Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- نَفْقَهُ: हम समझते हैं।
- ضَعِيفًا: कमज़ोर, जिसका कोई दबदबा न हो।
- رَهْطُكَ: आपके क़बीले के लोग, आपके रिश्तेदार।
- لَرَجَمْنَاكَ: हम आपको पत्थर मारकर हलाक कर देते।
- بِعَزِيزٍ: प्रतिष्ठित, शक्तिशाली, जिसकी इज़्ज़त की वजह से उसे छेड़ा न जाए।
तफ़सीर:
जब हज़रत शुएब (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम को तौहीद, अदल और ईमान की दावत दी और उन्हें नाप-तौल में कमी करने, लोगों को उनका हक़ मारने और ज़मीन में फ़साद फैलाने से रोका, तो उनकी क़ौम के सरकश लोगों ने जवाब में कहा: "ऐ शुएब! हम तुम्हारी अधिकतर बातों को समझते ही नहीं।" यह उनकी तरफ़ से बड़ी बेअदबी और तौहीन थी, क्योंकि वे उनकी बात को समझने से इनकार कर रहे थे, जबकि हक़ बात साफ़ और समझने योग्य थी।
फिर उन्होंने कहा: "और हम तुम्हें अपने बीच कमज़ोर ही देखते हैं।" यानी उनकी नज़र में शुएब (अलैहिस्सलाम) की कोई हैसियत नहीं थी, न वे उनके बड़े थे और न ही उनका कोई दबदबा था। वे उन्हें एक अकेला और बेसहारा इंसान समझते थे।
इसके बाद उन्होंने धमकी दी: "और अगर तुम्हारे क़बीले के लोग न होते, तो हम तुम्हें पत्थर मारकर हलाक कर देते।" यानी उन्होंने साफ़ कहा कि तुम्हारी जान इसलिए बची है क्योंकि तुम्हारे रिश्तेदार हमारे हम-मज़हब हैं और हम उनकी वजह से तुम्हें नहीं मारते। आख़िर में उन्होंने कहा: "और तुम हमारे नज़दीक कोई इज़्ज़त वाले नहीं हो।" यानी तुम्हारी अपनी कोई हैसियत नहीं जिसकी वजह से हम तुम्हें छोड़ दें, बल्कि तुम्हारे क़बीले की वजह से हमने तुम्हें छोड़ा है।
यह क़ौम की सख़्त दिली, घमंड और हक़ से मुँह मोड़ने की सबसे बड़ी मिसाल है। उन्होंने नबी की बात को न सिर्फ़ नकारा, बल्कि उन्हें कमज़ोर और बेइज़्ज़त कहा और उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी।
फ़ायदे:
- नबियों और दावत देने वालों को अपनी क़ौम की तरफ़ से तकलीफ़, तौहीन और धमकियों का सामना करना पड़ता है, लेकिन वे सब्र करते हैं और अपनी दावत पर डटे रहते हैं। यह हमारे लिए सबक़ है कि हक़ की राह में मुश्किलें आएँ तो हिम्मत न हारें।
- क़ौम का यह अंदाज़ कि "हम तुम्हारी बात समझते नहीं" — यह हक़ से इनकार की एक पुरानी चाल है। हमें चाहिए कि हक़ बात को समझने की कोशिश करें, न कि घमंड और अकड़ की वजह से उसे नकार दें।
- इंसान की इज़्ज़त और हैसियत अल्लाह के पास उसके ईमान और अमल से होती है, न कि दुनियावी रुतबे और क़बीले से। क़ौम ने नबी को कमज़ोर कहा, लेकिन अल्लाह ने उन्हें सबसे बड़ी इज़्ज़त दी।
- यह आयत बताती है कि रिश्तेदारी और क़बीले का लिहाज़ भी कभी-कभी इंसान को हक़ के रास्ते से रोकने का ज़रिया बनता है, लेकिन हमें सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा को सामने रखना चाहिए।
- नबी की दावत का असर क़ौम के अक्सर लोगों पर न पड़े, यह उनकी सच्चाई को कम नहीं करता। हक़ बात हमेशा हक़ रहती है, चाहे उसे कितने ही लोग नकार दें।
📜 आयत 89-93 — सूरा हूद
अनुवाद — हूद 91
सूरा हूद आयत 91 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और वह लोग कहने लगे ऐ शुएब जो बाते तुम…सूरा आयत 91/123 — सूरा हूद هود (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा हूद सुनें, सूरा हूद अनुवाद, सूरा हूद mp3, सूरा हूद pdf. आयत 89–93. हिंदी अर्थ: اردو.
सूरा हूद
पवित्र क़ुरआन
Thursday, October 1, 2026
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