Iz qaaloo la Yoosufu wa akhoohu ahabbu ilaaa Abeenaa minnaa wa nahnu `usbah; inna abaanaa lafee dalaalim mubeen
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
कि जब (यूसूफ के भाइयों ने) कहा कि बावजूद कि हमारी बड़ी जमाअत है फिर भी यूसुफ़ और उसका हकीक़ी भाई (इब्ने यामीन) हमारे वालिद के नज़दीक बहुत ज्यादा प्यारे हैं इसमें कुछ शक़ नहीं कि हमारे वालिद यक़ीनन सरीही (खुली हुई) ग़लती में पड़े हैं
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جب انہوں نے (آپس میں) تذکرہ کیا کہ یوسف اور اس کا بھائی ابا کو ہم سے زیادہ پیارے ہیں حالانکہ ہم جماعت (کی جماعت) ہیں۔ کچھ شک نہیں کہ ابا صریح غلطی پر ہیں
कि जब (यूसूफ के भाइयों ने) कहा कि बावजूद कि हमारी बड़ी जमाअत है फिर भी यूसुफ़ और उसका हकीक़ी भाई (इब्ने यामीन) हमारे वालिद के नज़दीक बहुत ज्यादा प्यारे हैं इसमें कुछ शक़ नहीं कि हमारे वालिद यक़ीनन सरीही (खुली हुई) ग़लती में पड़े हैं
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
عُصْبَةٌ (उस्बा): एक बड़ा समूह, जमात। यहाँ अर्थ है दस भाई जो एक साथ मिलकर एक ताकत थे।
ضَلَالٍ مُبِينٍ (ज़लालिन मुबीन): स्पष्ट गलती और भटकाव। यहाँ इसका अर्थ धर्म से भटकना नहीं, बल्कि निर्णय में स्पष्ट त्रुटि है।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत उस समय का वर्णन करती है जब यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) के सौतेले भाइयों ने आपस में साज़िश की। उन्होंने कहा: "क़सम है, यूसुफ़ और उसका सगा भाई (बिन्यामीन) हमारे पिता (याक़ूब) को हमसे ज़्यादा प्यारे हैं, जबकि हम एक मज़बूत जमात हैं और हममें ताकत और काबिलियत है। हमारे पिता साफ़ तौर पर गलत रास्ते पर हैं कि उन्होंने हम पर इन दोनों को तरजीह दी, बिना किसी ऐसे कारण के जो हमें दिखाई दे।"
भाइयों की यह बात उनकी ईर्ष्या और जलन से निकली थी, क्योंकि याक़ूब (अलैहिस्सलाम) का झुकाव यूसुफ़ की ओर अधिक था, जो एक नबी की स्वाभाविक मोहब्बत थी। लेकिन भाइयों ने इसे अपने लिए अपमान समझा और अपने पिता पर आरोप लगाया कि वे निर्णय में भटक गए हैं। यह उनकी नासमझी और शैतानी वसवसा का नतीजा था, क्योंकि पिता का अपने बेटे के प्रति अधिक प्रेम कोई गलती नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक जज़्बा है, और याक़ूब (अलैहिस्सलाम) नबी होते हुए धर्म से भटकने से पाक थे।
फ़ायदे (सीख):
ईर्ष्या और जलन इंसान को इतना अंधा कर सकती है कि वह अपने बड़ों और अच्छे लोगों पर भी गलत आरोप लगा दे। इसलिए हमें अपने दिल को ईर्ष्या से पाक रखना चाहिए।
माता-पिता का अपने बच्चों के प्रति अलग-अलग स्तर का प्रेम स्वाभाविक है और इसे बुरा नहीं समझना चाहिए, बल्कि इस पर आपत्ति करना नासमझी है।
यह आयत हमें सिखाती है कि किसी के बारे में जल्दबाज़ी में राय क़ायम न करें, खासकर अपने बड़ों के बारे में, क्योंकि उनके फ़ैसलों में हिकमत होती है जो हमें दिखाई नहीं देती।
अल्लाह की रहमत देखिए कि उसने भाइयों की इस साज़िश को यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) के लिए बड़े अज़ीम मरतबे का ज़रिया बनाया, जो बताता है कि मुसीबतों के पीछे भी अल्लाह की योजनाएँ खूबसूरत होती हैं।
और (जो तुमने देखा है) ऐसा ही होगा कि तुम्हारा परवरदिगार तुमको बरगुज़ीदा (इज्ज़तदार) करेगा और तुम्हें ख्वाबो की ताबीर सिखाएगा और जिस तरह इससे पहले तुम्हारे दादा परदादा इबराहीम और इसहाक़ पर अपनी नेअमत पूरी कर चुका है और इसी तरह तुम पर और याक़ूब की औलाद पर अपनी नेअमत पूरी करेगा बेशक तुम्हारा परवरदिगार बड़ा वाक़िफकार हकीम है
कि जब (यूसूफ के भाइयों ने) कहा कि बावजूद कि हमारी बड़ी जमाअत है फिर भी यूसुफ़ और उसका हकीक़ी भाई (इब्ने यामीन) हमारे वालिद के नज़दीक बहुत ज्यादा प्यारे हैं इसमें कुछ शक़ नहीं कि हमारे वालिद यक़ीनन सरीही (खुली हुई) ग़लती में पड़े हैं
(ख़ैर तो अब मुनासिब ये है कि या तो) युसूफ को मार डालो या (कम से कम) उसको किसी जगह (चल कर) फेंक आओ तो अलबत्ता तुम्हारे वालिद की तवज्जो सिर्फ तुम्हारी तरफ हो जाएगा और उसके बाद तुम सबके सब (बाप की तवजज्जो से) भले आदमी हो जाओगें
उनमें से एक कहने वाला बोल उठा कि यूसुफ को जान से तो न मारो हाँ अगर तुमको ऐसा ही करना है तो उसको किसी अन्धे कुएँ में (ले जाकर) डाल दो कोई राहगीर उसे निकालकर ले जाएगा (और तुम्हारा मतलब हासिल हो जाएगा)
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