हूद · 88/123
अनुवाद उच्चारण — हूद
قَالَ يَا قَوْمِ أَرَأَيْتُمْ إِن كُنتُ عَلَىٰ بَيِّنَةٍ مِّن رَّبِّي وَرَزَقَنِي مِنْهُ رِزْقًا حَسَنًا ۚ وَمَا أُرِيدُ أَنْ أُخَالِفَكُمْ إِلَىٰ مَا أَنْهَاكُمْ عَنْهُ ۚ إِنْ أُرِيدُ إِلَّا الْإِصْلَاحَ مَا اسْتَطَعْتُ ۚ وَمَا تَوْفِيقِي إِلَّا بِاللَّهِ ۚ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَإِلَيْهِ أُنِيبُ ۝٨٨
Qaala yaa qawmi ara`aitum in kuntu `alaa baiyinatim mir Rabbee wa razaqanee minhu rizqan hasanaa; wa maaa ureedu an ukhaalifakum ilaa maaa anhaakum `anh; in ureedu illal islaaha mastata`t; wa maa tawfeeqeee illaa billaah; `alaihi tawakkaltu wa ilaihi uneeb
📖 हिंदी अर्थ
शुएब ने कहा ऐ मेरी क़ौम अगर मै अपने परवरदिगार की तरफ से रौशन दलील पर हूँ और उसने मुझे (हलाल) रोज़ी खाने को दी है (तो मै भी तुम्हारी तरह हराम खाने लगूँ) और मै तो ये नहीं चाहता कि जिस काम से तुम को रोकूँ तुम्हारे बर ख़िलाफ (बदले) आप उसको करने लगूं मैं तो जहाँ तक मुझे बन पड़े इसलाह (भलाई) के सिवा (कुछ और) चाहता ही नहीं और मेरी ताईद तो ख़ुदा के सिवा और किसी से हो ही नहीं सकती इस पर मैने भरोसा कर लिया है और उसी की तरफ रुज़ू करता हूँ

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अनुवाद — Tafsir

### معاني الكلمات

  • بَيِّنَةٍ: स्पष्ट प्रमाण, दलील और साक्ष्य जो सत्य को प्रकट करे।
  • رِزْقًا حَسَنًا: पवित्र, हलाल और उत्तम आजीविका।
  • أُخَالِفَكُمْ: मैं तुम्हारे विपरीत चलूँ, यानी जिस काम से तुम्हें रोकूँ, उसे स्वयं करूँ।
  • إِصْلَاحَ: सुधारना, भलाई और सही रास्ते पर लाना।
  • تَوْفِيقِي: मेरी सफलता और भलाई की तौफीक (सहायता)।
  • أُنِيبُ: मैं रुजू करता हूँ, लौटता हूँ (अल्लाह की ओर)।

### تفسير الآية

हज़रत शुऐब (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम से कहा: "ऐ मेरी क़ौम! ज़रा सोचो, अगर मैं अपने रब की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण (बैय्यना) पर हूँ — यानी मुझे उसकी तरफ़ से इल्म, नबुव्वत और सच्चाई की स्पष्ट दलील मिली है — और उसने मुझे अपनी ओर से पवित्र और उत्तम आजीविका (हलाल रिज़्क़) दी है, तो क्या यह मुनासिब है कि मैं उसके एहसानों के बावजूद उसकी नाफ़रमानी करूँ और हलाल को हराम में मिलाऊँ?"

फिर उन्होंने अपनी सच्ची नीयत और ईमानदारी बयान की: "मैं यह नहीं चाहता कि जिन कामों से तुम्हें रोकता हूँ, उन्हें ख़ुद करके तुम्हारे ख़िलाफ़ चलूँ। मैं तुम्हें जिस चीज़ से बचाता हूँ, उससे मैं ख़ुद भी दूर रहता हूँ। मेरा मक़सद सिर्फ़ तुम्हारी इस्लाह (सुधार) है — जहाँ तक मुझसे हो सके, मैं तुम्हें तौहीद और अल्लाह की इताअत की तरफ़ बुलाता हूँ और तुम्हारे दुनिया और आख़िरत की भलाई चाहता हूँ।"

आख़िर में उन्होंने अपनी पूरी भरोसा अल्लाह पर जताया: "मेरी तौफीक़ (सफलता) अल्लाह ही के हाथ में है, मैं ख़ुद अपनी भलाई नहीं कर सकता, तो दूसरों की भलाई कैसे कर सकता हूँ? मैंने उसी पर भरोसा किया है, और उसी की तरफ़ मैं हर मामले में रुजू करता हूँ — तौबा करके और अपने सारे काम उसे सौंपकर।"


### फ़ायदे (فوائد)

  1. दावत का अंदाज़: हज़रत शुऐब (अलैहिस्सलाम) का अंदाज़ बताता है कि नेकी की दावत में नर्मी, मुहब्बत और सच्ची चिंता होनी चाहिए, न कि सख़्ती और तकब्बुर।
  2. अमल और दावत में एकता: दावत देने वाले को ख़ुद उस पर अमल करना चाहिए। जो दूसरों को रोकता है, उसे ख़ुद उससे बचना चाहिए — यह सबसे बड़ी सच्चाई की निशानी है।
  3. इख़लास (नियत की पवित्रता): हर अच्छे काम में नीयत सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा और लोगों की भलाई होनी चाहिए, न कि दुनियावी मतलब।
  4. तौफीक़ अल्लाह से है: इंसान को अपनी ताक़त पर नाज़ नहीं करना चाहिए, बल्कि हर काम में अल्लाह से मदद माँगनी चाहिए। सफलता उसी के हाथ में है।
  5. तवक्कुल और इनाबत: मुसलमान की ज़िंदगी का निचोड़ यही है — अल्लाह पर भरोसा और हर मामले में उसी की तरफ़ लौटना। यही सच्ची इबादत और सब्र की मिसाल है।
  6. हलाल रिज़्क़ की अहमियत: हलाल कमाई और पवित्र जीवन अल्लाह का बड़ा एहसान है, और इसका शुक्र यह है कि इसे हराम से न मिलाया जाए।


📜 आयत 86-90 — हूद

86بَقِيَّتُ اللَّهِ خَيْرٌ لَّكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ ۚ وَمَا أَنَا عَلَيْكُم بِحَفِيظٍ
अगर तुम सच्चे मोमिन हो तो ख़ुदा का बक़िया तुम्हारे वास्ते कही अच्छा है और मैं तो कुछ तुम्हारा निगेहबान नहीं
87قَالُوا يَا شُعَيْبُ أَصَلَاتُكَ تَأْمُرُكَ أَن نَّتْرُكَ مَا يَعْبُدُ آبَاؤُنَا أَوْ أَن نَّفْعَلَ فِي أَمْوَالِنَا مَا نَشَاءُ ۖ إِنَّكَ لَأَنتَ الْحَلِيمُ الرَّشِيدُ
वह लोग कहने लगे ऐ शुएब क्या तुम्हारी नमाज़ (जिसे तुम पढ़ा करते हो) तुम्हें ये सिखाती है कि जिन (बुतों) की परसतिश हमारे बाप दादा करते आए उन्हें हम छोड़ बैठें या हम अपने मालों में जो कुछ चाहे कर बैठें तुम ही तो बस एक बुर्दबार और समझदार (रह गए) हो
88قَالَ يَا قَوْمِ أَرَأَيْتُمْ إِن كُنتُ عَلَىٰ بَيِّنَةٍ مِّن رَّبِّي وَرَزَقَنِي مِنْهُ رِزْقًا حَسَنًا ۚ وَمَا أُرِيدُ أَنْ أُخَالِفَكُمْ إِلَىٰ مَا أَنْهَاكُمْ عَنْهُ ۚ إِنْ أُرِيدُ إِلَّا الْإِصْلَاحَ مَا اسْتَطَعْتُ ۚ وَمَا تَوْفِيقِي إِلَّا بِاللَّهِ ۚ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَإِلَيْهِ أُنِيبُ
शुएब ने कहा ऐ मेरी क़ौम अगर मै अपने परवरदिगार की तरफ से रौशन दलील पर हूँ और उसने मुझे (हलाल) रोज़ी खाने को दी है (तो मै भी तुम्हारी तरह हराम खाने लगूँ) और मै तो ये नहीं चाहता कि जिस काम से तुम को रोकूँ तुम्हारे बर ख़िलाफ (बदले) आप उसको करने लगूं मैं तो जहाँ तक मुझे बन पड़े इसलाह (भलाई) के सिवा (कुछ और) चाहता ही नहीं और मेरी ताईद तो ख़ुदा के सिवा और किसी से हो ही नहीं सकती इस पर मैने भरोसा कर लिया है और उसी की तरफ रुज़ू करता हूँ
89وَيَا قَوْمِ لَا يَجْرِمَنَّكُمْ شِقَاقِي أَن يُصِيبَكُم مِّثْلُ مَا أَصَابَ قَوْمَ نُوحٍ أَوْ قَوْمَ هُودٍ أَوْ قَوْمَ صَالِحٍ ۚ وَمَا قَوْمُ لُوطٍ مِّنكُم بِبَعِيدٍ
और ऐ मेरी क़ौमे मेरी ज़िद कही तुम से ऐसा जुर्म न करा दे जैसी मुसीबत क़ौम नूह या हूद या सालेह पर नाज़िल हुई थी वैसी ही मुसीबत तुम पर भी आ पड़े और लूत की क़ौम (का ज़माना) तो (कुछ ऐसा) तुमसे दूर नहीं (उन्हीं के इबरत हासिल करो
90وَاسْتَغْفِرُوا رَبَّكُمْ ثُمَّ تُوبُوا إِلَيْهِ ۚ إِنَّ رَبِّي رَحِيمٌ وَدُودٌ
और अपने परवरदिगार से अपनी मग़फिरत की दुआ माँगों फिर उसी की बारगाह में तौबा करो बेशक मेरा परवरदिगार बड़ा मोहब्बत वाला मेहरबान है
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Tuesday, August 18, 2026

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