यूनुस · 86/109
अनुवाद उच्चारण — यूनुस
وَنَجِّنَا بِرَحْمَتِكَ مِنَ الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ ۝٨٦
Wa najjinaa birahmatika minal qawmil kaafireen
📖 हिंदी अर्थ
और अपनी रहमत से हमें इन काफ़िर लोगों (के नीचे) से नजात दे
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • नज्जिना (नजात दे): हमें मुक्त कर दे, छुटकारा दे।
  • बिरहमतिक: अपनी दया और कृपा से।
  • अल-क़ौमिल काफ़िरीन: काफ़िर लोग, अर्थात जो अल्लाह की एकता और तेरे रसूल पर ईमान नहीं लाते।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) और उनकी क़ौम के ईमानवाले लोग, फ़िरऔन के अत्याचार और ज़ुल्म से तंग आकर अल्लाह से दुआ करते हैं। वे कहते हैं: "ऐ हमारे रब! हमें अपनी रहमत से इन काफ़िरों के चंगुल से नजात दे।" यहाँ "रहमत" का ज़िक्र इसलिए किया गया कि अल्लाह की रहमत ही वह चीज़ है जो बंदों को मुसीबतों से बचाती है और उनके काम आसान करती है। ये लोग फ़िरऔन और उसके सरदारों के हाथों बहुत सताए गए थे—उनसे ज़बरदस्ती कठोर काम कराए जाते थे, उनके बच्चों को मारा जाता था और उन्हें तरह-तरह की यातनाएँ दी जाती थीं। इसलिए उन्होंने अल्लाह से दुआ की कि हमें इन काफ़िरों की कैद से, उनके ज़ुल्म से और उनके मक्र (चाल) से अपनी रहमत के ज़रिए छुटकारा दे। यह दुआ उनकी कमज़ोरी और अल्लाह पर पूर्ण भरोसे का प्रतीक है—वे जानते थे कि नजात केवल अल्लाह ही दे सकता है, और उसकी रहमत ही सबसे बड़ा सहारा है।

फ़ायदे (सबक):

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि जब इंसान किसी मुसीबत या ज़ुल्म में फँस जाए, तो उसे अल्लाह से दुआ करनी चाहिए, क्योंकि अल्लाह ही सच्चा मददगार और नजात देने वाला है।
  2. अल्लाह की रहमत पर भरोसा रखना चाहिए—वह रहमत जो हर मुश्किल को आसान कर सकती है और हर दुश्मन के मक्र से बचा सकती है।
  3. यह दुआ हमें सिखाती है कि काफ़िरों और ज़ालिमों से अलग होने और उनके ज़ुल्म से निकलने की कोशिश करनी चाहिए, और यह भी कि अल्लाह अपने नेक बंदों को हमेशा राहत देता है, जैसे उसने मूसा (अलैहिस्सलाम) और उनकी क़ौम को फ़िरऔन से छुटकारा दिलाया।
  4. इस आयत से हमें यह भी सीख मिलती है कि दुआ में अल्लाह की रहमत का वास्ता देना बहुत पसंदीदा है, क्योंकि रहमत ही अल्लाह की सबसे बड़ी सिफ़त है जो उसके बंदों को गले लगाती है।
🎧 सुनें

📜 आयत 84-88 — यूनुस

84وَقَالَ مُوسَىٰ يَا قَوْمِ إِن كُنتُمْ آمَنتُم بِاللَّهِ فَعَلَيْهِ تَوَكَّلُوا إِن كُنتُم مُّسْلِمِينَ
और मूसा ने कहा ऐ मेरी क़ौम अगर तुम (सच्चे दिल से) ख़ुदा पर ईमान ला चुके तो अगर तुम फरमाबरदार हो तो बस उसी पर भरोसा करो
85فَقَالُوا عَلَى اللَّهِ تَوَكَّلْنَا رَبَّنَا لَا تَجْعَلْنَا فِتْنَةً لِّلْقَوْمِ الظَّالِمِينَ
उस पर उन लोगों ने अर्ज़ की हमने तो ख़ुदा ही पर भरोसा कर लिया है और दुआ की कि ऐ हमारे पालने वाले तू हमें ज़ालिम लोगों का (ज़रिया) इम्तिहान न बना
86وَنَجِّنَا بِرَحْمَتِكَ مِنَ الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ
और अपनी रहमत से हमें इन काफ़िर लोगों (के नीचे) से नजात दे
87وَأَوْحَيْنَا إِلَىٰ مُوسَىٰ وَأَخِيهِ أَن تَبَوَّءَا لِقَوْمِكُمَا بِمِصْرَ بُيُوتًا وَاجْعَلُوا بُيُوتَكُمْ قِبْلَةً وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ ۗ وَبَشِّرِ الْمُؤْمِنِينَ
और हमने मूसा और उनके भाई (हारुन) के पास 'वही' भेजी कि मिस्र में अपनी क़ौम के (रहने सहने के) लिए घर बना डालो और अपने अपने घरों ही को मस्जिदें क़रार दे लो और पाबन्दी से नमाज़ पढ़ों और मोमिनीन को (नजात का) खुशख़बरी दे दो
88وَقَالَ مُوسَىٰ رَبَّنَا إِنَّكَ آتَيْتَ فِرْعَوْنَ وَمَلَأَهُ زِينَةً وَأَمْوَالًا فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا رَبَّنَا لِيُضِلُّوا عَن سَبِيلِكَ ۖ رَبَّنَا اطْمِسْ عَلَىٰ أَمْوَالِهِمْ وَاشْدُدْ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ فَلَا يُؤْمِنُوا حَتَّىٰ يَرَوُا الْعَذَابَ الْأَلِيمَ
और मूसा ने अर्ज़ की ऐ हमारे पालने वाले तूने फिरऔन और उसके सरदारों को दुनिया की ज़िन्दगी में (बड़ी) आराइश और दौलत दे रखी है (क्या तूने ये सामान इस लिए अता किया है) ताकि ये लोग तेरे रास्तें से लोगों को बहकाएं परवरदिगार तू उनके माल (दौलत) को ग़ारत (बरबाद) कर दे और उनके दिलों पर सख्ती कर (क्योंकि) जब तक ये लोग तकलीफ देह अज़ाब न देख लेगें ईमान न लाएगें
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अनुवाद — यूनुस 86

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Tuesday, August 18, 2026

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