رَحِيمٌ: अत्यंत दयालु, जो अपने बंदों पर दया करता है।
وَدُودٌ: अत्यधिक प्रेम करने वाला, अपने नेक बंदों से प्रेम करने वाला।
तफसीर:
अल्लाह के नबी शुएब (अलैहिस्सलाम) अपनी क़ौम को नसीहत कर रहे हैं कि वे अपने रब से माफ़ी माँगें और अपने कुकर्मों से तौबा करके उसकी ओर पलट आएँ। यानी पहले अपने गुनाहों की क्षमा की दरख्वास्त करें, फिर सच्चे दिल से उसकी इताअत (आज्ञाकारिता) की तरफ लौट आएँ और उसी पर स्थिर रहें। यह तौबा सिर्फ ज़ुबान से नहीं, बल्कि दिल से पक्के इरादे के साथ होनी चाहिए कि आइंदा गुनाह नहीं करेंगे।
फिर अल्लाह के नबी ने अपनी क़ौम को उम्मीद दिलाई कि मेरा रब बड़ा ही रहम वाला है और अपने बंदों से बेहद मुहब्बत करने वाला है। जब कोई बंदा अपने गुनाहों से तौबा करके उसकी तरफ रुजू होता है, तो वह उस पर रहम फरमाता है और उसकी तौबा कबूल करता है। उसकी मुहब्बत उस बंदे के लिए ख़ास हो जाती है जो उसकी तरफ पलट आता है। यह अल्लाह की सिफ़त है कि वह रहम करने वाला और अपने नेक बंदों से प्रेम करने वाला है, जैसा कि उसकी शान के लायक़ है।
फ़ायदे:
अल्लाह की रहमत और मुहब्बत का दरवाज़ा हमेशा खुला है; बंदा जब भी सच्चे दिल से तौबा करे, अल्लाह उसे कबूल करता है।
तौबा का मतलब सिर्फ माफ़ी माँगना नहीं, बल्कि गुनाह छोड़कर अल्लाह की इताअत की तरफ पलट आना है।
यह आयत हमें सिखाती है कि निराशा कभी नहीं करनी चाहिए, चाहे गुनाह कितने ही बड़े हों, अल्लाह की रहमत उनसे कहीं बड़ी है।
अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों से मुहब्बत करता है, और यह मुहब्बत बंदे के लिए सबसे बड़ी नेमत है।
इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि हमें अपनी ज़िंदगी में हमेशा अल्लाह की तरफ रुजू रहना चाहिए और उसकी रहमत से उम्मीद लगाए रखनी चाहिए।
शुएब ने कहा ऐ मेरी क़ौम अगर मै अपने परवरदिगार की तरफ से रौशन दलील पर हूँ और उसने मुझे (हलाल) रोज़ी खाने को दी है (तो मै भी तुम्हारी तरह हराम खाने लगूँ) और मै तो ये नहीं चाहता कि जिस काम से तुम को रोकूँ तुम्हारे बर ख़िलाफ (बदले) आप उसको करने लगूं मैं तो जहाँ तक मुझे बन पड़े इसलाह (भलाई) के सिवा (कुछ और) चाहता ही नहीं और मेरी ताईद तो ख़ुदा के सिवा और किसी से हो ही नहीं सकती इस पर मैने भरोसा कर लिया है और उसी की तरफ रुज़ू करता हूँ
और ऐ मेरी क़ौमे मेरी ज़िद कही तुम से ऐसा जुर्म न करा दे जैसी मुसीबत क़ौम नूह या हूद या सालेह पर नाज़िल हुई थी वैसी ही मुसीबत तुम पर भी आ पड़े और लूत की क़ौम (का ज़माना) तो (कुछ ऐसा) तुमसे दूर नहीं (उन्हीं के इबरत हासिल करो
और वह लोग कहने लगे ऐ शुएब जो बाते तुम कहते हो उनमें से अक्सर तो हमारी समझ ही में नहीं आयी और इसमें तो शक नहीं कि हम तुम्हें अपने लोगों में बहुत कमज़ोर समझते है और अगर तुम्हारा क़बीला न होता तो हम तुम को (कब का) संगसार कर चुके होते और तुम तो हम पर किसी तरह ग़ालिब नहीं आ सकते
शुएब ने कहा ऐ मेरी क़ौम क्या मेरे कबीले का दबाव तुम पर ख़ुदा से भी बढ़ कर है (कि तुम को उसका ये ख्याल) और ख़ुदा को तुम लोगों ने अपने वास्ते पीछे डाल दिया है बेशक मेरा परवरदिगार तुम्हारे सब आमाल पर अहाता किए हुए है
सूराकुरान वेबसाइट की स्थापना पवित्र किताब और पाक सुन्नत की सेवा, अल्लाह की ओर बुलावा, और कुरान व सुन्नत के मार्ग पर धार्मिक विज्ञान को सुगम बनाने के एक विनम्र प्रयास के रूप में की गई थी। हम अल्लाह की प्रशंसा और उसके अनुग्रह के लिए धन्यवाद करते हैं, और उससे प्रार्थना करते हैं कि वह हमारे कार्यों को स्वीकार करे और उन्हें केवल उसके महान चेहरे के लिए विशुद्ध बनाए।