Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- أَصَلَاتُكَ (क्या तुम्हारी नमाज़): यहाँ "صلاة" से आशय शुऐब अलैहिस्सलाम की वह नमाज़ है जो वे अल्लाह की इबादत के लिए पढ़ते थे।
- تَأْمُرُكَ (तुम्हें आदेश देती है): अर्थात क्या तुम्हारी नमाज़ तुम्हें यह हुक्म देती है।
- الْحَلِيمُ (बहुत सहनशील/धैर्यवान): यहाँ क़ौम ने व्यंग्य के तौर पर कहा, जबकि इसका अर्थ है सहनशील और समझदार।
- الرَّشِيدُ (बुद्धिमान/सही राह पर चलने वाला): यह भी व्यंग्य में कहा गया, जबकि असल अर्थ है भलाई की ओर मार्गदर्शन पाने वाला।
तफ़सीर (व्याख्या):
जब हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम को शिर्क, बेईमानी, नाप-तौल में कमी करने और दूसरे बुरे कामों से रोका, तो उनकी क़ौम ने अत्यधिक उपहास और मज़ाक के अंदाज़ में कहा: "ऐ शुऐब! क्या तुम्हारी वह नमाज़ जो तुम पढ़ते हो, तुम्हें यह हुक्म देती है कि हम उन मूर्तियों को छोड़ दें जिनकी पूजा हमारे बाप-दादा करते आए हैं, और यह भी कि हम अपने मालों में अपनी मर्ज़ी से तसर्रुफ़ (इस्तेमाल) न करें? हम जो चाहें अपने धन के साथ करें—चाहे नाप-तौल में कमी करें या दूसरे हथकंडे अपनाएँ।"
फिर उन्होंने अत्यधिक व्यंग्य और तंज़ के साथ कहा: "तुम तो बड़े ही सहनशील और बुद्धिमान हो!" उनका मतलब यह था कि हम तुम्हें पहले से एक समझदार और भले इंसान के रूप में जानते थे, लेकिन अब तुम्हारी यह नमाज़ और यह दावत तुम्हें ऐसी बातें सिखा रही है जो हमारे लिए नामंज़ूर हैं। यानी वे उल्टे अर्थों में उसे "समझदार" कहकर उसका मज़ाक उड़ा रहे थे, जबकि असल में वे उसे बेवक़ूफ़ और गुमराह समझते थे। यह उनकी ज़िद, अहंकार और सच्चाई को न मानने की साफ़ दलील थी।
फ़ायदे (सबक):
- नमाज़ इंसान को बुराई, बेईमानी और गलत कामों से रोकती है, और यही उसका असली मक़सद है। जो नमाज़ इंसान को अच्छाई की तरफ न ले जाए, वह अधूरी है।
- सच्चाई की दावत देने वाले को मुख़ालिफ़ों के तंज़ और मज़ाक का सामना करना पड़ता है, लेकिन उसे सब्र और हिम्मत से काम लेना चाहिए।
- बाप-दादा की राह पर अंधी पैरवी करना और सिर्फ़ इसलिए सच्चाई न मानना कि हमारे बुज़ुर्ग ऐसा करते थे, यह एक बड़ी गुमराही है। इंसान को हक़ को हक़ समझना चाहिए, चाहे वह किसी से आए।
- अल्लाह के नबियों की दावत का नुक़्ता यह है कि इंसान अपने माल में अल्लाह की मरज़ी के मुताबिक़ खर्च करे और दूसरों के हक़ को नज़रअंदाज़ न करे। बेईमानी और धोखाधड़ी किसी भी सूरत में जायज़ नहीं।
- क़ौम का यह व्यंग्य भी दिखाता है कि हक़ की दावत को कमज़ोर करने के लिए लोग किस तरह तंज़ और उपहास का सहारा लेते हैं, लेकिन हक़ बातिल पर ग़ालिब आकर रहती है।
📜 आयत 85-89 — सूरा हूद
अनुवाद — हूद 87
सूरा हूद आयत 87 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : वह लोग कहने लगे ऐ शुएब क्या तुम्हारी नमाज़ (जिसे…सूरा आयत 87/123 — सूरा हूद هود (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा हूद सुनें, सूरा हूद अनुवाद, सूरा हूद mp3, सूरा हूद pdf. आयत 85–89. हिंदी अर्थ: اردو.
सूरा हूद
पवित्र क़ुरआन
Thursday, October 1, 2026
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