हूद · 89/123
अनुवाद उच्चारण — हूद
وَيَا قَوْمِ لَا يَجْرِمَنَّكُمْ شِقَاقِي أَن يُصِيبَكُم مِّثْلُ مَا أَصَابَ قَوْمَ نُوحٍ أَوْ قَوْمَ هُودٍ أَوْ قَوْمَ صَالِحٍ ۚ وَمَا قَوْمُ لُوطٍ مِّنكُم بِبَعِيدٍ ۝٨٩
Wa yaa qawmi laa yajri mannakum shiqaaqeee ai yuseebakum mislu maaa asaaba qawma Noohin aw qawma Hoodin aw qawma Saalih; wa maa qawmu Lootim minkum biba`eed
📖 हिंदी अर्थ
और ऐ मेरी क़ौमे मेरी ज़िद कही तुम से ऐसा जुर्म न करा दे जैसी मुसीबत क़ौम नूह या हूद या सालेह पर नाज़िल हुई थी वैसी ही मुसीबत तुम पर भी आ पड़े और लूत की क़ौम (का ज़माना) तो (कुछ ऐसा) तुमसे दूर नहीं (उन्हीं के इबरत हासिल करो
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • لَا يَجْرِمَنَّكُمْ – तुम्हें किसी ऐसे काम पर न उभारे, न प्रेरित करे।
  • شِقَاقِي – मेरी दुश्मनी, मेरे विरोध और मेरे मार्ग से अलग होने की वजह से पैदा हुई नाराज़गी।
  • أَن يُصِيبَكُم – यह कि तुम पर आ पड़े (अज़ाब)।
  • بِبَعِيدٍ – दूर नहीं, बल्कि बहुत करीब है।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मेरी दुश्मनी और मेरे विरोध का यह मतलब हरगिज़ नहीं होना चाहिए कि तुम हठ और ज़िद पर अड़ जाओ और सच्चाई को क़बूल करने से इनकार कर दो। मेरी नाराज़गी तुम्हें उस रास्ते पर न ले जाए जो तुम्हारे लिए तबाही का सबब बने। सावधान हो जाओ, कहीं ऐसा न हो कि तुम पर भी वही अज़ाब आ पड़े जो नूह की क़ौम पर आया था (जो तूफ़ान में डूब गई), या हूद की क़ौम 'आद पर आया था (जो तेज़ हवा से हलाक हुई), या सालिह की क़ौम समूद पर आया था (जो भयंकर चीख़ से नष्ट हो गई)। और लूत की क़ौम तुमसे दूर नहीं है – न समय के लिहाज़ से और न जगह के लिहाज़ से। उनका विनाश तो अभी हाल का है और उनके इलाक़े तुम्हारे पास ही हैं। तुमने खुद देखा और सुना है कि उन पर क्या गुज़री, इसलिए उनसे सबक़ सीखो और अपनी स्थिति पर ग़ौर करो।


फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. नफ़रत और दुश्मनी को सच्चाई क़बूल करने में रुकावट न बनने दें – इंसान को चाहिए कि सच्चाई को सिर्फ़ इसलिए न ठुकराए क्योंकि वह किसी ख़ास शख्स से नाराज़ है। हक़ को हक़ समझकर क़बूल करना चाहिए, चाहे वह किसी के ज़रिए आए।
  2. पिछली उम्मतों का अंजाम हमारे लिए नसीहत है – अल्लाह ने क़ुरआन में पुरानी क़ौमों के हलाक होने के वाक़ियात इसलिए बयान किए हैं ताकि हम उनसे इबरत हासिल करें और उन गलतियों से बचें जिनकी वजह से वे तबाह हुए।
  3. अज़ाब की करीबी का एहसास – इंसान कभी-कभी सोचता है कि अल्लाह का अज़ाब बहुत दूर है, लेकिन यह आयत बताती है कि अज़ाब बिल्कुल करीब हो सकता है – जैसे लूत की क़ौम का विनाश शुएब की क़ौम के लिए बहुत पास था। इसलिए हमें हर वक़्त अपने आपको सुधारने की कोशिश करनी चाहिए।
  4. तौबा का दरवाज़ा हमेशा खुला है – शुएब अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम को अज़ाब से डराने के साथ-साथ तौबा की तरफ़ बुलाया। यह सिखाता है कि अल्लाह की रहमत बहुत वसीअ है और जब तक इंसान ज़िंदा है, उसके लिए पलट आने का मौक़ा मौजूद है।
  5. इस्लाम सिर्फ़ डराने का नहीं, बल्कि सुधारने का दीन है – इस आयत में डर और उम्मीद दोनों हैं। डर इसलिए कि गलत रास्ते पर चलने का अंजाम बुरा है, और उम्मीद इसलिए कि अगर क़ौम सुधर जाए तो अल्लाह का अज़ाब टल सकता है। यही इस्लाम की खूबसूरती है कि वह इंसान को अंधेरे से निकालकर रोशनी की तरफ़ ले जाता है।
🎧 सुनें

📜 आयत 87-91 — हूद

87قَالُوا يَا شُعَيْبُ أَصَلَاتُكَ تَأْمُرُكَ أَن نَّتْرُكَ مَا يَعْبُدُ آبَاؤُنَا أَوْ أَن نَّفْعَلَ فِي أَمْوَالِنَا مَا نَشَاءُ ۖ إِنَّكَ لَأَنتَ الْحَلِيمُ الرَّشِيدُ
वह लोग कहने लगे ऐ शुएब क्या तुम्हारी नमाज़ (जिसे तुम पढ़ा करते हो) तुम्हें ये सिखाती है कि जिन (बुतों) की परसतिश हमारे बाप दादा करते आए उन्हें हम छोड़ बैठें या हम अपने मालों में जो कुछ चाहे कर बैठें तुम ही तो बस एक बुर्दबार और समझदार (रह गए) हो
88قَالَ يَا قَوْمِ أَرَأَيْتُمْ إِن كُنتُ عَلَىٰ بَيِّنَةٍ مِّن رَّبِّي وَرَزَقَنِي مِنْهُ رِزْقًا حَسَنًا ۚ وَمَا أُرِيدُ أَنْ أُخَالِفَكُمْ إِلَىٰ مَا أَنْهَاكُمْ عَنْهُ ۚ إِنْ أُرِيدُ إِلَّا الْإِصْلَاحَ مَا اسْتَطَعْتُ ۚ وَمَا تَوْفِيقِي إِلَّا بِاللَّهِ ۚ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَإِلَيْهِ أُنِيبُ
शुएब ने कहा ऐ मेरी क़ौम अगर मै अपने परवरदिगार की तरफ से रौशन दलील पर हूँ और उसने मुझे (हलाल) रोज़ी खाने को दी है (तो मै भी तुम्हारी तरह हराम खाने लगूँ) और मै तो ये नहीं चाहता कि जिस काम से तुम को रोकूँ तुम्हारे बर ख़िलाफ (बदले) आप उसको करने लगूं मैं तो जहाँ तक मुझे बन पड़े इसलाह (भलाई) के सिवा (कुछ और) चाहता ही नहीं और मेरी ताईद तो ख़ुदा के सिवा और किसी से हो ही नहीं सकती इस पर मैने भरोसा कर लिया है और उसी की तरफ रुज़ू करता हूँ
89وَيَا قَوْمِ لَا يَجْرِمَنَّكُمْ شِقَاقِي أَن يُصِيبَكُم مِّثْلُ مَا أَصَابَ قَوْمَ نُوحٍ أَوْ قَوْمَ هُودٍ أَوْ قَوْمَ صَالِحٍ ۚ وَمَا قَوْمُ لُوطٍ مِّنكُم بِبَعِيدٍ
और ऐ मेरी क़ौमे मेरी ज़िद कही तुम से ऐसा जुर्म न करा दे जैसी मुसीबत क़ौम नूह या हूद या सालेह पर नाज़िल हुई थी वैसी ही मुसीबत तुम पर भी आ पड़े और लूत की क़ौम (का ज़माना) तो (कुछ ऐसा) तुमसे दूर नहीं (उन्हीं के इबरत हासिल करो
90وَاسْتَغْفِرُوا رَبَّكُمْ ثُمَّ تُوبُوا إِلَيْهِ ۚ إِنَّ رَبِّي رَحِيمٌ وَدُودٌ
और अपने परवरदिगार से अपनी मग़फिरत की दुआ माँगों फिर उसी की बारगाह में तौबा करो बेशक मेरा परवरदिगार बड़ा मोहब्बत वाला मेहरबान है
91قَالُوا يَا شُعَيْبُ مَا نَفْقَهُ كَثِيرًا مِّمَّا تَقُولُ وَإِنَّا لَنَرَاكَ فِينَا ضَعِيفًا ۖ وَلَوْلَا رَهْطُكَ لَرَجَمْنَاكَ ۖ وَمَا أَنتَ عَلَيْنَا بِعَزِيزٍ
और वह लोग कहने लगे ऐ शुएब जो बाते तुम कहते हो उनमें से अक्सर तो हमारी समझ ही में नहीं आयी और इसमें तो शक नहीं कि हम तुम्हें अपने लोगों में बहुत कमज़ोर समझते है और अगर तुम्हारा क़बीला न होता तो हम तुम को (कब का) संगसार कर चुके होते और तुम तो हम पर किसी तरह ग़ालिब नहीं आ सकते
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सूरा आयत 89/123 — हूद هود (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: हूद सुनें, हूद अनुवाद, हूद mp3, हूद pdf. आयत 87–91. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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