यूसुफ · 7/111
अनुवाद उच्चारण — यूसुफ
۞ لَّقَدْ كَانَ فِي يُوسُفَ وَإِخْوَتِهِ آيَاتٌ لِّلسَّائِلِينَ ۝٧
Laqad kaana fee Yoosufa wa ikhwatiheee Aayaatul lissaaa`ileen
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) यूसुफ और उनके भाइयों के किस्से में पूछने वाले (यहूद) के लिए (तुम्हारी नुबूवत) की यक़ीनन बहुत सी निशानियाँ हैं
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • آيَاتٌ: निशानियाँ, सबक, शिक्षाप्रद घटनाएँ और अल्लाह की क़ुदरत की दलीलें।
  • لِلسَّائِلِينَ: पूछने वालों के लिए, यानी जो लोग उनके हाल के बारे में जानने की इच्छा रखते हैं।

तफ़सीर:

अल्लाह तआला फ़रमाता है कि यक़ीनन हज़रत यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) और उनके भाइयों के क़िस्से में उन लोगों के लिए बड़ी निशानियाँ और सबक हैं जो उनके हालात के बारे में पूछते हैं या जानने की ख्वाहिश रखते हैं। यह क़िस्सा महज़ एक कहानी नहीं, बल्कि उसमें अल्लाह की क़ुदरत, उसकी हिकमत और उसके इंतज़ाम की अज़ीम दलीलें मौजूद हैं। जो लोग इस क़िस्से को सुनते हैं, उनके लिए इसमें इबरत और नसीहत है — कि अल्लाह किस तरह अपने बंदों को मुसीबतों से निकालकर इज़्ज़त देता है, किस तरह सब्र और तक़्वा का अंजाम ख़ैर होता है, और किस तरह अल्लाह की तदबीर इंसानी मंसूबों से बालातर होती है। यह आयत बताती है कि यह क़िस्सा सिर्फ़ उन्हीं के लिए नहीं, बल्कि हर ज़माने के लोगों के लिए एक ज़िंदा सबक़ है।

फ़ायदे:

  • इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि अल्लाह की किताब में बयान किए गए पैग़म्बरों के क़िस्से महज़ तारीख़ी वाक़ियात नहीं, बल्कि हर दौर के इंसान के लिए रहनुमाई और हिदायत का ज़रिया हैं।
  • यह हमें सब्र और भरोसे की तालीम देती है — जब हज़रत यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) को भाइयों की साज़िश, कुएँ में डाला जाना, ग़ुलामी और जेल जैसी मुसीबतों का सामना करना पड़ा, तो उन्होंने अल्लाह पर भरोसा नहीं छोड़ा, और आख़िरकार अल्लाह ने उन्हें मुल्क का अमीन बनाया।
  • यह क़िस्सा हमें सिखाता है कि इंसानी मंसूबे चाहे कितने भी मज़बूत हों, अल्लाह की मर्ज़ी के आगे बेबस हैं; अल्लाह जो चाहता है वही होता है।
  • इस आयत में उन लोगों के लिए भी तसल्ली है जो मुसीबतों में घिरे हैं — कि अल्लाह की मदद हर मुश्किल के बाद आती है, बशर्ते इंसान सब्र और अच्छे अख़्लाक़ पर क़ायम रहे।
  • यह क़िस्सा हमें माफ़ी और दरगुज़र की तालीम देता है, क्योंकि हज़रत यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने अपने भाइयों को माफ़ कर दिया और उन पर कोई बदला नहीं लिया — यही अख़्लाक़ी बुलंदी है जो इस्लाम सिखाता है।
🎧 सुनें

📜 आयत 5-9 — यूसुफ

5قَالَ يَا بُنَيَّ لَا تَقْصُصْ رُؤْيَاكَ عَلَىٰ إِخْوَتِكَ فَيَكِيدُوا لَكَ كَيْدًا ۖ إِنَّ الشَّيْطَانَ لِلْإِنسَانِ عَدُوٌّ مُّبِينٌ
याक़ूब ने कहा ऐ बेटा (देखो ख़बरदार) कहीं अपना ख्वाब अपने भाईयों से न दोहराना (वरना) वह लोग तुम्हारे लिए मक्कारी की तदबीर करने लगेगें इसमें तो शक़ ही नहीं कि शैतान आदमी का खुला हुआ दुश्मन है
6وَكَذَٰلِكَ يَجْتَبِيكَ رَبُّكَ وَيُعَلِّمُكَ مِن تَأْوِيلِ الْأَحَادِيثِ وَيُتِمُّ نِعْمَتَهُ عَلَيْكَ وَعَلَىٰ آلِ يَعْقُوبَ كَمَا أَتَمَّهَا عَلَىٰ أَبَوَيْكَ مِن قَبْلُ إِبْرَاهِيمَ وَإِسْحَاقَ ۚ إِنَّ رَبَّكَ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
और (जो तुमने देखा है) ऐसा ही होगा कि तुम्हारा परवरदिगार तुमको बरगुज़ीदा (इज्ज़तदार) करेगा और तुम्हें ख्वाबो की ताबीर सिखाएगा और जिस तरह इससे पहले तुम्हारे दादा परदादा इबराहीम और इसहाक़ पर अपनी नेअमत पूरी कर चुका है और इसी तरह तुम पर और याक़ूब की औलाद पर अपनी नेअमत पूरी करेगा बेशक तुम्हारा परवरदिगार बड़ा वाक़िफकार हकीम है
7۞ لَّقَدْ كَانَ فِي يُوسُفَ وَإِخْوَتِهِ آيَاتٌ لِّلسَّائِلِينَ
(ऐ रसूल) यूसुफ और उनके भाइयों के किस्से में पूछने वाले (यहूद) के लिए (तुम्हारी नुबूवत) की यक़ीनन बहुत सी निशानियाँ हैं
8إِذْ قَالُوا لَيُوسُفُ وَأَخُوهُ أَحَبُّ إِلَىٰ أَبِينَا مِنَّا وَنَحْنُ عُصْبَةٌ إِنَّ أَبَانَا لَفِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ
कि जब (यूसूफ के भाइयों ने) कहा कि बावजूद कि हमारी बड़ी जमाअत है फिर भी यूसुफ़ और उसका हकीक़ी भाई (इब्ने यामीन) हमारे वालिद के नज़दीक बहुत ज्यादा प्यारे हैं इसमें कुछ शक़ नहीं कि हमारे वालिद यक़ीनन सरीही (खुली हुई) ग़लती में पड़े हैं
9اقْتُلُوا يُوسُفَ أَوِ اطْرَحُوهُ أَرْضًا يَخْلُ لَكُمْ وَجْهُ أَبِيكُمْ وَتَكُونُوا مِن بَعْدِهِ قَوْمًا صَالِحِينَ
(ख़ैर तो अब मुनासिब ये है कि या तो) युसूफ को मार डालो या (कम से कम) उसको किसी जगह (चल कर) फेंक आओ तो अलबत्ता तुम्हारे वालिद की तवज्जो सिर्फ तुम्हारी तरफ हो जाएगा और उसके बाद तुम सबके सब (बाप की तवजज्जो से) भले आदमी हो जाओगें
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अनुवाद — यूसुफ 7

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Tuesday, August 18, 2026

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