हूद · 87/123
अनुवाद उच्चारण — हूद
قَالُوا يَا شُعَيْبُ أَصَلَاتُكَ تَأْمُرُكَ أَن نَّتْرُكَ مَا يَعْبُدُ آبَاؤُنَا أَوْ أَن نَّفْعَلَ فِي أَمْوَالِنَا مَا نَشَاءُ ۖ إِنَّكَ لَأَنتَ الْحَلِيمُ الرَّشِيدُ ۝٨٧
Qaaloo yaa Shu`aybu asalaatuka taamuruka an natruka maa ya`budu aabaaa`unaaa aw an naf`ala feee amwaalinaa maa nashaaa`oo innaka la antal haleemur rasheed
📖 हिंदी अर्थ
वह लोग कहने लगे ऐ शुएब क्या तुम्हारी नमाज़ (जिसे तुम पढ़ा करते हो) तुम्हें ये सिखाती है कि जिन (बुतों) की परसतिश हमारे बाप दादा करते आए उन्हें हम छोड़ बैठें या हम अपने मालों में जो कुछ चाहे कर बैठें तुम ही तो बस एक बुर्दबार और समझदार (रह गए) हो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَصَلَاتُكَ (क्या तुम्हारी नमाज़): यहाँ "صلاة" से आशय शुऐब अलैहिस्सलाम की वह नमाज़ है जो वे अल्लाह की इबादत के लिए पढ़ते थे।
  • تَأْمُرُكَ (तुम्हें आदेश देती है): अर्थात क्या तुम्हारी नमाज़ तुम्हें यह हुक्म देती है।
  • الْحَلِيمُ (बहुत सहनशील/धैर्यवान): यहाँ क़ौम ने व्यंग्य के तौर पर कहा, जबकि इसका अर्थ है सहनशील और समझदार।
  • الرَّشِيدُ (बुद्धिमान/सही राह पर चलने वाला): यह भी व्यंग्य में कहा गया, जबकि असल अर्थ है भलाई की ओर मार्गदर्शन पाने वाला।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम को शिर्क, बेईमानी, नाप-तौल में कमी करने और दूसरे बुरे कामों से रोका, तो उनकी क़ौम ने अत्यधिक उपहास और मज़ाक के अंदाज़ में कहा: "ऐ शुऐब! क्या तुम्हारी वह नमाज़ जो तुम पढ़ते हो, तुम्हें यह हुक्म देती है कि हम उन मूर्तियों को छोड़ दें जिनकी पूजा हमारे बाप-दादा करते आए हैं, और यह भी कि हम अपने मालों में अपनी मर्ज़ी से तसर्रुफ़ (इस्तेमाल) न करें? हम जो चाहें अपने धन के साथ करें—चाहे नाप-तौल में कमी करें या दूसरे हथकंडे अपनाएँ।"

फिर उन्होंने अत्यधिक व्यंग्य और तंज़ के साथ कहा: "तुम तो बड़े ही सहनशील और बुद्धिमान हो!" उनका मतलब यह था कि हम तुम्हें पहले से एक समझदार और भले इंसान के रूप में जानते थे, लेकिन अब तुम्हारी यह नमाज़ और यह दावत तुम्हें ऐसी बातें सिखा रही है जो हमारे लिए नामंज़ूर हैं। यानी वे उल्टे अर्थों में उसे "समझदार" कहकर उसका मज़ाक उड़ा रहे थे, जबकि असल में वे उसे बेवक़ूफ़ और गुमराह समझते थे। यह उनकी ज़िद, अहंकार और सच्चाई को न मानने की साफ़ दलील थी।

फ़ायदे (सबक):

  1. नमाज़ इंसान को बुराई, बेईमानी और गलत कामों से रोकती है, और यही उसका असली मक़सद है। जो नमाज़ इंसान को अच्छाई की तरफ न ले जाए, वह अधूरी है।
  2. सच्चाई की दावत देने वाले को मुख़ालिफ़ों के तंज़ और मज़ाक का सामना करना पड़ता है, लेकिन उसे सब्र और हिम्मत से काम लेना चाहिए।
  3. बाप-दादा की राह पर अंधी पैरवी करना और सिर्फ़ इसलिए सच्चाई न मानना कि हमारे बुज़ुर्ग ऐसा करते थे, यह एक बड़ी गुमराही है। इंसान को हक़ को हक़ समझना चाहिए, चाहे वह किसी से आए।
  4. अल्लाह के नबियों की दावत का नुक़्ता यह है कि इंसान अपने माल में अल्लाह की मरज़ी के मुताबिक़ खर्च करे और दूसरों के हक़ को नज़रअंदाज़ न करे। बेईमानी और धोखाधड़ी किसी भी सूरत में जायज़ नहीं।
  5. क़ौम का यह व्यंग्य भी दिखाता है कि हक़ की दावत को कमज़ोर करने के लिए लोग किस तरह तंज़ और उपहास का सहारा लेते हैं, लेकिन हक़ बातिल पर ग़ालिब आकर रहती है।


📜 आयत 85-89 — हूद

85وَيَا قَوْمِ أَوْفُوا الْمِكْيَالَ وَالْمِيزَانَ بِالْقِسْطِ ۖ وَلَا تَبْخَسُوا النَّاسَ أَشْيَاءَهُمْ وَلَا تَعْثَوْا فِي الْأَرْضِ مُفْسِدِينَ
और ऐ मेरी क़ौम पैमाने और तराज़ू ऌन्साफ़ के साथ पूरे पूरे रखा करो और लोगों को उनकी चीज़े कम न दिया करो और रुए ज़मीन में फसाद न फैलाते फिरो
86بَقِيَّتُ اللَّهِ خَيْرٌ لَّكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ ۚ وَمَا أَنَا عَلَيْكُم بِحَفِيظٍ
अगर तुम सच्चे मोमिन हो तो ख़ुदा का बक़िया तुम्हारे वास्ते कही अच्छा है और मैं तो कुछ तुम्हारा निगेहबान नहीं
87قَالُوا يَا شُعَيْبُ أَصَلَاتُكَ تَأْمُرُكَ أَن نَّتْرُكَ مَا يَعْبُدُ آبَاؤُنَا أَوْ أَن نَّفْعَلَ فِي أَمْوَالِنَا مَا نَشَاءُ ۖ إِنَّكَ لَأَنتَ الْحَلِيمُ الرَّشِيدُ
वह लोग कहने लगे ऐ शुएब क्या तुम्हारी नमाज़ (जिसे तुम पढ़ा करते हो) तुम्हें ये सिखाती है कि जिन (बुतों) की परसतिश हमारे बाप दादा करते आए उन्हें हम छोड़ बैठें या हम अपने मालों में जो कुछ चाहे कर बैठें तुम ही तो बस एक बुर्दबार और समझदार (रह गए) हो
88قَالَ يَا قَوْمِ أَرَأَيْتُمْ إِن كُنتُ عَلَىٰ بَيِّنَةٍ مِّن رَّبِّي وَرَزَقَنِي مِنْهُ رِزْقًا حَسَنًا ۚ وَمَا أُرِيدُ أَنْ أُخَالِفَكُمْ إِلَىٰ مَا أَنْهَاكُمْ عَنْهُ ۚ إِنْ أُرِيدُ إِلَّا الْإِصْلَاحَ مَا اسْتَطَعْتُ ۚ وَمَا تَوْفِيقِي إِلَّا بِاللَّهِ ۚ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَإِلَيْهِ أُنِيبُ
शुएब ने कहा ऐ मेरी क़ौम अगर मै अपने परवरदिगार की तरफ से रौशन दलील पर हूँ और उसने मुझे (हलाल) रोज़ी खाने को दी है (तो मै भी तुम्हारी तरह हराम खाने लगूँ) और मै तो ये नहीं चाहता कि जिस काम से तुम को रोकूँ तुम्हारे बर ख़िलाफ (बदले) आप उसको करने लगूं मैं तो जहाँ तक मुझे बन पड़े इसलाह (भलाई) के सिवा (कुछ और) चाहता ही नहीं और मेरी ताईद तो ख़ुदा के सिवा और किसी से हो ही नहीं सकती इस पर मैने भरोसा कर लिया है और उसी की तरफ रुज़ू करता हूँ
89وَيَا قَوْمِ لَا يَجْرِمَنَّكُمْ شِقَاقِي أَن يُصِيبَكُم مِّثْلُ مَا أَصَابَ قَوْمَ نُوحٍ أَوْ قَوْمَ هُودٍ أَوْ قَوْمَ صَالِحٍ ۚ وَمَا قَوْمُ لُوطٍ مِّنكُم بِبَعِيدٍ
और ऐ मेरी क़ौमे मेरी ज़िद कही तुम से ऐसा जुर्म न करा दे जैसी मुसीबत क़ौम नूह या हूद या सालेह पर नाज़िल हुई थी वैसी ही मुसीबत तुम पर भी आ पड़े और लूत की क़ौम (का ज़माना) तो (कुछ ऐसा) तुमसे दूर नहीं (उन्हीं के इबरत हासिल करो
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अनुवाद — हूद 87

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सूरा आयत 87/123 — हूद هود (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: हूद सुनें, हूद अनुवाद, हूद mp3, हूद pdf. आयत 85–89. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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