِئُونَ قَوْلَ الَّذِينَ كَفَرُوا مِن قَبْلُ ۚ قَاتَلَهُمُ اللَّهُ ۚ أَنَّىٰ يُؤْفَكُونَ
यहूद तो कहते हैं कि अज़ीज़ ख़ुदा के बेटे हैं और ईसाई कहते हैं कि मसीहा (ईसा) ख़ुदा के बेटे हैं ये तो उनकी बात है और (वह ख़ुद) उन्हीं के मुँह से ये लोग भी उन्हीं काफ़िरों की सी बातें बनाने लगे जो उनसे पहले गुज़र चुके हैं ख़ुदा उनको क़त्ल (तहस नहस) करके (देखो तो) कहाँ से कहाँ भटके जा रहे हैं
31اتَّخَذُوا أَحْبَارَهُمْ وَرُهْبَانَهُمْ أَرْبَابًا مِّن دُونِ اللَّهِ وَالْمَسِيحَ ابْنَ مَرْيَمَ وَمَا أُمِرُوا إِلَّا لِيَعْبُدُوا إِلَٰهًا وَاحِدًا ۖ لَّا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۚ سُبْحَانَهُ عَمَّا يُشْرِكُونَ
उन लोगों ने तो अपने ख़ुदा को छोड़कर अपनी आलिमों को और अपने ज़ाहिदों को और मरियम के बेटे मसीह को अपना परवरदिगार बना डाला हालॉकि उन्होनें सिवाए इसके और हुक्म ही नहीं दिया गया कि ख़ुदाए यक़ता (सिर्फ़ ख़ुदा) की इबादत करें उसके सिवा (और कोई क़ाबिले परसतिश नहीं)
32يُرِيدُونَ أَن يُطْفِئُوا نُورَ اللَّهِ بِأَفْوَاهِهِمْ وَيَأْبَى اللَّهُ إِلَّا أَن يُتِمَّ نُورَهُ وَلَوْ كَرِهَ الْكَافِرُونَ
जिस चीज़ को ये लोग उसका शरीक़ बनाते हैं वह उससे पाक व पाक़ीजा है ये लोग चाहते हैं कि अपने मुँह से (फ़ूंक मारकर) ख़ुदा के नूर को बुझा दें और ख़ुदा इसके सिवा कुछ मानता ही नहीं कि अपने नूर को पूरा ही करके रहे
33هُوَ الَّذِي أَرْسَلَ رَسُولَهُ بِالْهُدَىٰ وَدِينِ الْحَقِّ لِيُظْهِرَهُ عَلَى الدِّينِ كُلِّهِ وَلَوْ كَرِهَ الْمُشْرِكُونَ
अगरचे कुफ्फ़ार बुरा माना करें वही तो (वह ख़ुदा) है कि जिसने अपने रसूल (मोहम्मद) को हिदायत और सच्चे दीन के साथ ( मबऊस करके) भेजता कि उसको तमाम दीनो पर ग़ालिब करे अगरचे मुशरेकीन बुरा माना करे
34۞ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِنَّ كَثِيرًا مِّنَ الْأَحْبَارِ وَالرُّهْبَانِ لَيَأْكُلُونَ أَمْوَالَ النَّاسِ بِالْبَاطِلِ وَيَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ اللَّهِ ۗ وَالَّذِينَ يَكْنِزُونَ الذَّهَبَ وَالْفِضَّةَ وَلَا يُنفِقُونَهَا فِي سَبِيلِ اللَّهِ فَبَشِّرْهُم بِعَذَابٍ أَلِيمٍ
ऐ ईमानदारों इसमें उसमें शक़ नहीं कि (यहूद व नसारा के) बहुतेरे आलिम ज़ाहिद लोगों के माल (नाहक़) चख जाते है और (लोगों को) ख़ुदा की राह से रोकते हैं और जो लोग सोना और चाँदी जमा करते जाते हैं और उसको ख़ुदा की राह में खर्च नहीं करते तो (ऐ रसूल) उन को दर्दनाक अज़ाब की ख़ुशखबरी सुना दो
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अनुवाद — अत-तौबा 32

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Tuesday, August 18, 2026

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