हूद · 91/123
अनुवाद उच्चारण — हूद
قَالُوا يَا شُعَيْبُ مَا نَفْقَهُ كَثِيرًا مِّمَّا تَقُولُ وَإِنَّا لَنَرَاكَ فِينَا ضَعِيفًا ۖ وَلَوْلَا رَهْطُكَ لَرَجَمْنَاكَ ۖ وَمَا أَنتَ عَلَيْنَا بِعَزِيزٍ ۝٩١
Qaaloo yaa Shu`aibu maa nafqahu kaseeram mimmaa taqoolu wa innaa lanaraaka feenaa da`eefanw wa law laa rahtuka larajamnaaka wa maaa anta `alainaa bi`azeez
📖 हिंदी अर्थ
और वह लोग कहने लगे ऐ शुएब जो बाते तुम कहते हो उनमें से अक्सर तो हमारी समझ ही में नहीं आयी और इसमें तो शक नहीं कि हम तुम्हें अपने लोगों में बहुत कमज़ोर समझते है और अगर तुम्हारा क़बीला न होता तो हम तुम को (कब का) संगसार कर चुके होते और तुम तो हम पर किसी तरह ग़ालिब नहीं आ सकते

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • نَفْقَهُ: हम समझते हैं।
  • ضَعِيفًا: कमज़ोर, जिसका कोई दबदबा न हो।
  • رَهْطُكَ: आपके क़बीले के लोग, आपके रिश्तेदार।
  • لَرَجَمْنَاكَ: हम आपको पत्थर मारकर हलाक कर देते।
  • بِعَزِيزٍ: प्रतिष्ठित, शक्तिशाली, जिसकी इज़्ज़त की वजह से उसे छेड़ा न जाए।

तफ़सीर:

जब हज़रत शुएब (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम को तौहीद, अदल और ईमान की दावत दी और उन्हें नाप-तौल में कमी करने, लोगों को उनका हक़ मारने और ज़मीन में फ़साद फैलाने से रोका, तो उनकी क़ौम के सरकश लोगों ने जवाब में कहा: "ऐ शुएब! हम तुम्हारी अधिकतर बातों को समझते ही नहीं।" यह उनकी तरफ़ से बड़ी बेअदबी और तौहीन थी, क्योंकि वे उनकी बात को समझने से इनकार कर रहे थे, जबकि हक़ बात साफ़ और समझने योग्य थी।

फिर उन्होंने कहा: "और हम तुम्हें अपने बीच कमज़ोर ही देखते हैं।" यानी उनकी नज़र में शुएब (अलैहिस्सलाम) की कोई हैसियत नहीं थी, न वे उनके बड़े थे और न ही उनका कोई दबदबा था। वे उन्हें एक अकेला और बेसहारा इंसान समझते थे।

इसके बाद उन्होंने धमकी दी: "और अगर तुम्हारे क़बीले के लोग न होते, तो हम तुम्हें पत्थर मारकर हलाक कर देते।" यानी उन्होंने साफ़ कहा कि तुम्हारी जान इसलिए बची है क्योंकि तुम्हारे रिश्तेदार हमारे हम-मज़हब हैं और हम उनकी वजह से तुम्हें नहीं मारते। आख़िर में उन्होंने कहा: "और तुम हमारे नज़दीक कोई इज़्ज़त वाले नहीं हो।" यानी तुम्हारी अपनी कोई हैसियत नहीं जिसकी वजह से हम तुम्हें छोड़ दें, बल्कि तुम्हारे क़बीले की वजह से हमने तुम्हें छोड़ा है।

यह क़ौम की सख़्त दिली, घमंड और हक़ से मुँह मोड़ने की सबसे बड़ी मिसाल है। उन्होंने नबी की बात को न सिर्फ़ नकारा, बल्कि उन्हें कमज़ोर और बेइज़्ज़त कहा और उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी।

फ़ायदे:

  1. नबियों और दावत देने वालों को अपनी क़ौम की तरफ़ से तकलीफ़, तौहीन और धमकियों का सामना करना पड़ता है, लेकिन वे सब्र करते हैं और अपनी दावत पर डटे रहते हैं। यह हमारे लिए सबक़ है कि हक़ की राह में मुश्किलें आएँ तो हिम्मत न हारें।
  2. क़ौम का यह अंदाज़ कि "हम तुम्हारी बात समझते नहीं" — यह हक़ से इनकार की एक पुरानी चाल है। हमें चाहिए कि हक़ बात को समझने की कोशिश करें, न कि घमंड और अकड़ की वजह से उसे नकार दें।
  3. इंसान की इज़्ज़त और हैसियत अल्लाह के पास उसके ईमान और अमल से होती है, न कि दुनियावी रुतबे और क़बीले से। क़ौम ने नबी को कमज़ोर कहा, लेकिन अल्लाह ने उन्हें सबसे बड़ी इज़्ज़त दी।
  4. यह आयत बताती है कि रिश्तेदारी और क़बीले का लिहाज़ भी कभी-कभी इंसान को हक़ के रास्ते से रोकने का ज़रिया बनता है, लेकिन हमें सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा को सामने रखना चाहिए।
  5. नबी की दावत का असर क़ौम के अक्सर लोगों पर न पड़े, यह उनकी सच्चाई को कम नहीं करता। हक़ बात हमेशा हक़ रहती है, चाहे उसे कितने ही लोग नकार दें।


📜 आयत 89-93 — हूद

89وَيَا قَوْمِ لَا يَجْرِمَنَّكُمْ شِقَاقِي أَن يُصِيبَكُم مِّثْلُ مَا أَصَابَ قَوْمَ نُوحٍ أَوْ قَوْمَ هُودٍ أَوْ قَوْمَ صَالِحٍ ۚ وَمَا قَوْمُ لُوطٍ مِّنكُم بِبَعِيدٍ
और ऐ मेरी क़ौमे मेरी ज़िद कही तुम से ऐसा जुर्म न करा दे जैसी मुसीबत क़ौम नूह या हूद या सालेह पर नाज़िल हुई थी वैसी ही मुसीबत तुम पर भी आ पड़े और लूत की क़ौम (का ज़माना) तो (कुछ ऐसा) तुमसे दूर नहीं (उन्हीं के इबरत हासिल करो
90وَاسْتَغْفِرُوا رَبَّكُمْ ثُمَّ تُوبُوا إِلَيْهِ ۚ إِنَّ رَبِّي رَحِيمٌ وَدُودٌ
और अपने परवरदिगार से अपनी मग़फिरत की दुआ माँगों फिर उसी की बारगाह में तौबा करो बेशक मेरा परवरदिगार बड़ा मोहब्बत वाला मेहरबान है
91قَالُوا يَا شُعَيْبُ مَا نَفْقَهُ كَثِيرًا مِّمَّا تَقُولُ وَإِنَّا لَنَرَاكَ فِينَا ضَعِيفًا ۖ وَلَوْلَا رَهْطُكَ لَرَجَمْنَاكَ ۖ وَمَا أَنتَ عَلَيْنَا بِعَزِيزٍ
और वह लोग कहने लगे ऐ शुएब जो बाते तुम कहते हो उनमें से अक्सर तो हमारी समझ ही में नहीं आयी और इसमें तो शक नहीं कि हम तुम्हें अपने लोगों में बहुत कमज़ोर समझते है और अगर तुम्हारा क़बीला न होता तो हम तुम को (कब का) संगसार कर चुके होते और तुम तो हम पर किसी तरह ग़ालिब नहीं आ सकते
92قَالَ يَا قَوْمِ أَرَهْطِي أَعَزُّ عَلَيْكُم مِّنَ اللَّهِ وَاتَّخَذْتُمُوهُ وَرَاءَكُمْ ظِهْرِيًّا ۖ إِنَّ رَبِّي بِمَا تَعْمَلُونَ مُحِيطٌ
शुएब ने कहा ऐ मेरी क़ौम क्या मेरे कबीले का दबाव तुम पर ख़ुदा से भी बढ़ कर है (कि तुम को उसका ये ख्याल) और ख़ुदा को तुम लोगों ने अपने वास्ते पीछे डाल दिया है बेशक मेरा परवरदिगार तुम्हारे सब आमाल पर अहाता किए हुए है
93وَيَا قَوْمِ اعْمَلُوا عَلَىٰ مَكَانَتِكُمْ إِنِّي عَامِلٌ ۖ سَوْفَ تَعْلَمُونَ مَن يَأْتِيهِ عَذَابٌ يُخْزِيهِ وَمَنْ هُوَ كَاذِبٌ ۖ وَارْتَقِبُوا إِنِّي مَعَكُمْ رَقِيبٌ
और ऐ मेरी क़ौम तुम अपनी जगह (जो चाहो) करो मैं भी (बजाए खुद) कुछ करता हू अनक़रीब ही तुम्हें मालूम हो जाएगा कि किस पर अज़ाब नाज़िल होता है जा उसको (लोगों की नज़रों में) रुसवा कर देगा और (ये भी मालूम हो जाएगा कि) कौन झूठा है तुम भी मुन्तिज़र रहो मैं भी तुम्हारे साथ इन्तेज़ार करता हूँ
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अनुवाद — हूद 91

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Tuesday, August 18, 2026

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